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अद्भुत रेंज वाले ‘कबीर’ अपने आप में एक युग थे!

कबीर ने मोटी-मोटी पोथियों के अस्तित्व को नकारा था. इन पोथियों के बरक्स ढाई अक्षर की प्रतिस्थापना की. उस वक्त लोकतांत्रिक समाज बना नहीं था. नेता विरोधी दल के पद की कल्पना नहीं थी. फिर भी कबीर ने “निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय“ का उदघोष किया…

हेमंत शर्मा-

कबीरा खड़ा बाज़ार में… वाराणसी में जन्मने और मगहर में मरने वाला कबीर. निर्गुण दुनिया के लिए सबसे कठिन धारा है. आध्यात्म और भक्ति की धाराओं को हिंदी साहित्य सगुण और निर्गुण धारा में बदल देता है. यह अंतर शिल्प और शैली का है, लक्ष्य का नहीं. इसीलिए भक्ति आंदोलन के सूफी संतों को देखते समय हम इस काल को भक्ति काल का नाम देते हैं. भक्तिकाल की इस आसनी का नायक दरअसल नायकों की पहचान के सारे मापदंड तोड़ता है. वो किसी सांचे और खांचे का नहीं है. यह नायक है संत कबीर. कबीर ने उसे ही सबसे सहज सरल बनाकर दुनिया को ब्रह्म और अनहद समझाए. आज उन्हीं कबीर का जन्म दिन है. जिस कबीरचौरा में कबीर कपड़ा बुनते-बुनते समाज का ताना बाना बुन गए. वही कबीरचौरा अपना भी ब्रह्मकेन्द्र रहा है. वहीं जन्मा पला बढ़ा. इसलिए कबीर से अपना वादरायण सम्बन्ध है.

कबीर अपने आप में एक युग थे. वे अपने ज़माने की बेमिसाल अभिव्यक्ति थे. कबीर का एक विस्तृत वैचारिक संसार है. एक ऐसा संसार जो ज्ञान दर्शन की तमाम मौलिक संभावनाओं का शिखर है. कबीर की खूबी ये है कि वे विश्वविद्यालयों में अध्ययन केन्द्र में तो हैं ही, वे दर्शन में हैं, वेदान्त में है, अद्वैत में भी हैं. कबीर की रेंज अद्भुत है. वे भिखारियों की भिक्षा का माध्यम भी हैं. वे गुरु वाणी के पाठ में भी हैं. ओंकार नाथ ठाकुर से लेकर कुमार गन्धर्व तक के गायन में हैं. कबीर का सत्य एक है, दो नहीं. उनके यहां बस सुनना है. कहना नहीं. वे एक तरह के वाद्य हैं और वाद्य शब्दों की भाषा से परे होते है. कबीर जीवन की तरफ़ से नहीं बल्कि मृत्यु की ओर से संसार को देखते हैं.

छह सौ साल से कबीर भाषा के आर-पार हर कहीं मिलते है. हर भूमिका की जड़ तक में घुले हुए. कबीर मठों में बाबा की तरह, पंथों में पंथ गायक की तरह, ग्रन्थों में ग्रन्थ विरोधी की तरह, कामगारों मे दस्तकार, मुसलमानों में ना-मुसलमान की तरह ,पंडितों में कर्मकाण्ड के ख़िलाफ़ खड्गहस्त की तरह, सूफ़ियों में सूफ़ी की तरह और साधुओं मे साधु जैसे हैं. वे भिखारियों के बीच कभी मांगने और कभी देने वाले की भूमिका में हैं. कबीर सारंगी में, ख़ज़ंड़ी में, घुँघरू में, करताल में, खड़ताल में, रबाब में, किंगरी में… हर कहीं मिलेंगे. वे दुख में ,विषाद में, यहां तक कि धूल और मिट्टी में भी आपको मिल जाएंगे.

कबीर पढे़-लिखे नहीं थे पर उनकी रचनाएँ हर पढे़-लिखे के लिए आदर्श हैं. वे वेदान्त और अद्वैत के प्रतिपादक थे. कबीर अमर हैं. शाश्वत हैं. उनकी अमरता की इससे बड़ी निशानी क्या होगी कि पॉंच सौ वर्षों की मौखिक परम्परा में कबीर जीवित हैं. कबीर की रचनाओं में तीन भेद हैं. साखी, सबद और रमैनी. रमैनी में मुख्यत: दोहा चौपाई का प्रयोग है. कबीर के नाम पर क्या और कितना है, इसका अंदाजा बस इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके नाम छह लाख से ज्यादा दोहे हैं. इसी बात पर कहा भी जाता है कि “छह लाख छानबे सहस्र रमैनी एक जीभ पर होय.“ उनके चेलों ने भी उनके नाम पर खूब जमकर ज्ञान पेला है.

उस समय जब हिन्दी बोलियों के सहारे थी, कबीर पहले व्यक्ति थे जिन्होंने हिन्दी को भाषा बनाने की पहल की. उन्होंने सभी भाषाओं से कुछ न कुछ लेकर सधुक्कड़ी भाषा का ईजाद किया. यानी साधुओं की घुमक्कडी वृत्ति से हर जगह के शब्द ले उससे नई सधुक्कडी भाषा बनाना. उन्होंने दुनिया को ठेंगे पर रख एक फक्कड़ाना मस्ती को अपनी शैली बनाया. कबीर के दर्शन का कोई छोर नहीं था. उन्होंने अपना मुँह उत्तर की ओर रखा ताकि बाक़ी दुनिया उसके दक्खिन दिखे. उस ज़माने में कुरीतियों के ख़िलाफ़ जंग के लिए लुकाठी हाथ में लेकर अपना घर फूँकने की तत्परता कबीर ने ही दिखायी. वे सुधार चाहते थे. चाहे व्यवस्था टूट जाए. बीसवीं शताब्दी में लोहिया “सुधरो या टूटो” का एलान कर रहे थे, जबकि कबीर ने यह एलान सोलहवीं सदी में ही कर दिया था.

कबीर ने मोटी-मोटी पोथियों के अस्तित्व को नकारा था. इन पोथियों के बरक्स ढाई अक्षर की प्रतिस्थापना की. उस वक्त लोकतांत्रिक समाज बना नहीं था. नेता विरोधी दल के पद की कल्पना नहीं थी. फिर भी कबीर ने “निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय “ का उदघोष किया. मार्क्स के चार शताब्दी पहले कबीर का साम्यवाद देखिए, “सॉंई इतना दीजिए. जामै कुटुबं समाय. मैं भी भूखा न रहूँ, न साधु भूखा जाय”. मॉंग और आपूर्ति का यह फ़तवा मार्क्सवाद के जन्म से चार सौ साल पहले का था. कबीर ने हमें जो साम्यवाद दिया वो प्लेटो और मार्क्स के साम्यवाद से भिन्न है. प्लेटो का साम्यवाद वंश पर आधारित है और मार्क्स का साम्यवाद अर्थ पर. कबीर का साम्यवाद जीवन मूल्यों पर आधारित है और मानव को जीने का समान अधिकार दिलाता है. इस साम्यवाद में मनुष्य साध्य है और अर्थ साधन और यह साधन मानव कल्याण के लिए प्रयुक्त होता है.

कबीर ने कहा कि “उदर समाता अन्न लै, तनहिं समाता चीर. अधिक संग्रह ना करै, ताको नाम फकीर.” कबीर ने यह सब उस वक्त कहा जब वामपंथ का अर्थ धूमिल की इस कविता की शक्ल में हुआ करता था- “आदमी दाहिने हाथ की नैतिकता से इस कदर मजबूर होता है कि तमाम उम्र गुजर जाती है मगर गांड़ सिर्फ बाएं हाथ धोता है.” आज से छः सौ वर्ष पूर्व भी समय के महत्व को समझते हुए कबीर दास ने कहा कि ‘‘काल करे जो आज कर, आज करे सो अब. पल में परलय होएगी, बहुरी करोगे कब.” इस दोहे में कबीर ने समय के महत्व को थोड़े शब्दों में ही समझा दिया था.

अब बात तुलसी और कबीर पर. हिन्दी आलोचक लोग, आचार्य रामचंद्र शुक्ल के प्रभाव में जिन्हें दो ध्रुव मानते हैं, मैं उनके बीच कई समानताएँ देखता हूँ. तुलसी और कबीर कोई अलग ध्रुव नहीं हैं. दोनों में ढेर सारी समानताएँ है. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और उनकी परम्परा के आलोचक इन दोनों भक्त कवियों में कोई समानता नहीं देखते. दोनों के मूल राम है. दोनों के गुरू रामानन्द है. दोनों संत है. और दोनों का स्वभाव भक्ति है.

ये समझने वाली बात है कि संत-साहित्य भारतीय जीवन की अपनी परिस्थितियों से पैदा हुआ था. हमें उसका स्रोत बौद्ध धर्म, इस्लाम या हिंदू धर्म में ढूँढ़ना नहीं चाहिए. इन धर्मों का उनपर असर तो है, लेकिन ये उसके मूल स्रोत नहीं हैं. जायसी ‘कुरान’ के भाष्यकार नहीं हैं, न कबीर और दादू त्रिपिटकाचार्य हैं, न सूर और तुलसी ‘वेद’, ‘गीता’ या ‘मनुस्मृति’ के टीकाकार हैं.

कबीर और तुलसी दोनों ही प्रायः एक जैसे काल के हैं. दोनों में लोकभाषा का प्रबल आग्रह है. दोनों वैष्णव हैं, रामानंद संप्रदाय के हैं. पर कबीर के राम और तुलसी के राम में मौलिक अंतर है. तुलसी के राम राजा, मर्यादा पुरुषोत्तम एवं परब्रह्म हैं, जबकि कबीर के राम केवल परमब्रह्म हैं. लेकिन कबीर भी उन्हें बार-बार राजाराम कहकर लीला पुरुषोत्तम की ओर संकेत करते से दिखते हैं. परमात्मा से संबंध जोड़ने की कल्पना में पति-पत्नी का रूपक तुलसी की अपेक्षा सूर से मिलता है. तुलसी और कबीर दोनों ही योग के समर्थक हैं. हाँ, कबीर योग को ब्रह्म प्राप्ति का साधन भी मानते हैं. तुलसी उसे बहुत महत्व नहीं देते. दोनों ही संत-सेवक सेव्यभाव में विश्वास करते हैं. तुलसी और कबीर दोनों में दीनता, विनय और आर्तभाव है. इनके बिना भक्ति संभव नहीं. तुलसी अपने तन के चाम से प्रभु की जूती बनाना चाहते हैं तो कबीर राम की कुतिया हैं. कबीरा कूता राम का….

दोनों ही गुरु को महत्व देते हैं. दोनों में गुरु की वंदना है. दोनों के गुरु अलौकिक हैं. लौकिक भी हो सकते हैं, किंतु उनका सम्मान अलौकिक है. कबीर पुस्तकीय ज्ञान के विरोधी हैं. तुलसी भी वाक्य ज्ञान (पुस्तकीय ज्ञान) को मुक्ति के लिए व्यर्थ मानते हैं. तुलसी ने स्वयं लिखा है. लेकिन कबीर ने “मसि-कागद छुए बिना” ही मौखिक तौर पर चारों युगों की बात कह दी. दोनों ही सार्वदेशिक एवं सार्वकालिक अभिव्यक्ति के पक्ष में हैं. दोनों हिंसा विरोधी और अहिंसा के समर्थक हैं. दोनों सत्य को प्रतिष्ठा देते हैं. दोनों ही षड् विकारों को त्यागने के पक्ष में हैं, भोग विरोधी हैं. टूट कबीर पूर्णतः निर्गुण, निराकार के प्रचारक हैं, इसलिए वे किसी सामाजिक स्वरूप की कल्पना नहीं करते हैं. मगर तुलसीदास सामाजिक स्वरूप निर्धारण करने वाले कवि हैं. तुलसी भक्ति में जाति को न मानकर भी सामाजिक व्यवस्‍था में इसे स्वीकार करते हैं. कबीर जाति व्यवस्था को किसी भी स्तर पर नहीं मानते हैं, किंतु अपने को जुलाहा कहते हैं. कबीर संसार और समाज व सामाजिक संबंधों के प्रति रागादि को पूर्णतः व्यर्थ मानते हैं. अतः उन्होंने सामाजिक संबंधों की चर्चा नहीं की. संसार की अनित्यता का स्वर कबीर साहित्य में पूरी ताक़त के साथ प्रस्तुत हुआ है.

यही वजह है कि निर्गुण का मतलब ही हो गया- संसार की अनित्यता का वर्णन. यानी राम नाम सत्य का पर्याय. तुलसीदास को भी यह सब स्वीकार है. किंतु वे समाज निरपेक्ष नहीं हैं. उनकी रचनाओं में समाज और सामाजिक संबंध विस्तृत और पुष्ट हैं. दोनों कवियों के यहाँ श्रृंगार का स्थान नहीं है. पर कबीर स्त्री मात्र को एक भाव माया मानकर देखते हैं, जबकि तुलसी के यहाँ स्त्रियों के अनेक रूप हैं- शूर्पणखा जैसी कामिनी माया है, तो कौशल्या और सीता जैसी माता और पत्नी भी हैं. कभी-कभी तो लगता है कि तुलसीदास आध्यात्मिकता की अपेक्षा सामाजिकता के कवि हैं. जो लोग तुलसी में केवल लोकमंगल देखते हैं, वे उनके आध्यात्मिक पक्ष को भूल जाते हैं. ऐसे ही लोग कबीर को सामाजिक परिवर्तन का कवि मानते हैं, पर उनकी गहरी आध्यात्मिकता उन्हें दिखाई नहीं पड़ती है.

कबीर क्रांतिकारी और विद्रोही हैं जबकि तुलसी समाज में जीते हुए समाज के सुचालक हैं. वो समाज को एक व्यवस्था की मर्यादा में रखने के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम का आदर्श स्थापित करते हैं जबकि कबीर का राम एक शब्द संज्ञा है जो अनहद तक जाने का मनका है. कबीर की यह परिधि तुलसी से भिन्न है. कबीर समाज की स्थापित व्यवस्थाओं के प्रति विद्रोह करते हैं और कर्मकांड, पाखंड, परंपरा को तोड़कर, मुर्ति, मंदिर और मस्जिद को छोड़कर अपने अंदर निहित प्रभु की ओर ले जाते हैं. कबीर का ये विद्रोह सिंचित आध्यात्म नानक और बुल्लेशाह में भी दिखाई देता है. तुलसी इस पद्धति के उलट समाज की भौतिक उपस्थिति में संभावना का रामराज्य देखते हैं.

काशी की प्रतिष्ठा को कबीर भी अस्वीकार नहीं करते. भक्ति की महत्ता की दृष्टि से वे मगहर में मरना चाहते हैं अर्थात् कि वे मगहर को भी पवित्र बनाना चाहते हैं. क्या कबीर ने काशी छोड़कर गलती की? ‘तजलों कासी मति भइ भोरी. प्राननाथ कहु का गति मोरी’. तुलसी काशी में बाहर से आए थे. कबीर काशी में ही पैदा हुए थे. दोनों देशी भाषा के लेखक हैं, किंतु तुलसी पर संस्कृत का गहरा प्रभाव है जबकि कबीर की भाषा मिली-जुली और ऊबड़-खाबड़ है. कबीर में उलटबाँसी है. वे अपनी बात किसी-न-किसी प्रतीक के माध्यम से कहते हैं. कबीर के प्रतीक कठिन हैं. तुलसी सीधी भाषा में बोलते हैं. तुलसी सृष्टि में फैले परमात्म सत्य की अनुभूति कराना चाहते हैं जबकि कबीर हृदय में स्थित ब्रह्म का साक्षात्कार कराना चाहते हैं.

अगर कबीरदास तुलसी के बाद होते तो आलोचक इन्हें तुलसी की आलोचना समझते, किंतु यह आलोचना सबके लिए है. सगुण में निर्गुण लाने का अर्थ है—सगुणोपासना. सगुणोपासना संत तुलसी के पहले भी थी. अतः यह आलोचना तुलसी के पूर्ववर्तियों की है. तुलसी की ‘विनयपत्रिका’ और ‘रामचरितमानस’ दोनों ही दो ढंग की भक्ति बताते हैं. वैसे ही तुलसी और कबीर दोनों की पद्धति भिन्न है. किंतु दोनों ही एक ब्रह्म के उपासक हैं. तुलसी के यहाँ वह सगुण भी होता है. कबीर भी सगुण में व्याप्त व्यापक ब्रह्म के उपासक हैं, इसीलिए दोनों ही जीव की सत्ता में आस्था रखते हैं.

कबीर साधु, फ़क़ीर, पीर, मुर्शिद, मुल्ला, पंडित, पुरोहित, मुज़ाहिरा के जैसे कुछ भी नही हैं. वे करघे पर ताने और भरनी के बीच सुखपन तार सहेजते एक आदमी हैं जिसने पोथी, पुराण, किताब, क़ुरान, पूजा, नमाज़, आरती, ज़ियारत को अपने से दक्खिन रखा है. वह केवल अनहद के बोल को सुनते हैं. निरक्षरता के भीतर ढाई आखर खोजता यह आदमी आधुनिक समाज का ताना बाना बुन जाता है. कबीर को पढ़ने का तरीक़ा किताबों से नहीं निकल सकता, उसके लिए समाज को पढ़ना पड़ेगा. कबीर की तरह ही तुलसी भी अपनी कलम के जरिए समाज की अंतर्चेतना में भीतर तक समाहित हो जाते हैं. वे समाज को निरखते हैं, लिखते हैं, जोहते हैं और साथ ही साथ प्रगतिशील मर्यादा के पथ पर आगे ले जाते हैं. कबीर और तुलसी को पढ़ते हुए कई बार ऐसा लगता है कि अलग अलग सदियों में पैदा हुए ये दो युग प्रवर्तक एक ही युग का प्रतिनिधित्व करते हैं. ये युग प्रेम का है. आस्था का है. सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ जंग का है. मानव की चेतना के विस्तारीकरण का है. सांसारिकता के विस्तार के सूक्ष्मीकरण का है. अनंत को एकाग्र करने का है, एकाग्र को अनंत करने का है. दोनों के बीच विभाजन की लकीर खींचने की कोशिश दरअसल उनके शिल्प और कथ्य पर टकराव भर है, मूल भाव में वो एक हैं और उनके लक्ष्य अलग-अलग अस्त्रों से लड़े गए युद्ध जैसे हैं. कबीर ने केवल दोहे और पद नहीं लिखे हैं. ग़ज़ल भी लिखी है. हमन है इश्क़ मस्ताना,

हमन को होशियारी क्या. उनकी ग़ज़ल की पंक्ति है. जिसे आगे बढ़ाते हुए कबीर को ख़िराज ए अक़ीदत पेश करते हैं कवि Aalok Shrivastav…

हमन है इश्क़ मस्ताना,
हमन को होशियारी क्या*
गुज़ारी होशियारी से,
जवानी फिर गुज़ारी क्या
धुएँ की उम्र कितनी है,
घुमड़ना और खो जाना
यही सच्चाई है प्यारे,
हमारी क्या, तुम्हारी क्या
उतर जाए है छाती में,
जिगरवा काट डाले हैं
मुई तन्हाई ऐसी है,
छुरी, बरछी, कटारी क्या
तुम्हारे अज़्म की ख़ुशबू,
लहू के साथ बहती है
अना ये ख़ानदानी है,
उतर जाए ख़ुमारी क्या
हमन कबिरा की जूती हैं,
उन्हीं के क़र्ज़दारी हैं
चुकाए से जो चुक जाए,
वो क़र्ज़ा क्या, उधारी क्या

कबीर विशिष्ट हैं क्योंकि कबीर सबके हैं. सरल हैं. सुलभ हैं. सुगम हैं. हद से अनहद तक कबीर का ताना है. इसी ताने में ज्ञान के छोटे-छोटे मनकों की बनी माला है. यह माला भी निर्गुण है. दिखाई नहीं देती. लेकिन समझ आती है. सबको समझ आती है. कबीर इसी माला को संसार के गले में डालकर परमानंद में लीन हो गए. यह माला अगर हम फेर सकें तो संसार इस पार भी सरल होगा और उस पार भी. जय जय


चंद्र भूषण-

मुल्ला की बात, साढ़े छह सौ साल पहले

कबीर की पैदाइश से भी 119 साल पहले, सन 1379 में, फिरोज शाह तुगलक के जमाने में लिखी गई इस किताब के दूसरे कड़वक (दोहा-चौपाई समुच्चय) में ही हमारा सामना डमरू, सिंघी और डफ बजाते निकल रहे कनफटे जोगियों से होता है। गुणों के आगर सिद्ध पुरुष ऐसी बातें कह-सुन रहे हैं, जैसे उन्होंने पूरी दुनिया देख रखी हो।

नारा पोखर कुंड खनाए।
मँड़इ देव जेहिं पोस उठाए।।
कानफाट नित आवहिं तहाँ।
औ भगवंत रहैं तिहँ महाँ।।
भेरा डँवरू डाफ बजाए।
सबद सुहाय इँदर मन भाए।।
जोगी सहस पाँच एक गावहिं।
सींगी पूरहिं भसम चढ़ावहिं।।
सिद्ध पुरुख गुन आगर, देखि लुभाने ठाउँ।
कहत सुनत अस जानै, दुनि चलि देखै जाउँ।।

यह किस्से की मुख्य कथाभूमि गोवर नामक नगर में प्रवेश की भूमिका है, जिसका सामाजिक ढांचा बीते साढ़े छह सौ वर्षों में भी ज्यादा बदला हुआ नहीं लगता। ब्राह्मण, खत्री, ग्वाला, गाहड़वाल, अग्रवाल, तिवारी, पंचम वर्ण, तेली, बनजारे, सुनार, सरावगी (जैन), रावत, चौहान और बहुत सारी प्रजा जातियां। भीड़ इतनी कि राह नहीं चली जाती!

बाभन खतरी बसहिं गुआरा।
गहरवार औ आगरवारा।।
बसहिं तिवारी औ पचवानां।
घागर चूनी औ इजमानां।।
बसहिं गँधाई औ बनजारा।
जात सरावग औ बनवारा।।
सोनी बसहिं सुनार बिनानी।
राउत लोग बिसाती आनी।।
ठाकुर बहुत बसहिं चौहानाँ।
परजा पौनि गिनति को जानाँ।।
बहुत जात दरमर अथइ, खोरिहिं हीउ न जाइ।
तैस देस बा गोवर, मानुस चलत भुलाइ।।

अपने लंबे काम के सिलसिले में मुल्ला दाऊद की रचना ‘चंदायन’ में घुसा पड़ा हूं। बचपन में गाय चराते हुए लुरखुर काका से ‘चनइनी’ सुनना प्रिय टाइमपास हुआ करता था, लेकिन लिखित रूप में इससे सामना पहली बार ही हो रहा है। सिर्फ दो मुलाकातों वाले अपने गुरु, इतिहासकार प्रो. परमेश्वरी लाल गुप्ता का जिक्र पीछे मध्यकालीन भोजपुरी काव्य ‘पुहुपावती’ के संपादन के लिए कर चुका हूं। मेरा अंदाजा था, चंदायन तो बहुत पहले, आचार्य रामचंद्र शुक्ल के भी पहले पुख्ता हो चुका होगा।

जानकर आश्चर्य हुआ कि लगभग पचास साल से हिंदी के स्वनामधन्य विद्वान चारों महान अवधी प्रेमाख्यानों में पहली पायदान पर आने वाले इस ग्रंथ की शक्ल देखे बिना ही इसपर लिखते आ रहे थे। प्रो. गुप्ता ने अपनी शुरुआती टिप्पणी में बताया है कि इस ग्रंथ के लिए क्या-क्या पापड़ उन्हें बेलने पड़े। कितने साल तो उन्होंने यह जानने में ही निकाल दिए कि इसकी प्रतियां कहां-कहां मिल सकती हैं। किताब की लिपि एक बड़ी समस्या थी। अरबी-फारसी की मिली-जुली बहुत पुरानी लिपि, जिसे उतारने वालों ने कई जगह अर्थ का अनर्थ कर रखा है या बात को पूरा ही निरर्थक बना दिया है।

पटना के अस्करी साहब ने एक प्रति दी तो बीच में ही उन्हें काम करने से बरज दिया गया कि फलां-फलां विद्वान इसमें जुटे हैं, उन्हीं को करने दें। भाई लोगों ने कुछ काम भी नहीं किया और एक-दो लंबे लेख लिखकर प्रति खोजने का क्रेडिट भी ले लिया। अंततः ब्रिटेन में रहते हुए प्रो. गुप्ता इस पर काम शुरू किया और पटना से लेकर लाहौर तक उपलब्ध गिनती की कुल पांच हस्तलिखित, चित्रांकित और सब की सब अधूरी प्रतियों के आधार पर 1964 में पहली बार संपादन के बाद इसका प्रामाणिक पाठ निर्धारित किया।

मुल्ला दाऊद, मलिक मोहम्मद जायसी, कुतुबन और मंझन के काव्य की जैसी व्याख्या की जाती रही है- सूफी मत के प्रचार के लिए लिखी गई रचनाएं- वह मुझे शुरू से फालतू लगती रही है। क्या रामचरित मानस वैष्णव भक्ति के प्रचार के लिए लिखी गई रचना है? व्याख्या से निष्कर्ष ऐसा निकलता है, जैसे ये लोग कहीं अरब, ईरान या तुर्की से आए मिशनरी थे। यहां आकर इरादा बांधकर अवधी भाषा सीख ली और उसमें ऐसी चीजें लिख डालीं, जिन्हें पढ़कर आम लोग सूफीमत और इस्लाम की तरफ आकर्षित हों।

ऊपर जो दोहे और चौपाइयां आपने पढ़ी हैं, वैसी अवधी पराई भाषा में सांस लेने वाला कोई विदेशी व्यक्ति क्या सात जन्म कोशिश करने के बाद भी लिख सकता है? और इस्लामी प्रचार की शुरुआत में ही योगियों, सिद्ध पुरुषों का वर्णन कोई क्यों करेगा, जिनमें ‘भगवंत’ बसते हैं? पहली पंक्ति से ही स्पष्ट है, मुल्ला दाऊद पीढ़ी दर पीढ़ी अवध (डलमऊ, रायबरेली) के ही रहवासी थे, उनकी भाषा और रचना का संस्कार इसी जमीन का है। बख्श दें महाराज, विद्वान हैं तो कुछ भी बोलकर कोर्स में घुस जाएंगे?

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