महेश शर्मा-
ओडिशा में ही मन लग गया। अमर उजाला से इस्तीफा दे दिया। ऐसा लगा कि प्रारब्ध जिस तरफ भी ले जा रहा है उधर ही चलो। हो सकता है जीवन में कुछ नया करने का अवसर मिले। और वही हुआ। सोचा भी न था कि हिंदी भाषी राज्य से ऐसे राज्य में काम करने का अवसर मिल रहा था जहां हिंदी का विरोध होता हो। ओडिशा में लिखापढ़ी की भाषा ओड़िया है। सरकारी काम-काज के साथ ही बाजार में दुकानों के साइन बोर्ड तक ओडिया में। कहते हैं कि ओड़िया, बांग्ला और असमी भाषा मिलती-जुलती हैं। टूटी फूटी बांग्ला समझ जाया करता था तो उसका लाभ मिला।
जब मैं ओडिया और बांग्ला के अखबार देखता था तो पढ़ तो पाता नहीं था। दोनों भाषाओं में अपन की फीस माफ थी। पर भाषायी अखबारों के ले-आउट डिजाइन पर नजर डालता था तो आनंद बाजार पत्रिका सबसे अच्छा लगता था। ओड़िया अखबारों में प्रमेय का ले-आउट ठीक लगता था। समाज, संवाद, धरित्री, नितदिन आदि खास नहीं लगते थे। अंग्रेजी में टेलीग्राफ, न्यू इंडियन एक्सप्रेस अच्छा लगता था। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि काम का स्कोप भरपूर था। कंटेंट के मामले भाषायी अखबार उतने समृद्ध नहीं लगते थे जितने हिंदी के।
वहां पर दैनिक जागरण, नवभारत (मध्यप्रदेश वाला), सन्मार्ग प्रमुख अखबार दिखते थे। पश्चिमी ओडिशा में राउरकेला में दैनिक भास्कर भी दिख जाता था। वह मिलीजुली आबादी वाला क्षेत्र है। ओडिशा में पत्रकारिता की पारी महाप्रभु जगन्नाथ के दर्शन करके शुरू की।
हालांकि मैं घोर आस्तिक नहीं हूं और न ही कट्टर नास्तिक। ओडिशा आओ और जगन्नाथ मंदिर दर्शन को न जाओ। यह संभव भी नहीं था। वजह दादा और भाईजी (रामकिशोर वाजपेयी व दीपक मालवीय) का साथ। कहा जाता है कि पुरी की पावन धरती में दर्शन करने से मनोकामना पूरी जाती है। मेरा पहला अनुभव था। कल्प वृक्ष कहे जाने वाले एक बहुत पुराना सा दिखने वाले पेड़ की शाखा पर लोग डोरी से गिट्टी बांधकर मन्नत मानते हैं। महाप्रभु मेरा भला करो हम परिवार के साथ दर्शन करने पुरी आएंगे इत्यादि-इत्यादि।
मैं पंडा से बातचीत करने लगा। उसने एक लघु पूजा का एक हजार रुपया मांगा तो मैं भड़क उठा। मैंने कहा कि सौ रुपए दूंगा। वह मान गया, उधर दादा का इशारा हुआ जो कह रहा वह करो। उसने कहा कि वृक्ष के नीचे बैठकर सुदर्शन चक्र को देखते हुए महाप्रभु से अपने कल्याण की बाबत जो मन हो मांगो। और दर्शन के समय भी वही बात दोहराना। मैंने वही किया। उन दिनों गर्भगृह में दर्शन सुलभ हो जाते थे बशर्ते आपका पऊवा तगड़ा होना चाहिए था, सो था भी। पुत्र शिवम पढ़कर निकले थे। मस्त तबीयत का बच्चा था तो उनकी जिम्मेदारी मेरे ही कांधों पर थी। मेरी अर्जी जगन्नाथ भगवान से यही थी कि कहीं ठिकाना बना दो महाप्रभु। उनका विग्रह सदैव ही मुझे मुस्कराता हुआ दिखायी पड़ता था।
श्रीमंदिर से निकलकर कोणार्क सूर्यमंदिर दर्शन को निकले। एक घंटा तब हुआ जब शिवम की नौकरी के लिए राष्ट्रीय सहारा के प्रबंधक मेरे मित्र योगेश दुबे का फोन आ गया और उन्होंने दूसरे ही दिन आवेदन पत्र लेकर बेटे को कानपुर ऑफिस भेजने को कहा। मेरे मुंह से अनायास ही निकला ‘जय जगन्नाथ।’ दादा हमारी तरफ देखकर बोले का हुईगा (बैंक की नौकरी में जीवन बिताकर रिटायर हुए दादा रामकिशोर वाजपेयी की अवधी बैसवारी बोली का खासा अनुभव है) यह सुनकर मैंने अनुभव मंदिर का अनुभव सुनाया। वह भी बोले जय जगन्नाथ। इसके बाद तो छह सात ऐसे वाकये आए जिनके कारण महाप्रभु के प्रति आस्था बलवती होती गयी। अब तो सिर्फ उन्हीं का नाम निकलता है।
इंडिया टुडे से जुड़ने के पीछे भी यही आस्था है। मुझे लगने लगा कि मेरी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं। लगने लगा कि कुछ बात तो है कालिया ठाकुर में।
यहां पर दो किस्से बताना चाहूंगा जो मेरी पत्रकारिता और आस्था से जुड़े हैं। पहला तो यह था कि समाज अखबार के लिए काम करने में आनंद आ रहा था। नेटवर्किंग की मीटिंगों में जा-जाकर कंटेंट के बूते अखबार बढ़ाने के जज्बे से लबरेज होकर ओडिशा के जिलों, ब्लाक यहां तक कि कुछ ग्राम पंचायतें घूमने का मौका मिला। लोगों से मेलजोल बढ़ता रहा। धीरे-धीरे भुवनेश्वर व विभिन्न जिलों के पत्रकारों से मिलता-जुलता रहा। खुद भी लिखने का चस्का लगा था तो कार्यकारी संपादक सुशांत महंति ने अनुवादक भी दे दिया था। ओडिया बोलना और समझना धीरे-धीरे आने लगा।
2014 का लोकसभा और विधानसभा (ओडिशा में दोनों साथ होते हैं) चुनाव में कवरेज को लेकर कनपुरिया पैतरों और अनुभव के आधार पर स्टोरीज कराने लगा। दो पेज चुनाव को समर्पित कर दिए थे। राज्य और राष्ट्रीय पेज पर चुनाव ही था। खैर कोई 2016 में इंडिया टुडे के तत्कालीन स्वनामधन्य संपादक अंशुमान तिवारी का आगमन कीट यूनिवर्सिटी में हुआ। उनका अर्थ संसार पर मुख्य भाषण होना था। उनका फोन आया कि आप कहां पर हैं? मैंने कहा, कटक में। भुबनेश्वर आइए (22-23 किलोमीटर की दूरी के कारण वहां पर कटक और भुबनेश्वर (खोरदा जिले का एक हिस्सा) ट्यीन सिटी कही जाती हैं)। पुरी दर्शन को चलते हैं। अंशुमान जी जगन्नाथ महाप्रभु के अनन्य भक्त हैं।
मैंने उनसे कहा कि आता हूं। और घंटे के भीतर मैं यूनिवर्सिटी परिसर में उनके गेस्टरूम में जा पहुंचा। वहां से हम दोनों पुरी के लिए रवाना हो गए। रास्ते भर जिज्ञासु स्वभाव के अंशुमान जी ओडिशा और कुछ पुरानी यादों पर चर्चा करते रहे। मैं और वो अमर उजाला कानपुर संस्करण की लांचिंग टीम में थे। दोनों ही दिग्गज संपादक अच्युतानंद मिश्रा जी की पसंद थे। दोनों पुरी पहुंचे। शिप्पू पंडा को हमें दर्शन कराने, महाप्रसाद से छकाने का दायित्व दिया गया था। शिप्पू हमें मंदिर परिसर में ले गया। वहां पर महाप्रभु की रीति-नीति के चलते विग्रहों पर पर्दा पड़ा था। हम प्रतीक्षा करने लगे।
इतने में मैंने देखा कि एक सुदर्शन कदकाठी का व्यक्ति (कोई सेवायत यानी पंडा) धोती पहने उघारे चला आ रहा है। उसके जनेऊ में चाबी फंसी हुई थी। मैं अनायास ही उसके पीछे चल पड़ा। वह मुझे देख नहीं पाया। मेरे पीछे दो-तीन फुट की दूरी पर अंशुमान जी। संकरी सीढियों से वह वह गंतव्य की ओर बढ़ा तो मैं भी चला गया। उसने एक कोठरीनुमा कमरे का दरवाजा खोला। वहां पर महाप्रभु के ज्वैलरी चमचमा रही थी। मैं बहुत डर गया था क्योंकि आगे-पीछे और कोई नहीं दिख रहा था। मेरे उसके पीछे होने का आभास होते ही वह व्यक्ति जैसे ही पलटा, मैं डरकर हाथ जोड़कर कहने लगा। क्षमा कीजिएगा। गलती से आ गया हूं। (मुझे लगा कहीं शक के दायरे में लाकर पिटायी न हो जाए) बाहर का हूं। आपका सुदर्शन व्यक्तित्व मुझे यहां तक ले आया। उसने इशारे से पास बुलाया। डेहरी के बाहर मैं और अंदर वह।
उसने एक-एककर छह ज्वैलरी मेरे शरीर से छुआयी। मैं तो धन्य हो गया। उसे देने के लिए पैसे निकालने वाला ही था कि उसने गुस्सैल मुखाकृति बनाते हुए मुझे जाने को कहा। हम लोग विग्रहों के निकट आ ही रहे थे कि शिप्पू ढूंढ़ता हुआ आ गया। खैर, दर्शन किए। भक्तिभाव में लीन अंशुमान की तरफ कनखियों से देखकर मैने प्रार्थना की। (हां एक बात बता दें कि मेरी भक्ति मैत्रीभाव वाली है। जगन्नाथ जी से मैं सीधे वार्ता करता हूं) मैंने उनसे कहा कि दोस्त कुछ ऐसा जुगाड़ इनके दिमाग में बैठा दो कि ओडिशा से इंडिया टुडे के लिए लिखने का मुझे मौका मिल जाए। यह मेरा ड्रीम है। पूरा कर दो।
दर्शन के बाद महाप्रसाद जिसे महाभोग भी कहते हैं, लिया। महाप्रभु के अंगौछे का एक टुकड़ा शिप्पू ने हम लोगों को दिया। बाहर आकर गाड़ी में बैठे और भुबनेश्वर की ओर चल दिए। कोई 60 किलोमीटर की यात्रा थी। करीब 25 किलोमीटर की दूरी पर पीपली तब पहुंचे जब इंडिया टुडे में लिखने का ऑफर अंशुमान जी की ओर से मिल गया। वह स्वतः बोले, ‘महेश जी क्या आप यहां से इंडिया टुडे के लिए स्टोरी भेज सकते हैं? ‘समाज के मैनेजमेंट को कोई आपत्ति न हो। आप पूछ लीजिए।
मेरे मुंह से फिर निकला ‘जय जगन्नाथ’ अभी घंटा भर भी नहीं हुआ और महाप्रभु ने कृपा बरसा दी। मैंने उनसे मुखातिब होते हुए कहा, ‘हां-हां क्यों नहीं, मैं तो सलाहकार हूं कोई नौकरी थोड़े ही करता हूं जो मैनेजमेंट को आपत्ति होगी।’ तो उन्होंने कहा, ‘आप अपने चेयरमैन से बात कर लो।’ मैनें तुरंत दीपक(मालवीय) जी को फोन किया और उन्हें बताया कि इंडिया टुडे के एडिटर अंशुमान तिवारी जी मेरे बगल में बैठे हैं। वह चाहते हैं कि मैं इंडिया टुडे को भी ओडिशा से कांट्रीब्यूट कर दूं। दीपक जी खुश होकर बोले, ‘हां हां बिल्कुल, यह तो गर्व की बात है कि हमारे मीडिया हाउस से कोई इंडिया टुडे जैसी इंटरनेशनल मैगजीन में लिख रहा है। ‘उसके बाद दीपक जी ने अंशुमान जी से फोन पर ही बात की और बात बन गयी। अब यह हुआ पहला असाइनमेंट क्या होना चाहिए। सो पारखी नजरों के धनी संपादक जी (अंशुमान तिवारी) ने गाड़ी में बैठे बैठे ही एक स्टोरी का सुझाव दिया।
संयोगवश यह स्टोरी महाप्रभु जगन्नाथ मंदिर पर ही थी। विशेष रिपोर्ट। वह कहने लगे कि मंदिर जीर्णशीर्ण हो रहा है। प्लास्टर तक उखड़ रहा है। दीवार भी दरकने जैसी लगी हैं। यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) और राज्य सरकार की जिम्मेदारी है। मंदिर का रखरखाव राज्य सरकार के जिम्मे है। फिर पुनरोद्धार की फाइल कहां फंसी हैं और कार्य शुरू क्यों नहीं हुआ? पूरा कंटेंट विस्तार से उन्होंने बता दिया। यह भी कहा कि स्टोरी मुकम्मल होनी चाहिए। समय सीमा आपकी सुविधा के मुताबिक है।
कीट युनिवर्सिटी स्थित उनके गेस्टरूम भुबनेश्वर पहुंचते-पहुंचते सारा खाका उन्होंने बता दिया। पहली रिपोर्ट छपने जा रही थी वह भी इंडिया टुडे में। मेरा दिल बल्लियों उछलने लगा। इतनी खुशी तो तनख्वाह बढ़ने पर भी नहीं हुई होगी। इस रिपोर्ट को तैयार करने में मुझे एक माह से ज्यादा समय लग गया था। समाज के कार्टूनिस्ट अशोक शिल्पी को लेकर कटक से पुरी गया। वह ग्राफिक्स डिजाइन के भी मास्टर थे। चूंकि मंदिर के भीतर फोटो नहीं ली जा सकती थी, इसलिए टूट-फूट वाले क्षेत्र के विजुअल इम्पैक्ट के लिए शिल्पी की मदद ली जो उसने कर भी दी।
आपको बता दें कि जगन्नाथ मंदिर परिसर के भीतर विभिन्न देवी देवताओं के 35 छोटे-छोटे मंदिर हैं। महाप्रभु के मुख्य मंदिर की एक रेप्लिका यानी अनुकृति भी है। छायाकार ने बड़ी मशक्कत के साथ फोटो इंतजाम किए। इसमें विशाल मंदिर के साथ ही छोटे मंदिरों के फोटो और उनके नाम आ गए थे। पूरी सामग्री भेज दी। मैगजीन के वरिष्ठ पत्रकार मोहम्मद वकास से कंटेंट को लेकर फोन पर वार्ता होती रही। वह बेहद संजीदा और सहयोग देने वाले पत्रकार हैं। सदैव हौसलाफयाजी करते हैं। एक हफ्ता तो स्टोरी के संपादन में लगा। दो पेज की फोटो के साथ स्टोरी इस हैडिंग से छपी, ‘सबके साथ पर मुश्किल में जगन्नाथ’ एप्रूवल के लिए उसका मिनिएचर मुझे भेजा गया जिसे पढ़कर मैंने ओके किया।
इंडिया टुडे की यह बात बहुत अच्छी लगती है कि संबंधित पत्रकार की संतुष्टि का ख्याल रखा जाता है। मैगजीन ओडिशा में कम बिकती है। हां जगन्नाथ मंदिर पर स्टोरी थी तो राष्ट्रीय स्तर पर बन गयी। ओडिशा में जय जगन्नाथ के उद्घोष के साथ सभा करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी महाप्रभु के अनन्य भक्त हैं। शायद इसीलिए प्रधानमंत्री कार्यालय ने स्टोरी को संज्ञान में लिया। मुझे वकास जी ने फोन पर बधाई देते हुए कहा कि आपकी स्टोरी पर सरकार कुछ करने का इरादा बना चुकी है। उन्हीं ने बताया कि मोदी जी पारादीप रिफाइनरी की लांचिंग के कार्यक्रम में आ रहे हैं। वह जगन्नाथ मंदिर निरीक्षण को भी जाएंगे। कुछ घोषणा कर सकते हैं। आप कवर कर लीजिएगा। मिनिएचर के साथ एक पेज छापेंगे। इसे इंडिया टुडे की स्टोरी का इम्पैक्ट बताया जाने लगा।
उधर तत्कालीन नवीन पटनायक सरकार केंद्र को क्रेडिट नहीं लेने देना चाहती थी। दोनों सरकारें श्रीमंदिर को लेकर सक्रिय हो गयीं। इसका परिणाम यह हुआ कि महाप्रभु का मंदिर चकाचक हो गया। श्रद्धालुओं के लिए सुविधाओं की भरमार के साथ ही भव्य मंदिर में दर्शन को लाखों लोग उमड़ने लगे। इसके बाद तो अपने कार्य के साथ ही इंडिया टुडे के लिए स्टोरी करने का जोश बढ़ता ही गया। पैसा भी मिल जाता था। हमारे छायाकार साथी मनोज स्वैं की बाइलाइन फोटो खूब छपीं। उनका पैसा अलग आता था। फिर तो इंडिया टुडे में छपने वाली मेरी हर स्टोरी में मनोज की फोटो लगायी जाने लगी। मेरी महीने में दो या तीन रिपोर्ट छप जाती थी। कभी-कभी तो एक ही रिपोर्ट छपती थी। वही स्टोरी अंग्रेजी में भी अनुवाद होकर छपने लगी।
नगड़ा में 19 शिशुओं की मौत की रोमांचक रिपोर्ट
इस किस्से को मैं इसलिए और शेयर करना चाहूंगा कि जोखिम उठाकर स्टोरी करके भेजना और उसका बेहतर स्पेस में छपना वाकई किसी भी पत्रकार के लिए संतोष दायक होता है। लोकल अखबारों से खबर मिली कि ओडिशा के जाजपुर (भाजपा के संबित पात्रा का गृह जनपद) जिले के सुकिंडा ब्लाक के नगड़ा पहाड़ पर आदिवासी गांवों में मौत का तांडव शिशुओं पर कहर बरपा रहा है। डेढ़-दो माह के भीतर 19 शिशुओं की मौत ने सरकार की चिकित्सा व्यवस्था को तार-तार कर दिया था। अंधविश्वासी आदिवासी परिवार भी अस्पताल जाने के बजाय टोटकों से इलाज कर रहे थे। भारी डीलडौल का सुकिंडा ब्लाक का संवाददाता रंगबल्लभ से बात की तो कहानी बिलकुल सच निकली। उसने यह भी बताया कि टाटा की टाउनशिप वहां हैं। वे लोग मदद को ऊपर (पहाड़) जाते हैं।

मैंने समाज और इंडिया टुडे दोनों के लिए यह स्टोरी की। स्टोरी प्लान दिल्ली भेजा तो अंशुमान जी का फोन आया आप जाइए और विस्तार से यह स्टोरी फाइल कीजिए। इधर समाज अखबार ने भी लोकल सपोर्ट की व्यवस्था कर दी थी। करीब आठ-नौ किलोमीटर सीधी चढ़ाई करके नगड़ा पहाड़ पर जाना था। रंगबल्लभ तो एक किलोमीटर के बाद ही हांफ गया और लौट गया। मैंने वहां पर पांच सौ रुपये में दो आदिवासी युवा साथी अपने लिए। एक ने कैमरा थामा तो दूसरे ने बैग। सुबह छह बजे ही दुर्गम रास्तों पर पैदल चलना शुरू कर दिया। लाठी (बाड़ी) हाथ में लिए बतियाते, मनोरंजन करते हुए हम लोग चढ़ ही रहे थे कि झाड़ियों में सुरसुराहट हुई।
आदिवासी युवा ने रुकने का इशारा किया और बोला सांप हो सकता है। मेरी तो फूं सरक गयी। उसने लाठी से टटोला तो एक सांप हम लोगों के सामने से निकल गया। उसने बताया कि यहां पर भालू भी सक्रिय रहते हैं पर आप डरिये मत हम लोग उन्हें भगाने की ट्रिक जानते हैं। नगड़ा की उस घटना के कारण स्वास्थ महकमा के लोगों की आवाजाही के कारण एकाध लोग रास्ते में मिल जाते थे जिनसे बात हो जाती थी। आदिवासियों की ओड़िया बोली वेस्टइंडीज के किसी फास्ट बॉलर की बाउंसर की तरह ऊपर से निकल जाती थी।
बात न हो पाने का जबरदस्त संकट। इस संकट से उबारा, उन्हीं आदिवासी युवाओं ने। जैसे ही गांव के करीब पहुंचा तो मुझे द हिंदू के विशेष संवाददाता/सहायक संपादक प्रफुल दास मिले जिनसे परिचय हुआ। कुछ और ओडिया पत्रकार मिले। हेलो हाय के बाद सब अलग –अलग काम पर लग गए। सबसे ज्यादा प्रभावित नगड़ा के नाम से तीन गांव थे जिन्हे ऊपरे नगड़ा, मझरे नगड़ा और तड़े नगड़ा कहा जाता था। रिपोर्ट की पर्याप्त सामग्री इन्हीं गांवों से मिल गयी थी तो बाकी जाने का समय ही नहीं मिला। यह स्टोरी समाज ने एक पेज, इंडिया टुडे ने तीन पेज में छापी।
इस रिपोर्ट की इंडिया टुडे के संपादकीय में चर्चा हुई कि स्टोरी करने की ललक और जज्बा तो शर्मा जी से सीखे। हालांकि यह अपने मियां मिट्ठू वाली बात है पर युवा पत्रकारों को यह बताना जरूरी था।
लौटते-लौटते देर शाम हो गयी थी। बहुत थक गया था। पर थकान की परवाह किए बिना टाटा के गेस्ट हाउस में ही रूम मिला था। नहा धोकर फ्रेश हुआ। चाय मंगायी और लिखने बैठ गया। रंगबल्लभ मेरी सुविधाओं का पूरा ध्यान रखे था। लैपटॉप पर उसी रात स्टोरी बनाकर भेज भी दी। इंडिया टुडे और समाज के लिए। समाज ने अगले दिन फुल पेज में तो इंडिया टुडे ने तीन पेज में छापा। युवा पत्रकारों के लिए संदेश यह है कि सब काम छोड़कर पहले स्टोरी बना डालो। सारा कंटेंट ताजा-ताजा मस्तिष्क में रहता है। काम बहुत आसान हो जाता है। इस रिपोर्ट का असर यह हुआ कि आज आप गाड़ी में बैठकर नगड़ा के गांवों को जा सकते हैं।
दैनिक जागरण, अमर उजाला समेत कई अख़बारों में वरिष्ठ पदों पर रहे वरिष्ठ पत्रकार महेश शर्मा से संपर्क 9260973105 के ज़रिए किया जा सकता है।
पिछला भाग…
कानपुर वाले महेश शर्मा का पत्रकारीय जीवन (पार्ट-10) : ओडिशा के अख़बार में कनपुरिया उड़ान


