महेश शर्मा-
आर्थिक उदारीकरण और मीडिया उद्योग पर लगातार बढ़ते कॉर्पोरेट एकाधिकार ने मीडिया परिदृश्य ही बदल दिया। लेबर बीट, एग्रीकल्चर बीट तो मानों इतिहास की बात हो गयी। लुप्त हो चुकी इन बीटों का कभी जलवा हुआ करता था। पत्रकारिता पूरी तरह से व्यापारिक हाथों में जा चुकी है। कानपुर की पहचान ही उद्योगों का शहर की थी। अब यह उद्योगों का कब्रिस्तान बन चुका है।
सूती मिलों में न्यू विक्टोरिया मिल्म, म्योर मिल्स, अर्थटन मिल्स, लक्ष्मीरतन कॉटन मिल्स, स्वदेशी कॉटन मिल्स, कानपुर टेक्सटाइल मिल्स (कॉटेक्स), एलगिन मिल नंबर दो, लाल इमली, जेके रेयान मिल्स, जेके कॉटन स्पिनिंग एंड वीविंग मिल्स, जेके मैन्युफैक्चरर्स मिल्स, गणेश फ्लोर मिल्स, जेके आयरन एंड स्टील, जेके साटो, टेफ्को जैसे बड़े कारखाने सालों से बंद पड़े रहे हैं।
ये उत्तर भारत का मैनचेस्टर कहे जाने वाले कानपुर में औद्योगिक कब्रिस्तान का सा एहसास कराते हैं। यहां पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लाखों मजदूर काम करता था। रात-दिन सड़कों पर चहल-पहल रहती थी। हर अखबार को लेबर बीट के लिए रिपोर्टर रखना पड़ता था। दैनिक जागरण ने तो एक समय हिंद मजदूर सभा के प्रांतीय सचिव राम किशोर त्रिपाठी को श्रम संवाददाता बना लिया था। त्रिपाठी जी गेस्ट मीटिंग, समझौता वार्ताओं में जाते थे। वह रिपोर्टिंग भी किया करते थे।
एनटीसी के चेयरमैन राजेंद्र साहनी की प्रेसवार्ता में बतौर रिपोर्टर पहुंचे रामकिशोर त्रिपाठी को देखकर साहनी चौंक गए। मजाकिया अंदाज में बोले, ये काम भी आप करते हैं। वेरी गुड। स्वागत है। लेबर बीट के रिपोर्टरों को फैक्टरी एक्ट समेत श्रमिक हित से जुड़े कानूनों की थोड़ा बहुत जानकारी रखना अनिवार्य था। बंदा भी इन्हीं लोगों की सोहबत में कुछ न कुछ सीख गया था।
एक समय कानपुर में लेबर बीट के रिपोर्टर का जलवा हुआ करता था। कानपुर के वरिष्ठ पत्रकार वाईडी लोशाली नेशनल हेराल्ड अखबार के लेबर बीट के विशेषज्ञ रिपोर्टर हुआ करते थे। स्वदेशी मिल कांड के दौरान वह सिटी रिपोर्टर थे। कानपुर के ही गणेश दत्त वाजपेयी (दद्दू) श्रम मंत्री थे। लोशाली जी ने मेरा रशियन नाम रखा था। महेशोविश शरमेव। इसी नाम से पुकारते भी थे। ड्रिंक के शौकीन थे। पर कम मात्रा में टुन्न होने लगते थे तो उन्हें विष्णुपुरी घर छोड़कर आता था। हम सब उन्हें प्यार करते थे।
तब वह एआईपी के कानपुर संस्करण में लोकल हेड थे। उन दिनों 15-20 रुपये का एक निप (क्वार्टर) कंट्रीब्यूट करके खरीदते थे। तीन लोग पीते थे। एक स्माल मैं और बाकी लोशाली जी और अनिल शुक्ला। दो पैग के बाद लोशाली जी अंग्रेजी बोलते हुए कहते थे, ‘महेशोविश इट्स इनफ। लीव मी टू माई प्लेस।’
वह हम जूनियरों के बीच एक वाकया शेयर करते थे कि किस तरह उनके संपादक (एम चेलापतिराव) ने मिल मालिकों का पक्ष नेशनल हेराल्ड में न छपने की शिकायत की थी तो संपादक जी ने उनसे सीधे कहा था कि संबंधित रिपोर्टर से बात कीजिए। यह कहते हुए फोन काट दिया था।
स्वदेशी कॉटन मिल की कथा इस प्रकार है
स्वदेशी कॉटन मिल में 47 साल पहले जो हुआ उसे याद कर पुराने लोग आज भी सहम जाते हैं। उस पीढ़ी के कुछेक लोग बचे हैं जो स्वदेशी मिल कांड पर याददाश्त के मुताबिक बताते हैं। दरअसल यहां 6 दिसंबर 1977 के दिन मजदूरों को बड़ी ही बेदर्दी से कुचला गया था। कानपुर स्वदेशी कॉटन मिल गोलीकांड का गवाह बना था। लिखा-पढ़ी में है कि इस दिन एक दर्जन से अधिक मजदूर और अफसर शहीद हुए थे। बाद में मजदूरों और अफसरों की याद में यहां शहीद स्मारक बनवाया गया। वर्षों तक यहां हर साल मेला लगा, लेकिन अब यादों का सिलसिला धुंधला होता जा रहा है। मिले बंद होने के बाद तो शहीद स्मारक स्थल पर कोई चार फूल भी चढ़ाने नहीं आता। खबरें पढ़ने में रुचि होने के कारण जानकारी रहती थी।
पूर्व केंद्रीय मंत्री जॉर्ज फर्नाडीज की मासिक पत्रिका प्रतिपक्ष ने स्वदेशी मिल कांड की घटना तफसील से रिपोर्ट की थी। इंडिया टुडे के फीचर एडिटर दिलीप बॉब ने भी घटना पर रिपोर्ताज लिखा था। कानपुर और लखनऊ के अखबार तो रंगे रहते थे। लेबर रिपोर्टर लोशाली बताते थे कि श्रममंत्री वाजपेयी ने संपादक चेलापति राव से शिकायत की कि उनका रिपोर्टर (वाईडी लोशाली) एकतरफा रिपोर्टिंग कर रहा है। सेवायोजक राजाराम जयपुरिया का वक्तव्य नहीं छापता। यह सुनते ही संपादक जी ने श्रममंत्री से कहा कि टाक टू रिपोर्टर। कहने का मतलब रिपोर्टर को इतनी स्वतंत्रता थी कि वह खुद निर्णय ले, क्या करना है और क्या नहीं करना है।
एटक के ट्रेड यूनियन लीडर रहे सीपीआई के राज्य सचिव अरविंदराज स्वरूप बताते हैं कि स्वदेशी कॉटन मिल में कार्यरत मजदूरों को कई पंद्रहिया (तब 15-15 दिन में तनख्वाह मिला करती थी) से वेतन नहीं मिल रहा था जिसके विरोध में मजदूरों ने आंदोलन छेड़ दिया था। वेतन का मामला होने के कारण मजदूरों के साथ कुछेक अफसर भी सुर में सुर मिलाने लगे। आंदोलन को कुचलने के लिए 6 दिसंबर 1977 को प्रबंधन के इशारे पर जिला प्रशासन ने पुलिस को फायरिंग के आदेश दे दिए थे।
इस गोलीकांड में 11 मजदूरों के साथ दो अफसर शहीद हो गए। इसके बाद इस गोलीकांड की आग पूरे शहर में भड़क गई। अरविंद बताते हैं कि एटक से हरबंस सिंह, संत सिंह यूसुफ आदि गेट पर जाते थे। कई मजदूर नेता विधायक बने। गणेश दत्त वाजपेयी तो श्रममंत्री थे। केंद्रीय उद्योग मंत्री जॉर्ज फर्नाडीज के दखल से स्वदेशी मिल की सभी चारों मिलों का राष्ट्रीय करण हो गया था। एनटीसी को चलाने का अवसर दिया गया। पूर्व विधायक भूधर नारायण मिश्रा बताते हैं कि स्वदेशी कांड के विरोध में उन्होंने नवीन मार्केट सहित शहर के बाजार बंद करवाने शुरू कर दिए। उन्हें गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया। चार दिन बाद छोड़ा गया।
वक्त के साथ यहां हुए मजदूरों के आंदोलन और गोलीकांड की धार सुस्त हो गई। धीरे-धीरे सोशलिस्ट का जोर बढ़ने लगा, लेकिन जल्द ही सोशलिस्ट भी संयुक्त व प्रजा के रूप में दो धाराओं में फूट गई। धीरे-धीरे स्मारक की यादें धुंधली हो चुकी हैं, मजदूरों का आंदोलन कुंद हो चला है। आज की युवा पीढ़ी को इसके बारे में कुछ याद नहीं। अरविंद राजस्वरूप बताते हैं कि 6 दिसबंर 1977 को जुही स्थित स्वदेशी मिल में वेतन को लेकर मजदूर और अफसरों के बीच खूनी संग्राम हुआ था। मिल के मैनेजर को ब्वायलर में झोंकने के बाद पुलिस और मजदूरों के बीच जंग हुई थी। पांच घटे तक चली मुठभेड़ के दौरान 11 की जान गई थी, तो कई दर्जन पुलिस बल के जवान घायल हुए थे। इसी के बाद मजदूरों की पकड़ सत्ता और प्रशासन से दूर होती गई। स्वदेशी कांड की कथा रोचक और लोमहर्षक भी है।
सर हेनरी हॉर्समैन की स्वदेशी कॉटन मिल्स को 1946 में कलकत्ता के तत्कालीन मंगतूराम जयपुरिया परिवार ने खरीद लिया था। यह परिवार सूत का कारोबार करता था। युद्ध के बाद कपड़ा उद्योग में धीरे-धीरे आई तेजी की बदौलत कानपुर की यह मिल एक औद्योगिक साम्राज्य की आधारशिला बन गयी, जो हाल ही तक उत्तर प्रदेश में सबसे बड़े औद्योगिक साम्राज्यों में से एक था।
जयपुरिया परिवार को व्यापार के प्रति ठेठ मारवाड़ी नज़रिया हासिल था। कानपुर पहले से ही भारत के सबसे बड़े राज्य का औद्योगिक केंद्र बनने के संकेत दे रहा था और कपड़ों की बढ़ती मांग को देखते हुए इस मिल ने तेज़ी से चार अन्य कपड़ा मिलों का अधिग्रहण कर लिया। दो उत्तर प्रदेश में और एक-एक उदयपुर और पांडिचेरी में।
पाँच जयपुरिया मिलों में से, कानपुर इकाई सबसे बड़ी थी, जिसमें 10,000 से ज़्यादा कर्मचारी काम करते थे। कपड़ा मिलों के अलावा, जयपुरिया के पास यूपी में दो चीनी मिलें और दो कोयला खदानें भी थी।
जयपुरिया साम्राज्य की प्रमुख स्वदेशी मिल कंपनी आज खत्म हो चुकी है। मिल को नाश करने में दो भाइयों राजाराम जयपुरिया और सीताराम जयपुरिया का बड़ा हाथ रहा।
बहरहाल धाकड़ लेबर रिपोर्टिंग के चलते जयपुरिया का भ्र्ष्टाचार उजागर होता रहा। उन्हें सरंक्षण देने वाली सरकार और उनका अपना मीडिया पायनियर और स्वतंत्र भारत टापता रह गया।
दैनिक जागरण, अमर उजाला समेत कई अख़बारों में वरिष्ठ पदों पर रहे वरिष्ठ पत्रकार महेश शर्मा से संपर्क 9260973105 के ज़रिए किया जा सकता है।
पिछला भाग…
कानपुर वाले महेश शर्मा का पत्रकारीय जीवन (पार्ट-16) : शहर से ‘जनसत्ता’ छापने के प्लान पर सिंहानिया ने पानी फेर दिया


