
संजय कुमार सिंह
आज के मेरे सभी अखबारों में इजराइल पर ईरान के हमले की खबर लीड है। युद्ध रुकवाने के दावों और प्रचार के बीच इस खबर की चर्चा कर मैं पॉ-पॉ का सच और उससे सहानुभूति बताता लेकिन आज ही अखबारों में सरकार के फिसड्डी होने और राजनीति व चुनाव जीतने के लिए हिन्दुओं की एकजुटता जैसी संविधान विरोधी बेशर्मी पर अड़े होने की खबर भी है तो मैं उसी की चर्चा करता हूं। इजराइल के युद्ध की खबर की प्रस्तुति में अंतर की बात क्या करूं जब रोज आम खबरों में भारी अंतर की बात करता ही हूं। इसलिए आज मैं अखबारों की दूसरी और तीसरी बड़ी खबरों की बात करता हूं। इन खबरों से पता चलता है कि अपने काम और उसके नतीजे के लिहाज से यह सरकार कितनी फिसड्डी है। ये खबरें हैं, मंत्रालय (इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना तकनालाजी) ने सोशल मीडिया फर्मों से कहा कि बम होने की अफवाह वाली पोस्ट को कम करे। यह खबर द हिन्दू में सेकेंड लीड है। दूसरे अखबारों में भी पहले पन्ने है। उसपर आने से पहले आज की दूसरी प्रमुख खबर बता दूं। यह अंग्रेजी अखबारों में सिर्फ द एशियन एज में पहले पन्ने पर है। हिन्दी के मेरे दोनों अखबारों में दूसरे पहले पन्ने पर लीड है। अमर उजाला में यह चार कॉलम में लीड है और फ्लैग शीर्षक के साथ मुख्य शीर्षक दो लाइन में है। मुख्य शीर्षक है, हिन्दू एकता जरूरी …. अगड़ा-पिछड़ा, जाति-भाषा में भेद करेंगे तो कटेंगे।
नवोदय टाइम्स में यह तीन कॉलम की लीड है। फ्लैग शीर्षक है, योगी के बयान पर संघ की मुहर। मुख्य शीर्षक है, अब हसबोले ने भी कहा – बंटेंगे तो निश्चित कटेंगे। खबर के साथ दो कॉलम में एक फोटो है। इसका कैप्शन है, मथुरा : संवाददाताओं से बात करते दत्तात्रेय होसबोले। ढेर सारे माइक के पीछे बैठे दो लोगों की इस तस्वीर का शीर्षक असल में खबर के शीर्षक का विस्तार है – कहा, हिन्दू समाज में एकता जरूरी। द एशियन एज में यह खबर दो कॉलम में है और इसका शीर्षक है, हिन्दुओं की एकता आरएसएस का लक्ष्य (मकसद कहना चाहिये); संघ भाजपा के साथ विवाद से इनकार करता है। उपशीर्षक है – योगी की टिप्पणी की पुष्टि, राहुल की आलोचना। वैसे तो तीनों शीर्षक एक ही खबर है लेकिन आप देख सकते हैं कि तीनों में हिन्दुत्व की कट्टरता (या संविधान का विरोध) कम होता गया है। आज की तीसरी खबर दिलजीत दोसांझ, कोल्डप्ले के कॉन्सर्ट की टिकट बिक्री में घोटाला, ईडी के छापे है। यह खबर अंग्रेजी के अखबारों में तो पहले पन्ने पर है ही नवोदय टाइम्स के भी असली पहले पन्ने की सेकेंड लीड है। अमर उजाला में यह खबर दूसरे पहले पन्ने पर लीड है। उपशीर्षक है, ईडी के पांच राज्यों में 13 ठिकानों पर कार्रवाई, मोबाइल फोन जब्त। आज छपी खबर के लगता है कि डिजिटल भारत में जनता से डिजिटल ठगी और डिजिटल अरेस्ट करने वाले अपराधी भी ईडी से उसके घर में घुसकर पंगा ले रहे हैं। दूसरे शब्दों में अपराधियों को ईडी का भी डर नहीं है।
अमेरिका में रहने वाले पत्रकार मित्र अजीत शाही ने एक फेसबुक पोस्ट के साथ लिखा है, असली ईडी के लिए भी प्रतिस्पर्धा है। फेसबुक पर आज सुबह पोस्ट की गई टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार, दिल्ली के छतरपुर इलाके में ईडी की फर्जी टीम ने व्यावसायी के घर छापा मारकर पांच करोड़ रुपये की वसूली करने की कोशिश की। इस खबर को गूगल करने पर कई खबरें मिलीं और संभावना नहीं है कि झूठी होगी। विस्तार के लिए मैं नवभारत टाइम्स की खबर के हवाले से बता सकता हूं कि फर्जी ईडी अफसर बनकर सात लोगों ने एक कारोबारी से 5 करोड़ रुपये की ठगी करने की कोशिश की। वे कारोबारी के घर पर रात भर रुके और अगली सुबह उसे हौज खास बैंक ले गए। वकील की सतर्कता से आरोपी भाग खड़े हुए। पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है। यह खबर 26 अक्तूबर, दिन के साढ़े बारह बजे की है।
आप जानते हैं कि 10 साल की इस सरकार के कार्यकाल में रोजगार की भारी कमी हुई है, मुख्य धारा का मीडिया अपनी तरह का हो गया है तो मनोरंजन के नये साधन और तरीके सामने आये हैं। इनमें पुराना संगीत और अभिनय तो है ही अपेक्षाकृत नया, स्टैंडअप कॉमेडी और वयस्कों के लिए फिल्म भी आम हुए हैं। इसमें हालत यह है कि अंग्रेजी के प्रोफेसर और पढ़ाने वाली दंपत्ति का बेटा, जिसका नाम शेक्सपीयर रखा गया था एडल्ट फिल्मों का सबसे नामी स्टार है। ऐसे में मेरा मानना है कि आदर्श पैरेन्टिंग के लिहाज से ध्रुव राठी सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। स्थिति यह है कि ध्रुव राठी का या उसके वीडियो का जो विरोध हो, उसे फर्क नहीं पड़ता है लेकिन मुस्लिम और सरकार विरोधी स्टैंड अप कॉमेडियन के लिए काम करना (पैसे कमाना) मुश्किल हुआ पड़ा है। जनता (हिन्दू भी) मनोरंजन की भूखी है और अच्छे शो के टिकट भारतीय रेल के टिकटों की तरह कुछ ही घंटों में खत्म हो जा रहे थे। पैरेन्टिंग ठीक हो तो बच्चे अच्छे हो सकते हैं लेकिन उपराष्ट्रपति ने कहा है कि बच्चों को विदेश जाने की बीमारी लगी हुई है। अब यह पैरेन्टिंग का मामला है या संघ परिवार की सक्रियता का असर, मेरे लिये अनुसंधान का विषय है।
यहां तक सभी संवैधानिक संस्थाओं की साख खराब कर दिये जाने का मामला है और वैसे में ईडी की यह कार्रवाई वसूली के लिए हो तो बाद में पता चलेगा या पता ही नहीं चले। उदाहरण के लिए शाहरुख खान के बेटे की गिरफ्तारी वसूली के लिए हुई थी। यह आरोप था। इसकी जांच शुरू हुई। संबंधित अधिकारी ने जो कहा उसका भाव यही था कि वे ऊपर के आदेश पर काम कर रहे थे। इस जांच का क्या हुआ राम जाने, इस बार महाराष्ट्र चुनाव के लिए नामांकन से पहले खबर आई कि उन्हें टिकट दिया जायेगा, चुनाव लड़ेंगे। लड़ते तो कोलकाता हाईकोर्ट के जज साब के बाद अपनी तरह के दूसरे होते पर नहीं लड़े। एक सज्जन जिनपर पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या का आरोप है, को जमानत मिली तो एक पार्टी में शामिल कर लिया गया, पद दिया गया और फिर निकाल दिया गया। फरीदाबाद में आर्यन मिश्रा और बहराइच में राम गोपाल मिश्रा के साथ जो हुआ और आर्यन खान के साथ जो किया गया सब हिन्दुओं ने ही किया-धरा है। अवैध घोषित बुलडोजर न्याय को छोड़ दिया जाये तो कटने, बंटने और साथ रहने का नफा -नुकसान हिसाब करके बताया जाता तो बात बनती। पर वो कोई करेगा नहीं और इसका कारण समझना मुश्किल नहीं है।
बंटेंगे तो कटेंगे अगर इतना ही अच्छा या फायदेमंद है तो उसी पर चुनाव लड़ा जाता और इसे साबित किया जाता। लेकिन कहा जाता है कि भाजपा चुनाव जीतने के हर उपाय करती है। मतदाता सूची से ईवीएम तक। इसलिए कोई ठोस बात नहीं होगा और हिन्दुत्व की रक्षा के लिए चुनी गई सरकार ने हिन्दुत्व की कितनी और कैसी रक्षा की, हिन्दुत्व का कितना विकास किया, हिन्दुओं का कोई भला किया या नहीं उस कोई चर्चा नहीं करेगा और इसका कारण समझना मुश्किल नहीं है। कहने की जरूरत नहीं है कि यह ‘काम’ संविधान विरोधी भी हो तो होना चाहिये क्योंकि धर्म के आधार पर भेदभाव फैलाना कहां रुक रहा है। अगर धार्मिक एकजुटता की बात हो रही होती और सभी धर्मों की बात होती, उसमें कहा जाता कि सभी धर्मों को एक साथ रहना चाहिये या अलग-अलग एकजुट रहना चाहिये, इससे आबादी के अनुसार नफा-नुकसान होगा तो अलग बात होती और शायद संविधान में इसकी मनाही भी नहीं है।
इसलिए राहुल गांधी का यह कहना, ‘जिसकी जितनी संख्या उसकी उतनी हिस्सेदारी’ गलत नहीं है। वे हिन्दुओं को एकजुट होने की बात नहीं कर रहे हैं वे हिन्दुओं के एक बड़े वर्ग को अपनी आबादी के अनुसार हक पाने, मांगने या देने की बात कर रहे हैं। इसमें हिन्दुओं की जाति के आधार पर बंटे काम बंद करना और सबको समान शिक्षा तथा सबकी बराबरी की संभावना है जो अच्छी बात है। दूसरी ओर, कटने से बचने के लिए एकजुट होना एक अलग मजबूरी है जिसकी सभ्य समाज में जरूरत ही नहीं होनी चाहिये और जंगलों में लगभग जरूरी है या फिर भी काम नहीं आती है। खरगोश या बिल्ली की कितनी बड़ी संख्या होगी जो एक शेर से भी बच जाये और बचेंगे वही जो पेट भर जाने के बाद काम के नहीं होंगे। मनुष्यों की स्थिति ऐसी है नहीं और ना होनी चाहिये और ना भविष्य में कभी होने की आशंका है। इसमें सिर्फ हिन्दुओं की बात करने का मतलब दूसरे धर्म के लोगों से खतरा है। जो चाहे जैसा नुकसान करें मारकर खाते नहीं हैं और पेट भरने जैसी मजबूरी नहीं है। नौकरी-व्यवसाय की बात अलग है और अगर इसका आधार शिक्षा व संपन्नता हो तो मामला पूरी तरह बदल जायेगा जिसकी बात नहीं हो रही है। वैसे भी, लोगों को कटने-मरने से बचाने के लिए सरकार है, व्यवस्था है और उसका यही काम है। शेर भी आवासीय मोहल्ले में आकर शिकार नहीं कर सकता है और उसे रोकने के लिए बदले में गोली मार देने की व्यवस्था नहीं है। लेकिन मुठभेड़ में मौत आम है। अब तो हत्या करवाने का भी आरोप है।
ठीक है कि अचानक शेर मोहल्ले में आ जाये तो नुकसान कर सकता है लेकिन कायदा-व्यवस्था यह है कि संबंधित लोग ऐसे किसी भी जानवर को दूर से मारने वाली सुई से बेहोश करें और फिर काबू कर ले जायें, जंगल में छोड़ दें। तमाम लोग जंगली जानवरों, खासकर सांप से रक्षा के लिए ऐसी सेवा मुफ्त में कर रहे हैं ऐसे में भाजपा और उसके नेता व्यवस्था बनाने, उसे दुरुस्त रखने और उसकी कामयाबी पर भरोसा रखने के लिए कहने की जगह हिन्दुओं को एकजुट करने की बात कर रहे हैं तो यह चुनावी राजनीति है और घिसी-पिटी रणनीति को ही जारी रखने की जिद्द या मजबूरी है। कहने की जरूरत नहीं है कि जाति आधार पर सुविधा देने, मांगने और सुनिश्चित करने की राहुल गांधी या इंडिया गठबंधन की बात में दम है। ऐसे में संघ परिवार के लोग गैर संवैधानिक बात कर रहे हैं तो भाजपा को सत्ता में बनाए रखने के लिए और चूंकि नरेन्द्र मोदी नहीं चाहते हैं कि वे सत्ता से बेदखल हों, उनकी सरकार ऐसे लोगों पर कार्रवाई नहीं कर रही है। मीडिया को यह सब बताना चाहिये, रेखांकित तो करना ही चाहिये पर शायद वह विज्ञापनों के लालच में या ईडी, सीबीआई व जीएसटी के डर से चुप है। दिलचस्प यह कि सारा कुछ देशभक्ति की आड़ में हो रहा है और इन सब चीजों का खुलकर विरोध करने वालों को देशविरोधी कहना हो तो सब कूद पड़ते हैं।
राहुल गांधी या कांग्रेस गठबंधन की राजनीति के आगे भाजपा की राजनीति ईवीएम के बिना ज्यादा चलने वाली नहीं है। मीडिया से आम लोगों को जितना भ्रमित किया जा सकता था हो चुका अब लोग खबरों और सूचनाओं के लिए पहले की तरह मुख्य धारा की मीडिया पर आश्रित नहीं हैं फिर भी भाजपा वही कर रही है और संघ परिवार इसका समर्थन कर रहा है तो जाहिर है कि उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है। 10 साल शासन के बाद गिनाने के लिए अपना किया कोई काम नहीं है और अब झूठ पहले ही तरह स्वीकर नहीं किये जाते हैं बल्कि उनकी पोल भी खुल जा रही है। ऐसे में प्रचारकों और समर्थकों का भी काम है कि वे अपने नेता को बतायें और नेता उनकी सलाह मांगें। यह सब नहीं हो रहा है तो नेता के बारे में जो चर्चा है उसकी पुष्टि होती है और दिलचस्प यह भी है कि समर्थकों पर उसका भी असर नहीं है। गनीमत यही है कि ज्यादातर अंग्रेजी अखबारों ने पहले पन्ने पर संविधान विरोधी हरकत नहीं की है हालांकि अब न्याय की देवी की आंखों पर पट्टी नहीं है और वो सब देख रही हैं। उनके हाथों में भी संविधान है तो शायद कुछ फर्क पड़े लेकिन वह सब बाद की बात है।
रेल दुर्घटना के पीडितों को मुआवजा
इन सबके साथ इंडियन एक्सप्रेस ने रेल दुर्घटना के पीड़ितों को मुआवजे के मामले में आज अपनी खबर की दूसरी किस्त में बताया है कि कानून तो एक है या होनों चाहिये पर फैसले कई हैं। कुछ लोगों को दर्द और पीड़ा के लिए राहत मिली, दूसरों को नहीं मिली। इस खबर के साथ कल जो छपा था उसपर रेलवे का यह दावा भी है कि किसी ने मुआवजे को चुनौती नहीं दी, आरसीटी (रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल) ने जो दिया वह अलग है। आप समझ सकते हैं कि यही खबर थी। अखबार ने आज भी यही लिखा है कि हमने भी यही कहा था। पर सरकार या रेलवे यह साबित करना चाह रही है कि आरसीटी ने जो दिया (और जिसने मांगा) उसकी मर्जी। यानी रेलवे ने खुद कम पैसे दिये उसे लोगों को चुनौती देनी पड़ी तब ज्यादा मिले और जिनने चुनौती नहीं दी उन्हें नहीं मिले फिर भी सरकार के लिए यह खबर नहीं है। पटना में मामले लंबित होना इसका उदाहरण है कि दावों पर विचार करने का तरीका होता है। एक प्रक्रिया है। आज अखबार ने लिखा है कि इस बारे में पूछने पर सरकार ने यही कहा। इस तरह संभव है कि सरकार ने मुआवजा राशि की घोषणा इस उम्मीद में की होगी कि लोग आसीटी में न जायें या कम से कम लोग जायें और जो दिया जा रहा है उसी से संतुष्ट रहें। उस समय प्रचार हो ही गया था। अब यह खबर नहीं छपती तो किसी को पता नहीं चलता और लोग कम मुआवजे पर ही रह जाते। यहां मुद्दा यह है कि सरकार ने राहत की घोषणा की ही क्यों थी? इससे बेहतर नहीं होता कि सबसे कहा जाता कि आरसीटी से दावा करें नियमानुसार भुगतान किया जायेगा। मुझे लगता है कि यह अटपटा होता और इसीलिए नहीं किया गया होगा। पर यह स्थिति है, सरकार, खबर और खबर लिखने के बाद जो होता है उसकी। कहने की जरूरत नहीं है इसके बाद खबर लिखकर जनहित करने का आम आदमी का इरादा डगमगा जायेगा।
काम में फिसड्डी सरकार
आज के अखबार यही बताते हैं कि सरकार अपने काम में फिसड्डी है। गैंगस्टर अनूप बिश्नोई जेल से काम कर ले रहा है, ईडी की फर्जी छापामारी चही रही है, लोग डिजिटल अरेस्ट हो रहे हैं, दिल्ली का प्रदूषण ठीक होने का नाम नहीं ले रहा है , आईफोन की तस्करी का फांडाफोड़ हो रहा है, ड्रग की तस्करी भी जारी है (अमर उजाला)। अमर उजाला के पहले पेज पर आधे पेज के विज्ञान के साथ पांच कॉलम के बॉटम का शीर्षक है, “फर्जी बम की धमकी : सोशल मीडिया से गलत सूचाएं हटाने का निदेश”। यह फर्जी धमकी का ठीकरा इतने दिनों बाद सोशल मीडिया पर फोड़ देने जैसा है। टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक ऐसा ही है। सरकार की नालायकी बताने वाली आज की एक और खबर टाइम्स ऑफ इंडिया में सेकेंड लीड है। शीर्षक के अनुसार अमेरिका ने अवैध भारतीय अप्रवासियों से भरा एक विमान वापस भेजा है। यह खबर दि एशियन एज में भी पहले पन्ने पर दो कॉलम में है। इससे पहले भी एक विमान दिसंबर के आखिर में मानव तस्करी के शक में जांच के लिए फ्रांस में रोका गया था और उसमें ज्यादातर लोग भारत के थे। तब अवैध रूप से अमेरिका जाने के मुद्दे पर चर्चा भी हुई थी। यहां मुद्दा यह है कि भारत से लोग अवैध रूप से आखिर क्यों अमेरिका या विदेश जाते हैं. सरकार क्या कर रही है और सरकार अच्छी है तो यह कम क्यों नहीं हो रहा है? सच्चाई यह है कि पिछले दिनों मैंने प्रधानमंत्री का एक पुराना वीडियो देखा जिसमें वे कह रहे थे, ….मेरा सपना ये है कि स्वामी विवेकानंद जी ने जो सपना देखा था वो सपना पूरा हो और हमारा देश इतना समृद्ध हो, इतना समृद्ध हो कि पूरा अमेरिका वीजा लेने के लिए लाइन में खड़ा हो ये मेरा सपना है। मैं अमेरिका आऊं उसके बजाय मैं ऐसा देश चाहूंगा कि अमेरिका को लाइन लगाकर वीजा लेने के लिए खड़ा होना पड़े ये इस दिशा से हमें काम करना चाहिये और मैं इस जिद्द के साथ लगा हुआ हूं ….।
दस साल प्रधानमंत्री रहने के स्थिति यह है कि टाइम्स ऑफ इंडिया की एक खबर के अनुसार, अक्तूबर 2023 और सितंबर 2024 के बीच 12 महीनों में 90415 भारतीयों ने अवैध रूप से अमेरिका जाने की कोशिश की। इसका मतलब हुआ प्रति घंटे 10 भारतीय यानी लाइन लगकर अमेरिका में अवैध रूप से घुसने की कोशिश चल रही है। इतने लोग तो पकड़े गये हैं जो घुस गये उनकी बात अलग है। इनमें से करीब 50 प्रतिशत गुजरात के थे। 12 साल लगे होने और बिना छुट्टी रोज 18 घंटे काम करने के प्रचार, 70 साल कुछ नहीं होने और खतरे में पड़े हिन्दुओं द्वारा अपनी रक्षा के लिए चुने जाने के बाद जो मिला वह यही है।


