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सियासत

सरकार के “सब चंगा सी” वाले दावों के बाद भी मीडिया में छत्तीसगढ़, उप्र, मप्र और अन्य राज्यों से किसानों द्वारा फसल नष्ट करने की खबरें क्यों?

ताजा खबर छत्तीसगढ़ से है। विष्णुदेव सरकार शासित राज्य के किसानों की बदहाली की तस्वीरें सामने आई है। सरकार भले ही किसानों की आमदनी बढ़ाने और फसल का वाजिब मूल्य दिलाने के बड़े-बड़े दावे करती हो, लेकिन ज़मीन पर हालात इसके बिल्कुल उलट हैं।

हालिया मामला उस वक्त सुर्खियों में आया जब एक किसान ने अपनी मिर्च की पूरी फसल कन्हर नदी में बहा दी—सिर्फ इसलिए क्योंकि मंडी में न तो खरीदार मिला, न दाम।

यह घटना अंबिकापुर से लगे छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश सीमा क्षेत्र की है, जहाँ किसान बेहतर दाम की उम्मीद में दूसरे शहर की मंडी गया था। लेकिन उसे वहाँ भी फसल की कीमत इतनी कम मिली कि ढुलाई का खर्च निकालना भी नामुमकिन हो गया। हताश होकर किसान ने पूरी उपज—मिर्च की दर्जनों बोरियाँ—कन्हर नदी में फेंक दी।

मजबूरी नहीं, सिस्टम की नाकामी

बारिश से बेहाल इस इलाके के 2050 एकड़ में लगी मिर्च की फसल की लागत करीब 61 करोड़ रुपये आंकी गई थी। लेकिन बाजार में गिरते दाम और खरीदारों की बेरुखी ने किसानों को बर्बादी की कगार पर ला खड़ा किया है।

यह वही मिर्च है जो पिछले साल प्रति एकड़ 2.5 से 3 लाख रुपये तक मुनाफा दे रही थी। इस बार कीमतें इतनी गिरीं कि किसान अपनी फसल उठाकर लौट आए या फिर, इस मामले की तरह, बहा दी।

यूपी, एमपी, कर्नाटक और अन्य राज्यों के किसान भी दिक्कतों में

फसल उत्पादन का गढ़ माने जाने वाले सहारनपुर में 6 मार्च 2025 को खबर आई की एक किसान ने अपनी पूरी गोभी की फसल ट्रैक्टर से रौंद डाली। इसके पीछे वजह रही फसल के दाम अच्छे नहीं मिले। किसान नेता राकेश टिकैत ने मध्य प्रदेश के किसान का वीडियो शेयर करते हुए उसकी व्यथा कही है। किसान को प्याज की फसल का रेट ही सही नहीं मिला।

मई 2025 में कर्नाटक से एक वीडियो सामने आया था, जिसमें प्याज का सही दाम न मिलने की वजह से किसान ने बीच सड़क अपनी पूरी फसल फेंक दी और उसमें लोटता हुआ दिखाई दिया था। यह खबर सरकार के कथित भोंपू चैनल इंडिया टीवी ने प्रमुखता से चलाई थी।

खाद की किल्लत अलग से

सरकार किसानों के लिए उचित रेट में भरपूर पर्याप्त मात्रा में खाद वितरण का दावा करती है। लेकिन उत्तर प्रदेश समेत अन्य कुछ राज्यों से खाद की किल्लत और ओवररेटिंग को लेकर खबरें निकलकर सामने आती रहती हैं। जबकि एमपी के पूर्व मुख्यमंत्री से केंद्रीय मंत्री बन चुके शिवराज सिंह चौहान समय-समय पर किसानों के लिए तोहफों और वादों की भरमार करते रहते हैं।

सरकार की चुप्पी सवालों के घेरे में

सरकार की ओर से किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP), बाजार सुविधा और फसल बीमा जैसी योजनाओं का खूब प्रचार किया जाता है, लेकिन जब किसान को अपनी मेहनत का मूल्य नहीं मिलता, तो ये योजनाएं कागजों में ही सजी लगती हैं।

किसान संगठनों ने इस घटना को सरकार की कृषि नीति पर करारा तमाचा बताया है। उनका कहना है कि यदि फसल की खरीद की गारंटी नहीं दी गई और किसानों को बाजार में ऐसे ही छोड़ा गया, तो वह दिन दूर नहीं जब किसान खेत छोड़ने पर मजबूर हो जाएंगे।

इस लिंक पर वीडियो देखें…

https://www.facebook.com/share/v/1DZRnCcox2

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