बिहार विधानसभा चुनाव : सोच में हूं, किसे दूं वोट

बिहार में विधानसभा चुनाव की सरगर्मी सिर चढ़कर नेताओं पर बोल पर रही है। सरगर्मी इतनी है कि कोई गौमांस पर बयान दे रहा है तो, कोई किसी को नरपिषाच तो कोई किसी को षैतान कह रहा है। ये कोई छुट भैया नेता नहीं बल्कि देष के दिग्गज नेताओं के जुबान बोल रहें हैं। इन जबानों से विकास की बातें जैसे नदारद सी हो गई हैं। आम जनता टिवीयों, अखबारों और सोसल मीडिया पर देखकर सुनकर जैसे पषोपेष में फंस सी गई है कि किसे दूं वोट। आखिर क्या मिला है ऐसे चुनावों से अबतक हमें और हमारे राज्य को।

सवाल अब जेहन में यही उठने लगा है कि वोट किसे दूं, दूं भी की नहीं क्योंकि हालात तो वही हैं ढ़ाक के तीन पात जैसी। वोट किसी को भी दूं, वही भ्रष्टाचार वही हालत और राज्य जिसमें बिहार हो तो फिर क्या कहना, लेकिन एक बिहारी होने के नाते मैं भी ऐसा क्यों बोल रहा हूं। यह भी एक सवाल है। सवाल होना भी लाजमी है और न जाने ऐसे कितने ऐसे सवाल हैं जो सिर्फ मेरे जेहन में ही नहीं बल्कि प्रत्येक बिहारियों के जेहन में मानों जैसे अब घर कर गया हो।

हममें आईएएस, आईपीएस, आईआईटीएन बनने की खूब क्षमता मानों विरासत में मिली हो, लेकिन विकास की कसौटी पर हमारा राज्य क्यों पीछे अबतक है। यह सबसे बड़ा सवाल है। चुनाव के समय हम क्यों नहीं सोचते हैं कि गंदी राजनीति करने वाले नेताओं को सबक सिंखाएं जो बड़ी-बड़ी बातें करतें तों हैं, लेकिन विकास के नाम पर सिर्फ अपने परिवार और अपने परिजनों का ही विकास करते हैं। इस चुनाव में चार पूर्व मुख्यमंत्रियों ने अपने बेटों को चुनाव मैदान में उतारा है, लेकिन इन मुख्यमंत्रियों के बच्चों का इतिहास जानेंगे तो एक बार फिर सिर शर्म से झुक जाएगा। कोई नौवीं फेल तो कोई मुंबई की मायानगरी में ऐस की जिंदगी से सराबोर होकर मानों ऐसे आया हो कि चलो अब घर वापस जाकर बपौती की साख पर बिहार की जनता से खेलूं। क्या हम अपने भविष्य की इबारत लिखने का हक उन्हें सौंप सकते हैं, जिन्हें यही नहीं पता की तकलीफ और आम जिंदगी का मतलब क्या है। यह एक गंभीर मसला है।

भूख, गरीबी, बेरोजगारी और पिछड़ापन और न जाने क्या-क्या हमारे राज्य की निषानी बन गई है। दूसरे राज्यों में बसे बिहारियों से पूछें जब वह अपना राज्य छोड़कर दूसरे राज्यों में नौकरी या पढ़ाई करने जातें है तो उन्हें रहने के लिए कोई मकान नहीं देता है कोई अच्छी नजर से नहीं देखता, सबकी नजरों में हिकारत होता है और हो भी क्यों न, क्योंकि हमारे नेताओं ने बिहार के मान सम्मान को पता नहीं कहां गिरवी रख दिया है। दिल्ली जैसे राज्यों में बिहारी शब्द को ही गाली बना दिया है। चलो यह कोई नई बात नहीं है।

इस चुनाव में बिहारी होने का गर्व हमें तभी मिलेगा जब हम एक ईमानदार प्रतिनिधि चुनेंगे, लेकिन सामने कोई विकल्प नहीं है। लेकिन रास्ता तो बनाना पड़ेगा भाई। सभी बिहारी भाईयों को राजेन्द्र प्रसाद, लोहिया एवं उन सभी बिहारियों को याद करने की जरूरत है जिन्होंने हमें बिहारी होने का गर्व दिया है, न कि उन नेताओं को याद जिसने घोटाले, परिवारवाद, एवं न जाने और क्या-क्या देकर हमें विकास एवं सम्मान की पटरी से नीचे ला खड़ा किया है।

मुझे बिहारी होने का बहुत गर्व है और मैं अपना वोट तभी किसी को दूंगा जब बिहार को आगे बढ़ाने की क्षमता किसी ईमानदार प्रतिनिधि में देखूंगा। फिलहाल तो मुझे कोई नहीं दिखता। सच कहूं तो एक ईमानदार और निस्वार्थ क्रांति की जरूरत है जो हमें फिर से जिंदा कर सके। मैं यह भी मानता हूं कि चुनाव में मतदान जरूरी है, लेकिन किसे करूं और क्यों करूं। जनता की परेषानी दिनों दिन बढती जा रही है। लोग सरकारी कार्यालयों में भटकते फिरते हैं गरीबों को इलाज नहीं मिलता। क्या-क्या लिखूं और कितना। सब जानते हैं आप लोग। जागिए जात-पात से उपर होकर और सोचिए हमारा भविष्य किसके हाथों में होना चाहिए। अब करने का समय है। विरोध या फिर उन्हीं नेताओं की गुलामी जो हमारा शोषण करते आ रहे हैं और अपने बच्चों को बेहतर पाल रहे हैं।

जागिए इस चुनाव में और सोचिए कि किसे दूं वोट।

मदन झा

पत्रकार

संपर्क : rajmadan29@gmail.com

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