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कभी कानपुर के इस अखबार में देवदत्त, प्रमोद तवारी, राजीव शुक्ला, HS नकवी, शम्भुनाथ शुक्ला जैसे तमाम कलमकारों का जलवा था!

शैलेश अवस्थी-

वह भी एक दौर था… गणेश शंकर विद्यार्थी स्मारक शिक्षा समिति के बैनर तले पाण्डुनगर से प्रकाशित एक अख़बार से मैंने अपने पत्रकारिता जीवन का आगाज़ किया। दरअसल वह अखबार मेरी पत्रकारिता की पाठशाला था। प्रबंध संपादक थे श्री राधा कृष्ण अवस्थी जी और प्रधान संपादक थे श्री कैलाश नाथ त्रिपाठी जी। तब इस अख़बार में प्रवीण दीक्षित, उमा रतन त्रिवेदी, विमल त्रिवेदी, अमरीश शुक्ल, रमेश वर्मा, अशोक पांडे, राजेश तिवारी, सुनील वाजपेई जैसे धुरंधर पत्रकार काम करते थे। अखबार का नाम था “दैनिक गणेश”।

उस दौरान देवदत्त मिश्रा, प्रताप बाबू, तनवीर हैदर उस्मानी, राजीव शुक्ल, सुनील दुबे, शम्भूनाथ शुक्ला, सत्य प्रकाश त्रिपाठी, सुभाष, अरुण कानपुरी, एचएस नकवी, विष्णु त्रिपाठी, रवि पांडे, मिंटू बाबू, रविंद्र मिश्रा, हरी नारायण निगम, मज़हर अब्बास नकवी “जामी”, जीपी वर्मा, नरेंद्र भदौरिया, शैलेन्द्र दीक्षित, श्याम दीक्षित, दिलीप शुक्ल, प्रमोद तिवारी, कविन्द्र जी, संत शरण अवस्थी, वाईडी लोशाली, योगेश बाजपेई, नीरज वाजपेई, अरुण अग्रवाल, मेहताजी, योगेश पांडे जैसे पत्रकारों का जलवा था, जिनकी कलम का ज़ोर था।

दिनेश शर्मा, राम कुमार, कुमार त्रिपाठी जैसे गज़ब फोटोग्राफर और सबका अपना अलग अंदाज़। यह कब कहां प्रकट हो जाएं और फोटो क्लिक कर लें, अनुमान लगाना मुश्किल। “आज” अख़बार के स्थानीय संपादक विनोद शुक्ल का अपना अलग निर्भीक अंदाज़, ठसक और धमक थी। मिंटू बाबू के सूत्र, रसूख और सम्मान ऐसा कि कचहरी और अपराध की कोई खबर उनसे छिप ही नहीं सकती थी। दिग्गज राजनेता, बड़े अफसर और पत्रकार भी उनकी विद्वता के सामने शरणागत रहते थे।

अनूप वाजपेई, राजेश द्विवेदी और महेश शर्मा भी पत्रकारिता जगत में तेज़ी से मुकाम बना रहे थे। इन सबके बीच सीखने, समझने और लिखने का मौका मिला। कचहरी में टीन के नीचे चाय की दुकान पर दिग्गज पत्रकारों का जमावड़ा लगता, ख़बरें खोजने की होड़ होती, अख़बार छोटा-बड़ा हो सकता था, लेकिन पत्रकार और उनका सम्मान एक जैसा। कोतवाली के कंट्रोल रूम में नियमित रिपोर्टर जाते, हर थाने, हर क्षेत्र में पत्रकारों के सूत्र होते, खूब मेहनत होती और फिर बेहतरीन, ताजी, खोज़ी, पाठकों की रूचि की खबरें और महत्वपूर्ण सटीक सूचनाएं दी जातीं।

पत्रकारों में ज़बरदस्त एकता और काम सिर्फ पत्रकारिता। तब ज्यादातर पत्रकार साइकिल पर चलते थे। तनवीर के पास वेस्पा स्कूटर, उमा रतन त्रिवेदी, प्रवीण दीक्षित के पास मोपेड और दिलीप शुक्ल के पास राजदूत मोटर साइकिल। रविंद्र मिश्र “दादा” साइकिल पर चलते और उनके साथ दो फुट का डंडा भी हमेशा साथ रहता था। तब ज्यादातर पत्रकारों के घर पर फ़ोन भी नहीं था। सोशल मीडिया तो था नहीं, खबरों के लिए, उनकी सत्यता परखने के लिए खुद चलकर जाना पड़ता या फिर सच्चे सूत्रों का सहारा होता था। कलम-कागज़ का इस्तेमाल।

दैनिक गणेश में पहला वेतन मिला था 380 रुपया। जब 1991 में अख़बार बंद हुआ तो पगार थी 650 रुपए। तब पत्रकारिता मिशन से प्रोफेशन की ओर बढ़ रही थी और अब तो संसेशन बन चुकी है। रिपोर्टर जो लिखता, उसका संपादन होता, जांचने और परखने के बाद ही खबर छपती थी।

नैतिकता ऐसी कि दैनिक गणेश में शराब का विज्ञापन नहीं छापा जाता था। खबरों का ज़बरदस्त असर होता था। पत्रकार जहां भी जाते, उनका सम्मान होता, नेता हो या अधिकारी, हर कोई इज़्ज़त देता था, पत्रकार दरबारी नहीं, खुद्दारी होते थे। अभाव में भी अपना और पत्रकारिता का स्वभाव नहीं बदलते थे।

तपती धूप, बारिश और कड़कड़ाते शीत में भी साइकिल या पैदल खबरों के लिए भटकते रहते थे पत्रकार। वह भी एक दौर था, यह भी एक दौर है..।

(ये फोटो दैनिक गणेश कार्यालय के हैं… एक फोटो में टेलीफ़ोन पर मैं खबर नोट कर रहा हूं और दूसरी में अशोक पांडे जी के साथ विचार-विमर्श कर रहा हूं )

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