
महेश शर्मा-
सिविक अफेयर्स और लेबर-इंडस्ट्रीज के बाद डिफेंस बीट पर रिपोर्टिंग को लेकर मेरे भीतर काफी उत्साह रहा। चुनौतीपूर्ण एसाइनमेंट लेने में भी मजा आता था। अध्ययन के साथ ही होमवर्क करके फील्ड पर उतरते वक्त यदि आपके भीतर आत्मविश्वास है तो यकीन मानिए चाहे जितना बड़ा अखबार आपके मुकाबिल हो आप अपना लोहा मनवाकर ही दम लेंगे। एक छोटा सा किस्सा बयान करने के बाद दैनिक जागरण में दूसरी पारी की चर्चा करूंगा।
किस्सा कुछ यूं था कि, भारतीय मिसाइल के जनक कहे जाने वाले पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम उन दिनों डीआरडीओ (रक्षा अनुसंधान विकास संगठन) के महानिदेशक हुआ करते थे। कानपुर स्थित डीआरडीओ की प्रमुख मैटीरियल साइंस लैब डीएमएसआरडीई (डिफेंस मैटीरियल स्टोर रिसर्च एंड डेवलपमेंट इस्टेब्लिसमेंट) में थर्मल एनालिसिस पर अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार होना था। चीफ गेस्ट तत्कालीन डीआरडीओ महानिदेशक डॉ. कलाम साहब थे। प्रेस कवरेज की व्यवस्था थी। तब चैनल यूट्यूबर्स आदि नहीं थे। प्रिंट मीडिया ही प्रमुख था। और जो चैनल थे भी उनके लिए यह बहुत ज्यादा महत्व की चीज नहीं थी।
फादर ऑफ इंडियान मिसाइल डॉ. कलाम, देश को इन पर बहुत नाज है, जैसे शीर्षकों से उनके विषय में नेशनल मीडिया में पर्याप्त प्रकाशित हो चुका था जो मेरी नजरों से गुजरा भी। तो एक उत्सुकता थी कि ऐसी शख़्सियत से मिलना चाहिए बातचीत करना चाहिए। पर यह भी पता था कि वह हिंदी में बात करने में बहुत सहज नहीं थे। इधर मैं भी अंग्रेजी में फीस माफ तो नहीं थी पर कामचलाऊ बोल लेता था, पढ़ और समझ भी लेता था। मैंने प्लान कर लिया कि कुछ भी हो जाए उनसे बातचीत जरूर करूंगा।
हालांकि, मैंने महसूस किया था कि अंग्रेजी पत्रकारों और हिंदी पत्रकारों के बीच तालमेल बहुत अच्छा नहीं हुआ करता था। या यों कह लो हिंदी वाला प्रायः काम्पलेक्स्ड होता था। पर मेरा वास्ता अंग्रेजी वालों से ठीकठाक था। तो मुझे उनसे पूछने या बातचीत करने या फिर हिंदी वाली जिज्ञासा मैं शांत किया करता था।
थर्मल एनालिसिस पर सेमिनार शुरू होने से पहले अंग्रेजी पत्रकारों के साथ मिलकर प्लानिंग की। पायनियर के ब्यूरो चीफ सीएम लूथर से मैंने कहा कि यदि डॉ. कलाम को मैं मीडिया की तरफ मुखातिब करने में सफल हो जाता हूं तो मेरे दो-एक सवाल पर आप माइक संभाल लीजिएगा। इंटरव्यू में आसानी होगी। वरना कॉपी पठनीय नहीं बन पाएगी। लोगों को थर्मल एनालिसि और आयुध में इसके एप्लीकेशन से जनता को क्या लेना-देना। टीओआई के तिलक शर्मा, राधिका सचदेव भी साथ थीं।
खैर.. तय हो गया, विश्व के महान वैज्ञानिक कलाम, काली एम्बेसडर में आए। सीधे मंच पर बैठ गए। उनका भाषण कम से कम से मेरे लिए तो बाउंसर था। विकल्प के तौर पर सोचा था कि डा. जीएन माथुर जैसे मीडिया फ्रेंडली वैज्ञानिक की मदद से कॉपी बना लेंगे। प्लान उनसे बातचीत पर काम करना तय हो चुका था। डीएमएसआरडीई वालों ने उनसे बातचीत कराने के अनुरोध पर हाथ खड़े कर दिए थे। हम लोगों का लंच भी उनसे दूर ही रखा गया था। खैर, जैसे ही धन्यवता ज्ञापित किया गया, मैं थोड़ा दूरी पर व्यवस्थित मीडिया गैलरी से चिल्ला पड़ा डॉ. कलाम वी आर फ्रॉम प्रेस….कानपुर में, आवाज पड़ते ही डॉ. कलाम पलटे और मद्धम और महीन स्वर में बोले, ‘कम ऑन कम ऑन’…
फिर क्या सिक्योरिटी जोन में हम चार-पांच पत्रकार घुस गए। दो साधारण से सवाल मैंने पूछा ही था कि रणनीत के मुताबिक हमारे पॉयनियर के साथी लूथर साहब ने मोर्चा संभाला। राधिका तो उछल-उछलकर उनके सामने आकर सवाल करने लगी। यह बातचीत न केवल ऑडिटोरियम से लंच स्थल तक रही बल्कि कलाम साहब ने हम लोगों के साथ ही लंच करने की बात कही। उनके लिए व्यवस्थित लंच पंडाल पर हम लोग जा धमके। उनके कहने के बाद भी कोई प्लेट नहीं उठा रहा था। उनके साथ बिताये वक्त की कीमत हम सब जानते थे।
उनकी लाइफ स्टाइल पर सवाल हुए तो उनके जीवन के संघर्ष के किस्से भी उन्होंने हल्के-फुल्के शेयर किए। हम सब खुश थे। एक बार तो आईआईटी में दीक्षांत समारोह में मिसाइल मैन और मिल्क मैन यानी डॉ. एपीजे कलाम और वी. कूरियन से भी मिलने का मौका मिला था।
डॉ.कलाम कानपुर के मीडिया का नेचर समझ चुके थे कि यहां के पत्रकार इंटरेक्टिव है। लेकिन इससे भी ज्यादा रोचक किस्सा यह था कि देवगौड़ा की सरकार में नेताजी मुलायम सिंह यादव रक्षामंत्री थे। नेताजी का अंग्रेजी विरोध जगजाहिर था और कलाम साहब की हिंदी में संवाद या न लिख पाने की मजबूरी। संयोग से डॉ. कलाम नेताजी (रक्षामंत्री) के वैज्ञानिक सलाहकार हुए। एक बार उनके कानपुर आने पर मैंने ही पूछ लिया कि रूटीन ऑफिस वर्क में बातचीत या फाइलों पर टिप्पणी को लेकर आप दोनों को भाषा के कारण दिक्कत नहीं होती है?
कलाम साहब ने चिरपरिचित अंदाज में जवाब दिया कि बेटर यू आस्क मिस्टर डिफेंस मिनिस्टर। उसके कुछ दिन बाद ही बतौर डिफेंस मिनिस्टर मुलायम सिंह यादव का सर्किट हाउस आना हुआ। मेरे दिमाग में पहले से ही यह सवाल तैर रहा था। सवाल पूछते ही वह बोले, काये उन्ने कुछ नहीं बताया। मैंने कहा कि नेताजी वह सिर्फ इतना बोले कि यह सवाल रक्षामंत्री जी से पूछिएगा। नेताजी मुस्कराए, हमारे उनके बीच दुभाषिया होता है। फाइलों में मेरी टिप्पणी के नीचे उसका अंग्रेजी अनुवाद भेजा जाता है और उनकी टिप्पणी का हिंदी अनुवाद मुझे दिखाया जाता था। और वह विद्वान व्यक्ति हैं टूटी-फूटी हिंदी बोल लेते हैं।
ये दोनों शख्स नहीं शख़्सियत अब हमारे बीच नहीं हैं। मैं दोनों हृदय से प्रणाम करता हूं। बहुत किस्से जिनमें कुछ शेयर करता रहूंगा।
तो दैनिक जागरण में बतौर सीनियर स्टाफ रिपोर्टर काम करने का अवसर संदीप भैया (संदीप गुप्ता) ने दिया। एक दिन के भीतर अमर उजाला छोड़कर दैनिक जागरण ज्वाइन करना प्रदीप कुमार को अच्छा तो नहीं लगा होगा। जो क्वालिटी ऑफ लीडरशिप डॉ. वीरेन डंगवाल, सत्यप्रकाश त्रिपाठी, शैलेंद्र दीक्षित, प्रताप सोमवंशी व दिनेश जुयाल, हरिश्चंद्र सिंह, शम्भूदयाल वाजपेयी जैसे संपादकों में दिखी वह उल्लेखनीय है। जागरण में चीफ रिपोर्टर डॉ. रमेश वर्मा के अधीनस्थ काम करना पड़ा। यह कार्यकाल बहुत तल्ख अनुभवों के साथ बीता।
वर्मा जी ने दैनिक जागरण में बतौर चीफ रिपोर्टर लंबी पारी खेली। शायद इतनी लंबी पारी किसी भी अखबार के चीफ रिपोर्टर की एक ही अखबार में नहीं होगी। मैं उनका बहुत सम्मान करता हूं। अभी भी उन्हें गुरुजी कहकर संबोधित करता हूं। लोकल चैनलों में डिबेट में मिल जाते हैं। (वर्माजी से माफी मांगते हुए पूरे सम्मान के साथ) उनके लिए पीठ पीछे मैं यह कहता रहता था ‘इतने सीधे आप हैं, जितना सीधा बांस / पोर-पोर में गांठ है, रोम-रोम में फांस। खुद हार्ड वर्कर थे तो दूसरे को भी कठिन परिश्रम करते देखना चाहते थे। प्रो-मैनेजमेंट नेचर (टिकाऊ चीफ रिपोर्टर को होना ही पड़ता है) के चलते वह अधिकतर रिपोर्टरों के लिए खलनायक की भूमिका में देखे जाते हैं। यानी आप उन्हें लोकल पत्रकिता का ‘अमरीश पुरी’ कह सकते हैं।
कलम के हिटलर विष्णु त्रिपाठी कहे जाते थे तो लोकल पत्रकारिता के ‘अमरीश पुरी’ रमेश वर्मा कहे जाते हैं। इतनी मेहनत कराते थे कि रिपोर्टर का ‘तेल’ निकाल लेते थे। एक कार्यक्रम या स्टोरी के लिए जाजमऊ आपको भेज दें तो दूसरी के लिए कल्याणपुर। आप ही बताइए कि आप उन्हें कोसेंगे कि नहीं। लेकिन एक बात है उनके साथ काम करने वाले रिपोर्टर के पास काम की कमी नहीं रहती। निरंतरता तो वर्मा जी में अभी भी इतनी है कि चाहे दैनिक जागरण जैसा बड़ा अखबार हो या विश्वमित्र जैसा छोटा या फिर जेएमडी व एबीसी चैनल.. उनकी मेहनत झलकती है। मेहनत और अध्ययन के मामले में वह किसी भी पत्रकार के लिए रोल मॉडल हो सकते हैं।
एक बार का किस्सा है कि बेटी सौम्या को परीक्षा दिलवाकर उसे घर छोड़ने के कारण मीटिंग में पहुंचने में थोड़ा विलंब हो गया। वर्मा जी ने इसे जान-बूझकर की गयी लेटलतीफी कहते हुए सत्तर लिहाड़ी सुना डाली। मुझे बहुत बुरा लगा। यानी कह लीजिए बहुत ही बुरा। वह दिन मेरे लिए खास दिन साबित हुआ। उनकी डांट खाकर मैं बाहर आया और सलीम की दुकान पर एक सिगरेट ली और कोल्ड ड्रिंक के साथ सुट्टे लगाता जाऊं उन्हें कोसता जाऊं। अचानक देखा कि यूनिट मैनेजर नितिन श्रीवास्तव मेरे पास आए। बोले, महेशजी क्या हो रहा है? मैंने कहा देख नहीं रहे खुन्नसियाते हुए सुट्टे लगा रहा हूं और वर्मा जी को कोस रहा हूं। बेवजह डांट देते हैं। वह बोले, आपको महेंद्र मोहन जी बुला रहे हैं।
वर्मा जी को लिहाड़ी पर लिहाड़ी सुनाने के बजाय मैं नितिन जी को सुनाने लगा। मेरा ट्रांसफर डेस्क पर करा दीजिए। महेंद्र मोहन जी के पास जाने से पहले गंभीर पत्रकार होने का अभिनय करता हुआ, में आई कम इन सर.. कहते हुए ऑफिस में प्रवेश कर गया। उन्होंने कुछ नसीहत देते हुए, मारुति जेन कार की चाबी मुझे सौंपते हुए कहा कि आज से आप चीफ रिपोर्टर हैं। वर्माजी छोड़ गए। प्रो-मैनेजमेंट छवि के बाद भी खुद्दारी उनमें बहुत है। मेरे सहयोगी संजीव मिश्रा, सुरेश त्रिवेदी, अंजनी निगम, मनोज त्रिपाठी, विनय गुप्ता, लल्ला, मनोज आदि लोग थे। गाड़ी चल निकली। चार्ज संभालने के बाद बधाई संभालना मुश्किल हो रहा था। पर क्या करते यही दस्तूर है। कुछ अच्छी स्टोरी करने का मौका मिला। पर संदीप भैया का कहना था आपको काम लेना है। काम करना नहीं है।
अपने रिपोर्टर साथियों को उनकी गलती पर डिफेंड करने के लिए मैं प्रबंधन में बदनाम था। प्रधान संपादक संजय गुप्ता ने साक्षात्कार के बाद मुझे ओके कर दिया। यानी चीफ रिपोर्टर इन एबसेंशिया के बजाय चीफ रिपोर्टर डी-फैक्टो, हो गया। जुनून इतना कि अपना काम खत्म करके फीचर या कभी-कभी पेज वन इंचार्ज के पास बैठ जाया करता था। फुटबाल वर्ल्डकप में अभिषेक त्रिपाठी के साथ देर रात तक काम किया। अखबार की नौकरी में इन बातों का कोई महत्व नहीं होता है। समय बदला। रामेश्वर पांडे नामक व्यक्ति कानपुर संस्करण के संपादकीय प्रभारी के रूप में आए। वह साम्यवादी फिर समाजवादी विचारधारा त्यागकर अपने ही लोगों के काम लगाने लगे। मैं भी उन्हीं का शिकार है गया। जागरण में जिम्मेदारी के पद पर काम करने का बहुत प्रेशर हुआ करता है। वर्मा जी के बाद रामेश्वर पांडे ने कोसते हुए सात साल बाद जागरण से विदा ले ली। इसकी वजह थी पांडे ने मुझे छोटे से जिले फतेहपुर भेजने का आदेश दे दिया था।
इस संकट से निपटने में हमारे मित्र अमर उजाला कानपुर के संपादक प्रताप सोमवंशी (अब हिंदुस्तान में कार्यकारी संपादक) काम आए। उन्होंने एक भी दिन बेरोजगार नहीं रहने दिया और शशिशेखर जी से मिलने के लिए नोएडा भेज दिया। यह भी अजीब संयोग था। जिस दिन ऊंचाहार एक्सप्रेस से मैं दिल्ली जा रहा था उसी दिन रामेश्वर पांडे श्रमशक्ति से दिल्ली जा रहे थे। वह भी शशिशेखर जी से मिलने।
दैनिक जागरण, अमर उजाला समेत कई अख़बारों में वरिष्ठ पदों पर रहे वरिष्ठ पत्रकार महेश शर्मा से संपर्क 9260973105 के ज़रिए किया जा सकता है।
पिछले भाग…
कानपुर वाले महेश शर्मा का पत्रकारीय जीवन (पार्ट-2) : सिगरेट की डिब्बी में जुग्गी दादा की सिफारिशी चिट्ठी


