किसान सुसाइड के बहाने न्यूज चैनलों की पड़ताल और भारत में खेती-किसानी का भविष्य

Ramprakash Anant : NDTV के पत्रकार ने अभी अभी तीन बातें रखीं कि मरने वाले किसान की सत्रह बीघा फसल बर्बाद हो गई है। रैली में आने से पहले उसने जिन रिश्तेदारों से बात की उससे यही पता चलता है कि वह अपने क्षेत्र के किसानों की स्थिति की ओर इस रैली का ध्यान आकर्षित करना चाहता था। गजेन्द्र के भाई भी आजकल पर यही बात कह रहे हैं। बीजेपी के सिद्धार्थ नाथ कह रहे हैं कि वह पीड़ित किसान नहीं था. वह आप का कार्यकर्ता था।

अंजना ओम कश्यप गहन जांच पड़ताल में जुटी हैं और वे दोष सिद्ध कर तुरंत केजरीवाल को जेल भिजवाने के मूड में हैं। जो बात गजेन्द्र के भाई ने कही है वही बात राम गोपाल यादव ने आज राज्य सभा में उठाई थी कि सरकार हजारों करोड़ का प्रीमियम बीमा कंपनियों को दे रही है और वे किसानों को मुआवजा नहीं दे रहीं हैं। देश का प्रधान मंत्री हेड मास्टर की तरह बोलता है- ”देश की जीडीपी बढ़ी, बोलो ये गरीब और किसान के लिए हुआ या नहीं। मुआवजा पचास परसेंट फसल खराब की जगह से कम कर तैतीस परसेंट फसल खराब पर कर दिया, यह किसान के हक़ में हुआ या नहीं।” अब कोई इन्हें क्या बताए कि तैंतीस क्या तीन परसेंट पर कर दो, जब मुआवजा देना ही नहीं है तो क्या फ़ायदा।

ABP, IBN7, इंडिया टीवी जी न्यूज़ का पीपली लाइव चालू है। सुमित अवस्थी को देख के लगता है कि उन्हें यह भी नहीं पता है किसान क्या होता है। वे आशुतोष के बड़े भाई हैं। आम आदमी के सांसद से पूछ रहे थे कि आपकी सरकार ने तीन लाख का एलान किया है क्या इतना काफी है? मुआवजा के पंद्रह-पंद्रह रूपए के चैक किसानों तक पहुँच रहे हैं और बाउंस हो रहे हैं। किसान रोज़ आत्महत्याएं कर रहे हैं। सरकारें इस बात को स्वीकार नहीं कर रही हैं। पिछले महीने भर चैनलों पर निगाह डाल के देखिए NDTV ने लगातार रिपोर्टिंग की है वरना कोई चैनल रिपोर्टिंग तक नहीं कर रहा है।
परसों के टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने सम्पादकीय लिखा है ”टायर्ड पैंटोमिम” इस सम्पादकीय में राहुल गांधी के संसद में दिए भाषण की आलोचना करते हुए किसानों हालात की खिल्ली उड़ाते हुए केंद्र सरकार के मन की बात की है। अखबार ने लिखा है- ”प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उचित मुआवजा व पारदर्शी भूमि अधिग्रहण के लिए सुदृढ़ परिवर्तन किए हैं। संक्षेप में अखबार ने लिखा है कि किसान को स्थाई रूप से गरीबी पीड़ित मान लिया है, इस गरीबी से लाखों लोगों ने अपने आप को नए मध्यवर्ग के रूप में निकाला है और अभी भी 60 % किसान अनुत्पादित कृषि जो जीडीपी में महज 13.9 % योगदान देती है में फंसे हुए है।”

यही बात NDTV पर रविश से कृषि विशेषज्ञ देवेन्द्र ने कही थी कि विश्व बैंक की गाइडलाइन्स हैं कि भारी संख्या में कृषि से निकाल कर लोगों को उद्योग में लगाया जाए। मनमोहन सरकार उतनी तेज़ी से काम नहीं कर रही थी। मोदी ने आते ही बहुत फुर्ती से काम शुरू किया है। आने के तुरंत बाद उन्होंने श्रम कानूनों में बदलाव कर पूंजीपतियों के लिए उपयोगी बनाया। अब उनके मंत्री खुलेआम कह रहे हैं विकास के लिए ज़मीन की ज़रूरत तो पड़ेगी ही और वह किसानों से ली जाएगी। उम्मीद की जानी चाहिए आने वाले समय में मोदी ऐसे हालात पैदा कर देंगे कि साठ प्रतिशत आबादी दो वक़्त की रोटी के लिए कारखाने में काम कर के विकास करने के लिए मज़बूर होंगे।

राम प्रकाश अनंत के फेसबुक वॉल से.

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