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सुख-दुख

कानपुर वाले महेश शर्मा का पत्रकारीय जीवन (पार्ट-12) : अख़बार में भीमसेन और निरंजन रथ का भी अलग ही लेवल था

महेश शर्मा-

डिशा में पांव लगभग जम चुके थे। भाषा शैली संस्कृति आचरण व्यवहार, संस्कृति के माहौल में मन लगने लगा। फ्री-लांस जर्नलिज्म का स्कोप बनता जा रहा था। कुछेक मीडिया हाउस मुझसे लिखवाने भी लगे थे। इंडिया टुडे के साथ ही राजस्थान पत्रिका को भी लिखा करता था।

दरअसल, इन ग्रुपों को भी गैर हिंदी भाषी क्षेत्रो में हिंदी भाषी जर्नलिस्ट चाहिए था। सैलानियों की तरह घूमना मेरी आदत सी पड़ गयी थी। नेटवर्किंग, एडीटोरियल प्लानिंग, प्रसार, विज्ञापन विभाग पर बराबर दबाव के चलते समाज अखबार भी बढ़ रहा था। इस अखबार की विशेषता यह थी कि यह हाउसहोल्ड अखबार बन चुका था। अखबार में पान मसाला, अंडरगारमेंट्स, शराब आदि के विज्ञापन छपना वर्जित था।

मुझे लगता है कि दो-चार करोड़ का विज्ञापन समाज प्रबंधन हर साल तो वैसे ही छोड़ देता था। राजस्व नुकसान की दुहाई देकर एक बार पान मसाला का विज्ञापन छापने की मुझे अनुमति लेनी पड़ी थी। इस अखबार के सेवा प्रकल्प इतने थे कि प्रायः कुछ न कुछ आयोजन हुआ करता था और सबसे बड़ी बात यह कि समाज के नाम पर आवाम हर आयोजनों में जुड़ता था।

कटक से लगभग 35 किमी दूर माधौपुर में गोपबंधु इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस एंड रिसर्च, जिसे इन शॉर्ट जिमसार कहते थे, गरीबों का मुफ्त इलाज किया जाता है। यह एक बड़ा अस्पताल है। इसी की सीमा में बॉटनिकल गार्डन भी है। विभिन्न प्रजातियों के पौधे आपके कौतूहल का कारण बन जाते हैं। अरे, यहां तो यह भी है। रथ जी ने मेंटेन अच्छा किया है। कहा जाता है कि जो पौधे कहीं न मिले वह जिमसार में आपको मिल सकते हैं। इस बगीचे के माली (पूरी तरह से इनवाल्व) और अस्पताल के संरक्षक जो एक-एक मरीज को अपना परिवार मानते वाले सम्मानीय निरंजन रथ का अधिकतर समय वहीं बीतता था। लोगों को जिमसार विजिट कराना उनका शौक है। हालांकि वह समाज के प्रिटंर व पब्लिशर भी थे। पर समर्पित समाज सेवक थे।

अखबार की संचालक बॉडी लोकसेवक मंडल में कुछ ही लोग थे जिनके विषय में कहा जाता है कि इनके भीतर उत्कलमणि गोपबंधुदास वाला सेवा भाव प्रवेश कर चुका है। उनमें से एक निरंजन रथ थे। अविवाहित निरंजन रथ जी के साथ एक बार मुझे कटक से राउरकेला (सुंदरगढ़) जाने का अवसर मिला। हमारे साथ समाज के संपादक बामापद त्रिपाठी जी भी थे। ड्राइवर मिलाकर चार लोग।

कटक पार करके सौ किमी ही चले होंगे कि मैंने देखा साधु बाबा से दिखने वाले निरंजन रथ ओड़िया और संस्कृत के भजन गुनगुनाते-गुनगुनाते अचानक उनके मुंह से हेमंत दा का एक हिंदी रोमांटिक गीत का बोल फूट पड़ा, ‘याद किया दिल ने कहां हो तुम, झूमती बहार है कहां हो तुम… (बाकी नाक से आवाज निकालकर ऊंऊंऊं करके गीत की अगली पंक्ति प्यार से पुकार लो जहां हो तुम प्यार से पुकार लो..

निरंजन रथ

‘मेरे तो आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। सोचा भी न था कि रथ जी म्युजिक लवर होंगे। मैने ओड़िया और हिंदी मिली-जुली भाषा में बात करते हुए उनसे पूछा, ’सर आपको म्युजिक में काफी इंटरेस्ट है, जिसे मैं भजन समझ रहा था हो सकता है कि वह आपके मुखारबिंदु से ओडिया फिल्मी गीत फूटा हो। ‘वह बोले, म्युजिक अच्छा लगता है। और हिंदी फिल्मों के गीत भी। फिर वह छात्र जीवन की कथा बताने लगे। अविवाहित रहने के सवाल पर वह किसी चतुर नेता की तरह चुप्पी साध गए। मेरे भीतर का भी गायक मुखर हो चुका था। मुझे सैकड़ों फिल्मी गाने याद हैं।

मैंने उनसे कहा कि सर आप फरमाइश करें, चाहे जितना पुराना गाना होगा मैं सुनाऊंगा। संपादक श्रीबामापद त्रिपाठी भी उन्हें गाना सुनने के लिए फरमाइश को प्रोत्साहित करने लगे। फिर तो उन्होंने जगमोहन, केएल सहगल, पंकज मलिक, मुकेश, मोहम्मद रफी, लताजी और तो और किशोर कुमार के गानों तक एक के बाद एक फरमाइश करते गए और बंदा भला कहां चूकने वाला। बैक टू बैक 32 गानें सुनाए। संख्या बकौल बामापद जी, शर्माजी आपने रथ सर को 32 गाने सुना डाले।

पसंदगी की बानगी पर नजर डालिए। दिल को तुझसे प्यार क्यों ये न बता सकूंगा मैं..(जगमोहन), इक बंगला बने न्यारा रहे कुनुबा जिसमें सारा…(केएल सहगल), कहता है जोकर सारा जमाना, आधी हकीकत आधा फसाना (मुकेश), चल उड़जा रे पंक्षी अब ये देश हुआ बेगाना.(मोहम्मद रफी), रसिक बलमा तोसे दिल क्यों लगाया, काहे रोग लगाया (लता मंगेशकर), फूलों के रंग से दिल की कलम से (किशोरदा)। इन गानों का मुखड़ा एक अंतरा सुनाकर मैंने उन्हें शीशे में उतार लिया। फिर तो अक्सर उन्हें गाने सुनाने लगा।

कवि प्रदीप के गीत उन्हें पसंद आते थे। रथ जी संपादकीय पृष्ठ पर कॉलम लिखते थे जो रविवार को छपता था। नाम था मेढक मेढ़की से बोला… ओड़िया भाषा का यह कॉलम विसंगतियों पर व्यंग्य आधारित हुआ करता था। उनके एक व्यंग्य पर समाज अखबार के दफ्तर के गेट पर महिलाओं ने प्रदर्शन तक कर डाला। मगर किसी की यह कहने की हिम्मत नहीं पड़ी कि व्यंग्य की सामग्री ज्यादा चुभने वाली नहीं होनी चाहिए। उन्हीं की चलती थी। खाता न बही जो रथ जी कहें वही सही। उनमें कभी दुर्वासा का क्रोध तो कभी महात्मा बुद्ध की करुणा जाग उठती थी। महर्षि दधिचि की तरह वह जरूरत पड़ने पर हड्डियां तक दान करने को तत्पर रहते थे। वह जानते थे कि वर्तमान परिस्थितियों में युद्ध बज्र नहीं मिसाइलों से लड़ा जाता है जिनका टेस्ट चांदीपुर (ओडिशा) में होता है।

फिलहाल रथ जी वनवास काट रहे हैं। वह कटक जिले के अटगढ़ में रहते हैं। उन्हें सावधान रहना चाहिए क्योंकि कटक में सांप बहुत पाए जाते हैं।

दीपक मालवीय का भी समर्पित सेवाभाव है। उन्हें काऊबेल्ट यानी हिंदीभाषी क्षेत्र में सेवा के क्षेत्र का प्रखर सेवी कहा जा सकता है। कॉमन-कॉज उनका एजेंडा रहता है। गोष्ठी, संगोष्ठी में शामिल होना, और इनका आयोजन करना, स्थानीय प्रतिभा को प्रोत्साहित करना, यात्रा करना, विभिन्न कल्चर के लोगों से मेलजोल, साउथ एशिया फ्रैटरनिटी को संजोए रखते हुए सम्मेलन कराना, शिक्षा में उत्तरोत्तर सुधार उनकी चिंता का विषय रहता है। शालीन स्वभाव के कारण लोग उन्हें महफिल में देखना चाहते हैं।

105 साल पुराने समाज के संचालकों की टीम में एक सदस्य भीमसेन यादव भी हैं। ये लोक सेवक मंडल का पानीपत में करीब 110 एकड़ का फार्म चलाते हैं। इसमें गेहूं, चावल आदि की बुआई कटाई और मार्केटिंग का सारा काम अकेले करते हैं। भैंस पालना इनका शगल है। बैलगाड़ी या ट्रैक्टर की सवारी मिले तो ये हवाई जहाज की यात्रा करना यदि बंद कर दें तो बड़ी बात न होगी। बकौल इन्हीं के, सांप को हाथ से पकड़ लेते हैं। एक बार पानीपत में इनको सांप ने काट लिया था तो खुद ही इलाज करके ठीक हो गए थे।

खुद ही बताते हैं कि पानीपत फार्म में सिरप के धोखे केमिकल पी गए थे। अकेले थे। रात का वक्त था। निज प्रयासों से उलटी कर-करके ठीक हो गए। जीवट व्यक्ति भीमसेन कभी बीमार नहीं पड़ते हैं। हीमोग्लोबिन घटकर पांच पर आ गया था। तो सेल्फ मेडीकेशन से ठीक हो गए। टिचन्न होकर कामकाज कर रहे हैं। चाहे जितनी लक्जरी गाड़ी हो। भीमसेन जी यदि पीछे बैठेंगे तो दोनों पांव ऊपर करके गेट के ऊपर लगा हैंडल पकड़कर आराम से चार-पांच सौ किमी यात्रा कर सकते हैं। लोकलाज के भय से यह कार्य आगे की सीट पर बैठकर नहीं करते हैं।

भीमसेन

उन्हें यदि शारीरिक विकार हुआ भी तो चिकित्सा विज्ञान को चुनौती देते हुए देसी दवाओं से खुद को ठीक कर लेते हैं। एलोपैथी पसंद नहीं करते। गोरखपुर के भीमसेन को अगर कोई उनके बल और क्षमता का स्मरण करा दे तो वह आसमान से तारे तोड़कर लाने से लेकर पाताल से कनेक्शन वाला पानी का फौव्वारा तक निकाल दें। कहने का अर्थ यह कि जुनूनी आदमी हैं। कब सोते, कब जागते, कब पढ़ते पता नहीं। इतिहास और भूगोल के साथ ही कृषि ज्ञान में चर्चा पर उतर आएं तो महान कृषि वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन भी उनके मुकाबले हारी मान लें।

भीमसेन को आप लोकसेवक मंडल के हरित क्रांति के जनक ही समझिए। गेहूं, चावल की जेनेटिक साइंस पर से लेकर ग्रामीण इलाकों में परंपरागत खेती-बारी पर निर्भर किसानों को भी ज्ञान देने के लिए इनके पास ज्ञान का भंडार है। मौसम विज्ञानी भी कमाल के। पूरे विश्व के मौसम पर पकड़ रखते हैं। आप उनके सवालों के आगे पानी मांग जाएंगे। पर जवाब न दे पाएंगे। फिर कुटिल एवं विजयी मुस्कान के साथ वह जवाब देंगे। प्रशासनिक क्षमता इतनी कि अगर भारत सरकार ‘लैटरल एंट्री’ विशेष तौर पर लागू करके इनकी सेवा कृषि या प्रशासनिक क्षेत्र में ले ले तो आश्चर्य न होगा।

संघ लोकसेवा आयोग की सेवाओं में लेटरल एंट्री के माध्यम से निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों को संयुक्त सचिव, निदेशक, उपनिदेशक जैसे पद सरकार दे सकती है। यह फिलहाल सत्ता और विपक्ष के बीच विवाद का प्रश्न बना हुआ है।

बहरहाल ‘का चुप साधि रह्यो बलवाना’ का मंत्र जाग्रत होते ही भीमसेन जी मिशन में लग जाते हैं। समाज अखबार के बोर्ड ऑफ गवर्नर के भीमसेन जब चेयरमैन हुए अखबार के अनुशासन और कार्यक्षमता की मौखिक परीक्षाएं शुरू हो गयीं थी। आपको अपनी उपयोगिता उनके सामने साबित करनी होगी। इस दौर में समाज अखबार एडिटोरियल कंटेंट में कमजोर पड़ता गया। बाकी ठीक था। जैसे टारगेट पूरा करने में, मुनाफे का अखबार बनाने में। सामाजिक क्षेत्र में धन का आवंटन किया जाना है तो पहले प्रोजेक्ट रिपोर्ट पर चर्चा कीजिए। मतलब लोग तंग सा महसूस करने लगे। ज्ञान को लेकर सर्टिफिकेट तो एक मिनट में दे दिया करते हैं।

भीमसेन जी ने एक बार मुझसे कहा शर्मा जी आप मुख्यमंत्री नवीन पटनायक का इंटरव्यू लीजिए। मैंने कहा कि समय तय करा दीजिए। आप तो उनके पास जाते रहते हैं। बोले, आप प्रश्वनावली तैयार कीजिए। मैंने करके उन्हें सौंप दी। उन्होंने पढ़ा तो उनके भीतर कृषि वैज्ञानिक जाग उठा। उन्होंने पांच-छह सवाल खेती-बारी के और जुड़वा दीजिए। मुख्यमंत्री के सचिव वीके पांडियन को प्रश्नावली सौंप आये। कुछेक दिन बाद उन्हें जवाब मिला कि उत्तर लिखवाकर भेज देंगे। मुझे उन्होंने जब यह सब बताया तो मेरा कहना था कि भले ही पांच मिनट का समय दें पर मुख्यमंत्री से मिले बिना इंटरव्यू कैसे छप सकता है? कुल मिलाकर उनके कृषि ज्ञान का ओवरफ्लो के चलते इंटरव्यू नहीं हो पाया। खेती-बारी का अति ज्ञान प्रश्नावली में न प्रवेश करता तो शायद समय मिल ही जाता।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि भीमसेन यादव के कार्यकाल में अखबार ने ग्रोथ लेना शुरू कर दिया था। भीमसेन ने एक नेक काम और किया। उन्होंने समाज परिसर में लायब्रेरी खुलवा दी। इसमें एक साथ कोई 25-30 लोग बैठकर अखबार पत्रिकाएं आदि पढ़ सकते थे। यह दोनों टाइम खुलती थी। सारे अखबार पत्रिकाएं मंगायी जाती थी। बाउंड्री से सटाकर टिन शेड लगाकर पत्र विक्रेताओं के लिए बिक्री केंद्र स्थापित किया गया था।

भीमसेन यादव का खास शौक खेती-बारी है। खुद ट्रैक्टर चलाकर लोक सेवक मंडल का पानीपत स्थित सौ एकड़ से ज्यादा खेत (फार्म हाउस) अकेले ही जोत लेते हैं। बुआई के बाद मिट्टी की बराबरी के लिए ट्रैक्टर के पीछे पाटा बांधकर बराबर कर देते हैं। भैंस से इनकी यारी है। बाकी दुनियादारी है। खुद दूध दुहते हैं। अखबार चलाते हैं तो ओडिशा जाना होता। छापाखाना सुबह पांच बजे (सिटी एडीशन) तक शांत हो जाता है पर भीमसेन शांत होकर सो जाएं तो काहे के भीमसेन। ये अखबार बिक्री केंद्रों में कटक, भुवनेश्वर या जहां भी होते है जरूर जाते हैं। सारे पत्र वितरक इनके दोस्त।

यह भी संयोग है कि ओड़िया पत्रकारिता में कोई कनपुरिया हिंदी पत्रकार कामयाबी का झंडा फहरा दे और सात साल चैन से काटकर पत्नी के दबाव में फिर कानपुर लौट आए तो यह भी बड़े कलेजे की बात है। समाज अखबार के संचालकों ने यह अवसर दिया और ओड़िया मित्रों की हौसलाआफजायी जो भी कामयाबी मिली वह संतोषजनक है। खबरें, विश्लेषण, खोजपरक रिपोर्ट सब करने का अवसर मिला। हिंदी और ओड़िया मीडिया में कवरेज मिला। यही नहीं संचालक मंडल की मर्जी से ही समाज का पोर्टल शुरू किया। जो पहले ओड़िया, हिंदी और अंग्रेजी में चलता रहा। बाद में सिमटकर ओड़िया भाषा तक ही रह गया। इस कार्य में महाप्रबंधक प्रियब्रत महंति के इनोवेटिव आइडिया काम आए। विज्ञापन जुटाकर धन की कमी नहीं होने दी।

समाज संपादकीय टीम की कमान गोपाल महापात्रा के बाद सत्यराय के हाथ में आई। ओडिशा विधानसभा पहुंचने की महत्वाकांक्षा ने उनके संपादक पद की बलि ले ली। फिर कार्यवाहक संपादक सुशांत महंति बनें। उनकी टीम में अनुपम प्रहराज, काली सतपथी, सुरेंद्र पलई, देबी बाबू, रघुनाथ महापात्रा, बाबू गोपी बाबू फोटोग्राफर, मानस स्वैं, समरेंदु दास, प्रसन्न पति, रवि जेना, प्रमोद सामंतराय, मनोज स्वैं आदि नगीनें समाज तैयार करते थे। जिलों में भी दिग्गज पत्रकारों की फौज है। प्रबंधन में बेहद जुनूनी महाप्रबंधक प्रियब्रत महंति के नेतृत्व में देवब्रतदास, संजय मिश्रा, मीनाकेतन बेहरा, प्रबातदास, कृष्णा साहू आदि समाज के संचालन में अवरोध नहीं आने देते थे। दीपक मालवीय बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट के चेयरमैन बनें तो 11 संस्करण ओडिशा में चालू हुए।

दैनिक जागरण, अमर उजाला समेत कई अख़बारों में वरिष्ठ पदों पर रहे वरिष्ठ पत्रकार महेश शर्मा से संपर्क 9260973105 के ज़रिए किया जा सकता है।

पिछला भाग…

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