दिल्ली की राजनीति और अदालतों से जुड़े चर्चित आबकारी नीति मामले में गुरुवार को बड़ा घटनाक्रम सामने आया। दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया समेत कई नेताओं के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने का ऐलान किया और इसके बाद खुद को आबकारी नीति मामले की सुनवाई से अलग कर लिया।
जस्टिस शर्मा ने कहा कि उनके खिलाफ सोशल मीडिया पर “विलिफिकेशन कैंपेन” चलाया गया और अदालत की छवि खराब करने की कोशिश की गई। उन्होंने आरोप लगाया कि यह एक “संगठित अभियान” था, जिसके बाद उन्होंने अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की बात कही। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मुख्य आबकारी नीति मामले की सुनवाई अब किसी दूसरी बेंच के सामने होगी।
इस घटनाक्रम के बाद आम आदमी पार्टी खेमे ने इसे अपनी बड़ी नैतिक जीत के तौर पर पेश किया। केजरीवाल ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि “सत्य की जीत हुई” और “नैतिक शक्ति सबसे बड़ी शक्ति है।”
दरअसल, इससे पहले केजरीवाल और अन्य आरोपियों ने जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा से खुद को मामले की सुनवाई से अलग करने की मांग की थी। उनका आरोप था कि उन्हें निष्पक्ष सुनवाई को लेकर आशंका है। लेकिन अप्रैल में जस्टिस शर्मा ने यह मांग खारिज करते हुए कहा था कि केवल आशंकाओं के आधार पर कोई जज खुद को मामले से अलग नहीं कर सकता।
अब ताजा घटनाक्रम में जस्टिस शर्मा ने अवमानना की कार्रवाई शुरू करने के साथ-साथ मुख्य केस से खुद को अलग कर लिया है, जिसके बाद यह मामला नई बेंच को सौंपा जाएगा।
ये केजरीवाल और उनके साथियों की एक बड़ी जीत है।
जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा को उनके केस से अलग होना पड़ा है।
हालाँकि वे अपनी खुन्नस निकालने के लिए उन पर आपराधिक अवमानना का केस चलाने जा रही हैं, जो कि एक जज को शोभा नहीं देता।
शोभा इसलिए नहीं देता क्योंकि उसे इन सबसे ऊपर होना चाहिए। अगर जज इतनी आलोचना बर्दाश्त नहीं कर सकते तो उन्हें फिर कहीं और होना चाहिए।
बेहतर तो ये होता कि वे पहले दिन ही इस केस की सुनवाई से खुद को अलग कर लेतीं, लेकिन उन्होंने बेवज़ह इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया।
अब इस तरह से बेआबरू होकर अलग होने से उनकी प्रतिष्ठा कितनी बची, ये वे बेहतर जानती होंगी। -मुकेश कुमार, वरिष्ठ पत्रकार


