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कानपुर वाले महेश शर्मा का पत्रकारीय जीवन (पार्ट-16) : शहर से ‘जनसत्ता’ छापने के प्लान पर सिंहानिया ने पानी फेर दिया

महेश शर्मा-

कबर इलाहाबादी भी क्या जिंदादिल इंसान थे। उनका शेर है, ’खींचों न कमानों को न तलवार निकालो, जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो’ यह शेर उन्होंने तब लिखा था जब फिरंगी हुकूमत की क्रूरता अपने चरम पर थी। शायर की दूरदर्शिता और जज्बे को सलाम इसलिए कि उसने अखबार को तब एक बड़ी ताकत के रूप में देखा था। यह बात ठीक वैसे ही थी जैसे कि नेपोलियन बोनापार्ट ने कहा था कि चार विरोधी अखबारों की मारक क्षमता के आगे हजारों बंदूकों की ताकत बेकार है।

अकबर इलाहाबादी के जज्बे को सलाम करते हुए अहमद फ़राज का एक शेर याद आ गया जो उन पर निछावर करने का मन हो गया है। अर्ज है कि ‘उसने नजर-नजर में ही ऐसे भले सुखन कहे मैंने भी उसके पांव में सारा कलाम रख दिया। ‘लेकिन यहां पर यह कहना उचित होगा कि सैयद अकबर हुसैन तखल्लुस अकबर इलाहाबादी को अखबार की ताकत का अंदाजा कनपुरिये अखबार नवीसों से ही मिला होगा। अकबर इलाहाबादी 16 नवंबर 1846 को पैदा हुए थे और 9 सितंबर 1921 को उनका इंतकाल हो गया था।

दूसरी तरफ हिंदी भाषा में ‘उदन्त मार्तण्ड’ के नाम से पहला समाचार पत्र 30 मई 1826 में निकाला गया था। कानपुर के रहने वाले पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने इसे कलकत्ता से एक साप्ताहिक समाचार पत्र के तौर पर शुरू किया था। इसके प्रकाशक और संपादक भी वे खुद थे। शायर को भी अखबार की ताकत का अंदाजा कनपुरिये जर्नलिस्ट से ही मिला होगा। हिंदी पत्रकारिता में अव्वल तो कानपुर ही है। उदन्त मार्तण्ड के प्रकाशन वाला दिन 30 मई ही हिंदी पत्रकारिता दिवस का होता है। भले ही इसकी सांस छह माह तक ही रही हो।

लोकतंत्र के तीन खंभों विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बाद चौथा खंभा मीडिया को माना जाता है। यह बात दीगर है कि यह खंभा पत्रकारों के ही कारण दरकने लगा है। चाहे वो दिल्ली के हों या कानपुर के। पत्रकारिता में परिवर्तन का दौर चला तो कानपुर भी बचकर न रह पाया। वैसे तो पत्रकारिता हमेशा से ही सूचनात्मक, शिक्षाप्रद एवं मनोरंजनात्मक संदेश पहुंचाने का माध्यम रही है। समाचार पत्र, चैनल और वेब पोर्टल उस उत्तर पुस्तिका के समान है, जिसके लाखों परीक्षक एवं अनगिनत समीक्षक होते हैं। हालांकि तथ्यपरकता, यथार्थवादिता, संतुलन एवं वस्तुनिष्ठता इसके आधारभूत तत्व है, लेकिन इनकी कमियां आज पत्रकारिता के क्षेत्र में बहुत बड़ी त्रासदी साबित होने लगी हैं।

खबरों को सनसनीखेज बनाकर पाठकों को परोसने के चलन ने पत्रकारिता का बड़ा नुकसान किया है। आप कानपुर से प्रकाशित होने वाले अखबारों की समीक्षा करें तो सत्ता की गोद में बैठने वाले ठीकठाक संख्या में मिलेंगे। अंग्रेजी में इंडियन एक्सप्रेस तो हिंदी में दैनिक भास्कर थोड़ी बहुत इज्जत बचाए हैं। वहां पत्रकारिता की जाती है। डिजिटल मीडिया का एक वर्ग भी पत्रकारिता जनता के लिए कर रहा है।

अखबार को कारोबार के रूप में लेने और कार्पोरेट घरानों के हाथों में जनमाध्यम पहुंचने से इसकी साख का बहुत नुकसान हुआ है। खबरों में निहित स्वार्थ साफ झलकने लग जाता है। यही नहीं आज समाचारों में अपने निजी विचार को शामिल किया जा रहा है। समाचार विचारों की जननी होती है इसलिए समाचारों पर आधारित विचार तो स्वागत योग्य हो सकते हैं, लेकिन विचारों पर आधारित समाचार स्वीकार्य नहीं होते हैं। कुछ अखबारों ने संपादक समाचार और संपादक विचार। दोनों पद अलग-अलग कर दिए थे। अब फिर घालमेल हो गया। मिशन तो भूल जाइए। अखबार उत्पाद और पाठक उपभोक्ता बन चुका है। तिमाही बैलेंस शीट प्रकाशित की जाती है। मुनाफा बढ़ाने की होड़ मची है। आंतरिक और बाह्य ऑडिट सब किया जाता है। कभी खबरों का भी ऑडिट हो जाता। इसे सोशल ऑडिट कहा जा सकता है।

धीरे-धीरे पाठक ऑडिट करने लगा है। कानपुर में अखबारी मंडी में एकाधिकार समाप्त सा हो गया है। कानपुर का पाठक वर्ग आज, स्वतंत्र भारत, अमर उजाला, हिंदुस्तान, राष्ट्रीय सहारा, अमृत विचार की तरफ बढ़ने लगा है। दैनिक जागरण और अमर उजाला के क्रमश: आई-नेक्स्ट और कॉम्पैक्ट टेब्लॉयड संस्करण लगभग फेल हो गए। उछाल की तरह धड़ाम भी हुए। जैसे शेयर मार्केट में होता है। इमरजेंसी के दौरान कानपुर की पत्रकारिता ने भी तेवर दिखाए। दैनिक जागरण के स्वनामधन्य संपादक नरेंद्र मोहन जी ने संपादकीय कॉलम की जगह खाली छोड़कर विरोध दर्ज किया था। हिंदी पत्रकारिता ने यहां तेवर दिखाए। प्रेस पर सेंसर के विरोध में अखबारों ने सिर उठाया तो लगा कि यह भ्रष्टाचार मिटाओ अभियान के मिशन को लेकर तेजी से आगे बढ़ रही है।

पुराने लोग बताते हैं कि तमाम पत्रकार, लेखक, कवि और रचनाकारों ने कलम और कागज के माध्यम से ही गजब की क्रांति की। पत्रकारिता के माध्यम से उन्हीं सच्चे पत्रकारों ने कई तरह के भ्रष्टाचार उजागर भी किये सत्ता पलट दी कई बार खुद सरकार बैकफुट पर नज़र आई।

इमरजेंसी के बाद रामनाथ गोयनका का मीडिया हाउस एक्सप्रेस ग्रुप ने हिंदी भाषा का जनसत्ता अखबार का प्रकाशन किया। संपादक हुए प्रभाष जोशी। जनसत्ता का कानपुर संस्करण भी लाने की प्लानिंग बन चुकी थी। पहले मैं यह सुना करता था कि सिंहानिया घराने की बहु कविता सिंहानिया जनसत्ता संस्करण संचालित करेंगी। कविता सिंहानिया जेके ग्रुप के चेयरमैन रहे डॉ. गौरहरि सिंहानिया के पुत्र यदुपति सिंहानिया की पत्नी थीं।

मुझे कुछ यूं पता चला कि एक बार कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती कानपुर आए और सिंहानिया औद्योगिक घराने के कानपुर के जेके धर्मशाला में उन्हें ठहराने की व्यवस्था की गयी थी। उन दिनों मैं अमर उजाला का रिपोर्टर था। उन्हें कवर मुझे ही करना था। मैं ठीक आठ बजे सबेरे जेके धर्मशाला पहुंच गया था। चुपचाप बैठ गया। उस समय डॉ गौरहरि सिंहानिया की पत्नी श्रीमती सुशीला सिंहानिया, शंकराचार्य से बातचीत कर रही थीं। इसी बीच शंकराचार्य ने कविता सिंहानिया की बाबत पूछा तो उन्हें बताया गया कि वह अमेरिका में हैं और आजकल जनसत्ता का कानपुर संस्करण निकालने पर कुछ प्लानिंग कर रही हैं।

अखबार का छापाखाना जेके टेलीविजन फैक्ट्री परिसर में लगाया जाना था। तैयारियों के सिलसिले में महेंद्र बहादुर सिंह को जनसत्ता का कानपुर ब्यूरो सौंपा गया। उन दिनों राजीव गौतम इंडियन एक्सप्रेस और जनसत्ता का प्रबंधन देख रहे थे। महेंद्र बहादुर सिंह जिन्हें एमबी के नाम से पुकारा जाता है, वह बताते हैं कि कोई 1993 के आस-पास की बात है तब बसपा के समर्थन से मुलायम सिंह यादव की सरकार थी। जनसत्ता अखबार खोलने के लिए गोयनका परिवार के मनोज संथोलिया, राजीव गौतम और महेंद्र बहादुर सिंह लखनऊ में मुलायम सिंह यादव से मिलने गए। वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्रा ने चीफ मिनिस्टर से टाइम तय करा दिया था।

दिल्ली में जनसत्ता के संपादक राहुल देव जी थे। कानपुर के सत्यप्रकाश त्रिपाठी भी दिल्ली में ही थे। खैर बातचीत हुई पर बाद में यह योजना टाल दी गयी। कविता सिंहानिया रामनाथ गोयनका की बेटी हैं कविता गोयनका उनका नाम था बाद में वह कविता सिंहानिया टाइटिल हो गईं।

कानपुर को पत्रकारिता के क्षेत्र में और अधिक समृद्ध करने वाला अखबार जनसत्ता के प्रकाशन की योजना पर समय की गर्द ऐसी पड़ती गयी कि हालात ने इस प्रस्ताव की भ्रूण हत्या कर दी। इसके पीछे बकौल महेंद्र बहादुर सिंह, दरअसल डॉ. गौरहरि सिंहानिया अखबार के प्रकाशन के पक्ष में बिल्कुल नहीं थे। उनका कहना था कि कारखाना चलाने वाले लोग हैं, हजारों, लाखों की रोजी-रोटी चलती है। कामकाज को लेकर सरकार से तालमेल बनाकर चलना पड़ता है। इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप का अखबार जनसत्ता अपने तेवरों के लिए पहचाना जाता है। मीडिया को विपक्ष की भूमिका निभाने के सिद्धांत के आधार पर तो खटपट होती ही रहेगी।

मेरे पत्रकारीय जीवन और डॉ. गौरहरि सिंहानिया से जुड़ा एक वाकया याद आ गया तो सोचा बता दूं, पुरानी बात है उन दिनों बंदी के कगार पर पहुंच जाने वाले रुग्ण कारखानों की सेहत सुधार के लिए बीआईएफआर (बोर्ड ऑफ इंडस्ट्रियल एंड फाइनेंसियल री-कांस्ट्रक्शन) यानी औद्योगिक पुनर्निर्माण एवं वित्तीय बोर्ड केंद्र सरकार ने बनाया था। एनटीसी, बीआईसी की मिलों को उसे रिफर कर दिया गया था। बीआईएफआर की व्यवस्था से यदि सेवायोजक संतुष्ट नहीं हैं तो एआईएफआर जा सकते हैं। यह उसकी अपीलेंट बॉडी थी।

हमारे संपादक श्रीयुत सत्यप्रकाश त्रिपाठी ने एक रिएक्शन स्टोरी मांगी। स्थापित ट्रेड यूनियन नेता जैसे सुभाषिनी अली सहगल, अरविंदराज स्वरूप, विमल मेहरोत्रा, रामकिशोर त्रिपाठी, गणेश दीक्षित और दूसरी तरफ सेवायोजकों में डॉ. गौरहरि सिंहानिया, डीएन दीक्षित, इम्प्लायर्स एसोसिएशन ऑफ नार्दन इंडिया के जेएन श्रीवास्तव, एमएमएस राणा से बातचीत करके फोटो समेत फुलपेज की स्टोरी बनाओ। त्रिपाठी जी ने मुझे यह कार्य सौंपा।

उनकी कसौटी पर खरा उतरने के कारण उन्हें लगा होगा कि चर्चित पेज पाठकों को दिया जा सकता है। सबसे फ्रेंडली बातचीत डीएन दीक्षित से हुई और औपचारिकता लिए हुए एक बड़े उद्योगपति डॉ. सिंहानिया से वार्ता हुई।

पहले से टाइम तय कर लिया था। कमला टॉवर गया। ग्राउंड फ्लोर पर ही एक गार्ड मेरा इंतजार कर रहा था। जैसे उसे नाम बताया तो वह बड़े आदर पूर्वक मुझे लिफ्ट से गौर बाबू के पीए के पास ले गया। पीए साहब ने खड़े होकर वेलकम किया और इंटरकॉम से गौर बाबू को सूचना दी कि महेश शर्मा आ गए हैं। उधर शायद यही कहा गया होगा कि उन्हें सम्मानपूर्वक ले आइए। मुझे उन तक ले जाने में पीए साहब ने जो विनम्रता दिखायी उससे ऐसा लग रहा था कि जैसे किसी बड़ी कंपनी या प्रौद्योगिकी संस्थान के सर्वेसर्वा के साथ जेके ग्रुप कोई एमओयू (मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग) पर हस्ताक्षर करने जा रहा हो।

मैं भी हतप्रभ था पर नर्वस नहीं। क्योंकि मेरी आदत थी, होमवर्क करके जाने की। विषय की बारीकियों से यदि वाकिफ हैं तो आत्मविश्वास से लबरेज हो जाते हैं। पत्रकारिता में आने वाली नयी पीढ़ी को यह करना चाहिए। पत्रकारिता में भविष्य तलाशने वाली पीढ़ी होमवर्क करती भी होगी।

खैर, पीए साहब ने ऑफिस का दरवाजा खोला तो सामने गौरवर्ण के आकर्षक डीलडौल वाले डॉ.गौरहरि सिंहानिया बैठे थे जो मेरे एंट्री लेते ही मेरा अभिवादन स्वीकारते हुए खड़े हो गए। बैठने का इशारा किया फिर वह भी बैठ गए। उनका यह अंदाज देखकर मैं गदगद हो गया।

एक अदने से पत्रकार का इतना स्वागत। बाद में हमारे संपादक ने बताया कि उन्होंने मीडिया को सम्मान दिया था। और विषय भी बिल्कुल नया था। साक्षात्कार हुआ फुलपेज में मैटरर छपा। और सबसे बढ़िया बातचीत गौर बाबू वाली छपी।

उसके बाद कानपुर क्लब में दो मुलाकातें हुई थीं। वह क्लब की पॉलिटिक्स में भी कभी-कभी रुचि लेते थे। जिस पर वह हाथ धर देते थे उसका निर्वाचित होना तय माना जाता था। तत्कालीन सचिव आरके गर्ग (कक्कू गर्ग) से कहकर मुझे उन्होंने कानपुर क्लब ऑनरेरी मेम्बरशिप कार्ड भी दिला दिया था। यह मेरे लिए और भी सम्मान की बात थी। यह कानपुर में पत्रकारिता को सम्मान देने का एक नायाब उदाहरण मैंने प्रस्तुत किया। यदि आप वास्तव में पत्रकारिता करते हैं शहर हाथोंहाथ लेने को तैयार बैठा है।

मेरी पत्रकारीय परवरिश भी कुछ ऐसे ही हुई। विष्णु त्रिपाठी जी, योगेश वाजपेयी जी के साथ से शुरुआत हुई और खबर की कॉपी संपादन करने वाला पीयूष त्रिपाठी जैसा अलमस्त तबीयत का न्यूज एडीटर। फिर क्या पटरी बैठ गयी। स्वनामधन्य संपादक नरेंद्र मोहन जी, सत्यप्रकाश त्रिपाठी, अच्युतानंद मिश्रा, डॉ वीरेन डंगलाव, प्रदीप कुमार, फिर नरेंद्र मोहन जी और उनके निधन के बाद संजय गुप्ता जी, शशिशेखर जी, प्रताप सोमवंशी, देवप्रिय अवस्थी, दिनेश जुयाल, अंशुमान तिवारी, गुलाब कोठारी जी, शंभूदयाल वाजपेयी जी ने तराशा। खुद को सदैव छात्र ही समझा। बात कभी बिगड़ी ही नहीं। हां, खुद ही ठसकबाजी के चलते संस्थान छोड़ देना कमजोरी रही।

कानपुर में आज भी कई पत्रकार अपने पूरे जज्बे के साथ पत्रकारिता करते दिखाई देते हैं। अनूप, राजेश, राजवीर, संतशरण अवस्थी आदि की पीढ़ी के बाद के पत्रकारों में भी दमखम दिखती है। कुछ भटक भी गए। कोरोना काल में हालांकि मैं बाहर था। पर आने पर पत्रकार मित्रों की साहसिक रिपोर्टिंग के चर्चे सुनने को मिलते थे। एबीपी गंगा चैनल के रिपोर्टर रतीश त्रिवेदी जैसा जुझारू पत्रकार तो शायद ही दिखायी देता हो, कोरोना के चलते काल के गाल में समा चुके शवों को गंगा बालू खोदकर निकाल लिया। साबित किया कि मौत का सरकारी आंकड़ा झूठा है। इसे कहते हैं दमदारी वाली जुनूनी पत्रकारिता। कहां लोग एक दूसरे से मिलने में कतराते थे तो दूसरी तरफ वैभव शुक्ला जैसे फोटोग्राफर भैरोघाट में शवों का अंबार अखबार के माध्यम से जनता को दिखा रहे थे।

कोरोना वायरस के ख़ौफ़ का मंजर सभी की निगाहों ने साफ देखा होगा। ये हमारे पत्रकार साथी कोरोना योद्धा ही तो थे। पत्रकार तब भी (कोरोना काल में) अपनी ज़िम्मेदारी को निभाते हुए कभी अस्पतालों से, कभी सड़कों से, कभी कहीं से तो कभी कहीं से सच्चाई सामने लाते ही रहे। लोगों को मालूम होगा कि कोरोना काल में ही ना जाने कितने पत्रकारों ने अपनी जान तक गंवाई। ऐसे कोरोना संक्रमित पत्रकार भी थे जिनकी कलम नहीं रुकी। आइसोलेशन में रहते हुए भी पत्रकारिता की।

खैर, ये बात तो पत्रकारों के जज्बे की है। पत्रकार और पत्रकारिता के बारे में सोशल मीडिया में तमाम तरह की बातें की जाती है। यह बात कही जाने लगी है कि कभी ब्रॉडकास्टिंग बिल तो कभी गाइडलाइंस के माध्यम से सरकार प्रेस की आजादी पर पहरा लगाने का प्रयास कर रही है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) के बोलने एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़कर देखा जाता है यानी की प्रेस की आजादी मौलिक अधिकार के अंतर्गत आती है। इसके बाद भी पत्रकारिता का गला घोंटने के जब तब प्रयास होते ही रहे। चाहे इमरजेंसी के दौरान सेंसरशिप हो या नौवें दशक में बिहार सरकार का प्रेस विधेयक। यह भी काफी हद तक सच है कि मीडिया पर प्रलोभन और धन कमाने की चाहत की बात कही जाती है।

खबरों व डिबेट्स के नाम पर फेक न्यूज का चलन इस बात को पुख्ता करता है। मीडिया पर अंकुश होना चाहिए पर एक मर्यादा के भीतर। सोशल मीडिया में सक्रिय रहने वाला हर व्यक्ति खुद को पत्रकार समझने लगा है, जिसकी वजह से असली पत्रकारों की छवि पर बुरा असर पड़ने लगा है। साथ ही यह लोकतंत्र के लिए भी घातक है।

एथिक्स, निष्पक्षता, और वॉच डॉग का महत्व मीडिया पर होने वाले सेमिनार, मीटिंग्स और इन दिनों वर्चुअल प्रोग्राम में होने वाली चर्चाओं, पत्रकारों की तारीफ, पत्रकारिता पर लंबी चर्चा, कौन सा अखबार पहले छपा कौन सी मैगज़ीन पहली थी, बस इन्ही बातों पर सिमट कर रह गया है। इन फिजूल की बहस के माहौल में पत्रकारिता के माध्यम से इतिहास गढ़ने की बात गले नहीं उतरती। आज मीडिया की दिशा व दशा को लेकर गंभीर चिंतन की आवश्यकता है।

कानपुर जो सही अर्थों में हिंदी पत्रकारिता की जननी है, यहां भी ऐसी गोष्ठियों का अभाव दिखता है। 30 मई 1826 में हिंदी का पहला अखबार कोलकाता तब कलकत्ता से निकालने वाले पंडित जुगुल किशोर शुक्ल कानपुर की ही पैदाइश थे। उनके अखबार उदन्त मार्तण्ड का शाब्दिक अर्थ है ‘समाचार-सूर्य‘। अपने नाम के अनुरूप ही उदन्त मार्तण्ड हिंदी समाचार दुनिया में सूर्य के समान ही था। यह पत्र ऐसे समय में प्रकाशित हुआ था जब हिंदी भाषियों को अपनी भाषा के पत्र की जरूरत महसूस हो रही थी। लेकिन उस समय औपनिवेशिक ब्रिटिश भारत में उन्होंने परतंत्र भारत की राजधानी कलकत्ता को अपनी कर्मस्थली बनाया।

परतंत्र भारत में हिंदुस्तानियों के हक की बात करना बहुत बड़ी चुनौती बन चुका था। उन्होंने कलकत्ता के बड़ा बाजार इलाके में अमर तल्ला लेन, कोलूटोला से साप्ताहिक ‘उदन्त मार्तण्ड’ का प्रकाशन शुरू किया। यह साप्ताहिक अखबार हर हफ्ते मंगलवार को पाठकों तक पहुंचता था। यह किसी कनपुरिये के ही बूते की बात थी जो जुगुल बाबू ने कर दिखाया। पंडित जुगल किशोर ने सरकार से बहुत अनुरोध किया कि वे डाक दरों में कुछ रियायत दें, जिससे हिंदी भाषी प्रदेशों में पाठकों तक समाचार पत्र भेजा जा सके, लेकिन ब्रिटिश सरकार इसके लिए राजी नहीं हुई। पैसे की तंगी से यह अखबार बंद हो गया।

कहीं पढ़ा था कि शुक्ल को 79 अंक निकालने के बाद अंतिम अंक में लिखना पड़ा कि, ‘आज दिवस लौं उग चुक्यौ मार्तण्ड उदन्त, अस्ताचल को जात है दिनकर दिन अब अन्त।’ लेकिन डेढ साल में ही डूबने वाले इस ‘‘मार्तण्ड’’ ने जो रोशनी भविष्य की पीढ़ी को दिखाई उसका लाभ स्वाधीनता आन्दोलन को भी मिला। बंद होने से पहले इसने हिंदी पत्रकारिता के सूर्य को उदित कर दिया था जो आज भी देदीप्यमान है।

दैनिक जागरण, अमर उजाला समेत कई अख़बारों में वरिष्ठ पदों पर रहे वरिष्ठ पत्रकार महेश शर्मा से संपर्क 9260973105 के ज़रिए किया जा सकता है।

पिछला भाग…

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1 Comment

1 Comment

  1. Shekhar Gupta

    September 18, 2024 at 8:45 pm

    नये पत्रकारों को आपके लेख से सही दिशा इमानदारी से कार्य करने की प्रेरणा के साथ महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध हो रही है । आपकी निष्पक्ष व निर्भीकता से की जा रही पत्रकारिता को प्रणाम

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