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कानपुर वाले महेश शर्मा का पत्रकारीय जीवन (पार्ट-18) : वर्षों बाद फिर मिले शम्भू दयाल वाजपेयी!

मेरी दिली इच्छा है कि वाजपेयी जी अपने अमृत विचार में लौट आएं। जैसे उन्हें अखबार से इश्क है वैसे ही उनकी टीम को उनसे है। टीम का अखबार के प्रति इश्क तो उन्हीं ने पैदा कर दिया। उन्होंने पत्रकारों की गरिमा का सदैव ही ध्यान रखा…

महेश शर्मा-

श्रीमन शम्भू दयाल वाजपेयी जी ने अमृत विचार में बतौर संपादक अपनी पारी को फिलहाल गुड बाय कह दिया। मेरे व्यक्तिगत मित्रों के अलावा उनका नाम भी उन संपादकों में शामिल हो गया जिनसे मेरा खासा राब्ता रहा। इस प्रकार वह मेरी पुस्तक ‘रिपोर्टर के रफ नोट्स’ का हिस्सा बन गए। पेशा हो, समाज हो, या परिवार हो या रिश्तें हों, किसी भी पत्रकार के लिए संवेदनशीलता पत्रकार होने की पहली शर्त है।

वाजपेयी जी संवेदनशील हैं। अखबार की दुनिया बहुत छोटी दुनिया होती है। लोग कहीं न कहीं मिल ही जाते हैं। एक शेर याद आ गया, अर्ज है कि, ‘तस्सवुरात की दुनिया भी खूब दुनिया है/हमारे घर से तिरा घर दिखायी देता है।’

अखबारों में आना-जाना लगा रहता है। संस्थाएं चलती रहती हैं। हम पत्रकार निर्णय हालात के चलते लेते हैं। थोड़ा दुख होता है फिर जिंदगी रफ्तार पकड़ने लगती है। इस बीच आपके भीतर की सृजनात्मकता पनपने लगती है। कुछ और अच्छा करने की तरफ आप मुड़ जाते हैं। वाजपेयी जी का पत्रकारीय जीवन मुझे ऐसे ही किसी मोड़ पर दिख रहा है।

मेरी वाजपेयी जी की पहली मुलाकात अमर उजाला में हुई थी। मैं सिटी रिपोर्टर था और वह प्रादेशिक डेस्क संभाले थे। कभी-कभार सामने पड़ने पर हेलो-हाय हो जाती थी। धीरे-धीरे बातचीत शुरू हो गयी। मेरी छवि उनकी नजर में जहां तक मैं समझता हूं, अच्छी थी। हम लोग बात करने लगे। लोकल डेस्क के ठीक सामने प्रादेशिक डेस्क थी। निश्चित ही नमस्कार तो बनता ही था।

शैशव अवस्था के अमृत विचार को कम समय में उन्होंने ऊंचाइयां देने का नतीजापरक प्रयास किया। टीम बनायी। एडीशन टू एडीशन यात्रा करते रहे। ठीक से सोते भी थे कि नहीं। मुझे नहीं मालूम पर हर वक्त अखबार की बाबत व्हाट्सएप पर चर्चा को तैयार रहते थे। संपादकीय से लेकर विज्ञापन और सर्कुलेशन में भी उनका सीधा हस्तक्षेप था। मॉनीटरिंग वह खुद करते थे।

सच पूछिए तो उनका अखबार छोड़ना मुझे बिलकुल भी अच्छा नहीं लगा। लगातार छह साल तक वह अपने प्रिय अमृत विचार अखबार के इश्क में रहे।

अपने अखबार के प्रति इश्किया संपादक के तौर पर मैंने स्वर्गीय विनोद मेहता को टीवी पर सुना, उनके विषय में सुना और पढ़ा था। सिंहानिया औद्योगिक घराने के एक रेमंड कंपनी के सर्वेसर्वा सनकी और साहसी व्यक्तित्व विजयपत सिंहानिया जिन्हें रोमांचक उड़ाने भरने का शौक था, अचानक अखबार निकालने के मूड में आ गए थे। निकाला। बेहतरीन नाम था अखबार का ‘इंडियन पोस्ट’ पहले संपादक बने स्वनामधन्य संपादक विनोद मेहता। संपादकीय दुनिया में नाम ही काफी था। उनके बारे में मैंने पढ़ा था कि वह ‘इंडियन पोस्ट’ को अपना शिशु मानते थे। यानी अखबार उनका इश्क था।

हालात विपरीत परिस्थितियों से गुजरे और सिंहानिया को अखबार बंद करना पड़ गया। दूरदर्शन में अखबारों पर किसी कार्यक्रम में ‘इंडियन पोस्ट’ का नाम लेते हुए उनकी आंख भर आयी। आंसू छलक उठे। आवाज भर आयी। श्री शंभूदयाल वाजेपयी का अमृत विचार से कुछ ऐसा ही इश्क रहा है। यह मैं पूरे दावे के साथ कह सकता हूं। जमीनी आदमी रहे। पत्रकारिता भी पूरे ठसक के साथ की और जहां भी रहे इंच दर इंच संपादकीय के साथ न्याय किया।

दैनिक जागरण में बरेली और फिर हल्द्वानी में उनकी धाक थी। भले ही प्रबंधन में उनके विरोधी टांग खींचने में लगे रहे पर काम के बूते जब तक मन लगा वाजपेयी जी डंके की चोट पर डटे रहे। मुनव्वर राना का शेर है कि इश्क है तो इश्क का इजहार होना चाहिए, आपको भी चेहरे से बीमार होना चाहिए।। अपनी यादों से कहो इक दिन की फुरसत दे हमें, इश्क के भी हिस्से में इतवार होना चाहिए।।

तो वाजपेयी जी का अखबारी इश्क उनके चेहरे से झलकता था और कभी छुट्टी नहीं लेते थे। फिर किसका डर उनको। कोई खुट्टी करने वाला भी तो नहीं था। वह उम्र वह जी चुके होंगे। लेकिन खास बात यह थी वह आपको थके हुए कभी नहीं लगेंगे। सिगरेट पीने का उनका अपना स्टाइल। आधी सिगरेट तोड़कर डिब्बी में रख लेते थे। उनके पास दो डिब्बियां रहती हैं। एक में टुटही सिगरेट और एक में पूरी सिगरेट। मुझे निजी तौर पर उनका सिगरेट पीना बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता था। पर क्या करता, भले ही अल्पकालिक पर संबंध पुराने होने के बाद भी चाहकर मैं टोक नहीं सका।

न जाने क्यों, मेरे मन के किसी न किसी कोने में उनकी सेहत के प्रति चिंता थी जिसे जाहिर नहीं कर पाया। सालों पहले जो अपनापन या जुड़ाव उनसे था वह लंबे अंतराल के बाद शायद जीवित हो उठा होगा।

दो-एक ऐसे भी मौके आए कि मैंने अमृत विचार से राम-राम कर ली। लेकिन वाजपेयी का मेरे प्रति बड़े भाई वाला स्वर आते ही, मैं लौट आया। वाजपेयी जी की मैग्नेटिक पर्सनेलिटी बिना चूं-चपड़ किए मुझे सीधे उनके पास तक खींच लायी। उनका स्वर भले ही किसी को रूखा महसूस लगता हो पर मन के भीतर से वह बहुत कोमल हैं। वाजपेयी जी का अमृत विचार छोड़ने का निर्णय कुल मिलाकर मुझे बिलकुल भी अच्छा नहीं लगा। उन्हें फेयरवेल देने की हैसियत नहीं है। मैं समझ रहा हूं कि उनका ह्रदय द्रवित होगा।

लंबे समय बाद उनसे मुझे जोड़़ने का श्रेय मेरे परम मित्र वरिष्ठ पत्रकार अनूप वाजपेयी को जाता है। फेसबुक पर उन्होंने वाजपेयी जी का संदेश देखा होगा। मुझे फोन करके बोले, यार तुम्हारे फेवरेट वाजपेयी जी अमृत विचार के संपादक हो गए हैं। कामकाजी अनुभवी पत्रकारों की नियुक्ति के लिए ओपेन ऑफर है, जाओ मिल आओ। बस संपर्क किया तो खट्ट से बुलाया और पट्ट से काम शुरू करने को कहा। कानपुर संस्करण चालू हो गया। पर विज्ञापन, सर्कुलेशन समेत बहुत ज्यादा बोझ लेकर काम करने से बचने की प्रवत्ति और माई फर्स्ट लव संपादकीय से बेवफाई करने के मूड में न होने कारण संपादकीय प्रभार से मुक्ति पाकर रिपोर्टिंग, लेखन, नये बच्चों को प्रशिक्षण, उन्हें खबरों में गाइड करने का काम करने लगा। पैसे को लेकर उनसे कभी बात ही नहीं की।

मेरी दिली इच्छा है कि वाजपेयी जी अपने अमृत विचार में लौट आएं। जैसे उन्हें अखबार से इश्क है वैसे ही उनकी टीम को उनसे है। टीम का अखबार के प्रति इश्क तो उन्हीं ने पैदा कर दिया। उन्होंने पत्रकारों की गरिमा का सदैव ही ध्यान रखा।

अंत में अनवर जलालपुरी के चंद शेरों से अपनी बात पेश करता हूं…

कोई रुसवा तो कोई मोतबर होता ही रहता है
यहां यह खेल प्यारे उम्र भर होता ही रहता है
ये दुनिया है, यहां तुम हादसों से दोस्ती कर लो
के हर लम्हा यहां जेरो-जबर होता ही रहता है
अगर गैरत सलामत है तो गुरबत के भी आलम में
बड़ी इज्जत से मुफलिस का गुजर होता ही रहता है।।
वाजपेयी जी बुरा न मानिएगा जो मन में आया लिख मारा।

दैनिक जागरण, अमर उजाला समेत कई अख़बारों में वरिष्ठ पदों पर रहे वरिष्ठ पत्रकार महेश शर्मा से संपर्क 9260973105 के ज़रिए किया जा सकता है।

पिछला भाग…

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समाप्त..

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