संजय कुमार सिंह
आज मेरे नौ में से आठ अखबारों की लीड भारत अमेरिका व्यापार समझौते की खबर है। नौवें अखबार, देशबन्धु की लीड राहुल गांधी के न्यूज लेटर की है। इसके जरिए उन्होंने बताया है कि संसद में इस हफ्ते का घटनाक्रम अलोकतांत्रिक था। यही देशबन्धु की लीड का शीर्षक है। ई-मेल के जरिए नागरिकों को सीधे और सोशल मीडिया के जरिए साझा किए गए न्यूजलेटर में राहुल गांधी ने लिखा है, इस हफ्ते संसद में कुछ ऐसा हुआ, जो न सिर्फ़ अभूतपूर्व था, बल्कि पूरी तरह अलोकतांत्रिक भी था। नेता प्रतिपक्ष के तौर पर, जब मैंने एक गंभीर राष्ट्रीय सुरक्षा संकट के दौरान प्रधानमंत्री मोदी की ज़िम्मेदारी से पीछे हटने पर सवाल उठाया, तो मुझे बोलने ही नहीं दिया गया। पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की किताब में सामने आए तथ्यों ने एक असहज सच्चाई उजागर की है – जब चीन भारत पर दबाव बना रहा था, तब प्रधानमंत्री हमारी सेना के साथ खड़े नहीं हुए। कहने की जरूरत नहीं है कि भारत-अमेरिका व्यापार सौदे का मामला नहीं होता तो इस खबर को दूसरे अखबारों में भी प्रमुखता मिलती। भाजपा हेडलाइन मैनेजमेंट करती है और इसके लिए खबरें गढ़ना, बनाना और पैदा करना सब आम है। सबके उदाहरण मिल जाएंगे। अफसोजनक यह है कि इसमें झूठ और अदालती प्रक्रिया भी होती है। राहुल गांधी की ब्रिटिश नागरिकता का मामला सरकार को निपटा देना चाहिए – पता नहीं वास्तविक स्थिति क्या है। मामला अदालत पहुंच गया और सुर्खियां बनती रहीं। अब सोनिया गांधी की नागरिकता का मामला है। यह 80 के दशक का मामला है और जाहिर है कि इस समय उठाया जा रहा है तो मकसद और कारण दोनों ही राजनीतिक होगा। सामान्य प्रक्रिया की बात होती तो एसआईआर का मामला ज्यादा महत्वपूर्ण है। कई बार, कई तरह से कहा और बताया जा चुका है कि चुनाव आयोग इस तरह एसआईआर करा ही नहीं सकता है और जो हो रहा है वह सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के फायदे के लिए है। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट में अभी तक स्वीकार्य, चुनाव आयोग का तर्क यही है कि वह मतदाता सूची में शामिल लोगों की नागरिकता जांच रहा है। नागरिकता जांचना चुनाव आयोग का काम नहीं है पर उसने जांचने का अलग कारण बताया और अभी तक यह सुप्रीम कोर्ट में स्वीकार किया गया लगता है। पश्चिम बंगाल में पता चला कि इसके बहाने या इस फेर में लोगों की उम्र, माता-पिता की उम्र से अंतर आदि की भी जांच की जा रही है। इसे लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी कहा जा रहा है और चुनाव आयोग इसकी भी जांच कर रहा है जो नागरिकता की जांच के लिए लगभग व्यर्थ है और कम समय में होने वाले एसआईआर के लिए बिल्कुल भी जरूरी नहीं है। वैसे भी, करोड़ों लोगों की नागरिकता जांच करने का काम चुनाव आयोग क्यों करे? जिसका नाम पहले से है उसे रहने देना चाहिए। चुनाव के बाद पांच साल में जांच-परीक्षण, एसआईआर सब होता रह सकता था। पर मकसद स्पष्ट है। स्वीकारना नहीं है। यही हाल सोनिया गांधी की नागरिकता और मतदाता सूची में नाम के मामले में है। लेकिन विवाद इस बात पर भी है कि सुप्रीम कोर्ट में ममता बनर्जी का पेश होना सही था कि नहीं। जाहिर है, इसके अच्छे उद्देश्य बताए जा सकते हैं और इसे आदर्श व्यवहार भी कहा जा सकता है लेकिन तमाम दूसरे मामलों पर चर्चा नहीं है तो सुप्रीम कोर्ट में आदर्श स्थिति होने का दिखावा (अगर किया जा रहा है) तो व्यर्थ है और न भी हो तो गौरतलब है। मैं उसी को रेखांकित करना चाहता हूं।
द टेलीग्राफ में आज छपी खबर के अनुसार, बंगाल में एसआईआर की सुनवाई समाप्त हो गई। उत्तर प्रदेश में तारीख बढ़ा दी गई है। बंगाल में सरकार या मुख्यमंत्री ने एसआईआर के मामले में जो सब कहा किया वह सर्वविदित है और इसके मुकाबले उत्तर प्रदेश में जो हुआ वह भी सार्वजनिक है। इसके बावजूद उत्तर प्रदेश में तारीख बढ़ाई गई और बंगाल में नहीं – तो यह तथ्य है कि बंगाल में भाजपा की सरकार है और पश्चिम बंगाल में भाजपा सत्ता पर कब्जा करना चाहती है। यह धारणा आम है कि भाजपा जहां सत्ता में होती है वहां चुनाव जीत जाती है और जहां नहीं जीत पा रही है उनके लिए एसआईआर हो रहा है और भाजपा की जरूरत के अनुसार किया जा रहा है। इसकी आशंका बंगाल में विरोध और उत्तर प्रदेश में अपेक्षाकृत शांति से भी होती है। एसआईआर के नाम पर जो हो रहा है उसका पता खबर के इस अंश से चलता है। खबर के अनुसार, जब आसिफ अली को चुनाव आयोग की ओर से सुनवाई का समन मिला तो उन्होंने “अपमानित” महसूस किया। 32 साल के आसिफ अली शनिवार को सेंट्रल एवेन्यू स्थित मुत्ती लाल सील के फ्री कॉलेज में मौजूद थे। यहां भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए एसआईआर के तहत सुनवाई का आखिरी दिन था। किसी ने फॉर्म 7 दाखिल कर आरोप लगाया था कि अली भारतीय नागरिक नहीं हैं। जाहिर है यह सब नहीं होना चाहिए और बांटों राज करो की कोशिश का भाग हो सकता है और स्थिति यह है कि आजादी के इतने समय बाद भी नागरिकों को यह समझ में नहीं आया है और हो पा रहा है। सबकी जानकारी में। सिस्टम 1980 के सोनिया गांधी के मामले की जांच कर रहा है। खबर आगे कहती है, अली ने सुनवाई केंद्र में द टेलीग्राफ को बताया, “जन्म प्रमाण पत्र से लेकर पासपोर्ट तक, मेरे पास सभी दस्तावेज हैं। मुझे अपने चुनावी अधिकार खोने की चिंता नहीं है। लेकिन मुझे इस बात का अपमान महसूस हो रहा है कि मुझे अपनी भारतीयता साबित करनी पड़ रही है।” जाहिर है, बहुत सारे लोग इस कारण चुनावी अधिकार खो देंगे या छोड़ देंगे। यह चुनाव आयोग के कोई वोटर छूटे ना के खिलाफ है। लेकिन कोई देखने-सुनने-मानने वाला नहीं है। नागरिकता की जांच चुनाव आयोग कर रहा है जो उसका काम नहीं है। एसआईआर की इस गैर जरूरी प्रक्रिया में द टेलीग्राफ की दूसरी खबर के अनुसार, 1.5 करोड़ मतदाताओं के करीब 2,000 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं। चुनाव आयोग या सरकार जो खर्च कर रही है सो अलग। इंदिरा गांधी ने सरकारी संसाधनों का उपयोग अगर किया था तो इसके मुकाबले बहुत कम रहा होगा और अभी अगर इसे देखा-दर्ज नहीं किया जा रहा है तो आप समझ सकते हैं कि क्या हो रहा है पर वह अलग मुद्दा है।
जहां तक अमेरिका के साथ व्यापार करार का मामला है, राहुल गांधी ने संसद में जनरल नरवणे की किताब का अंश पढ़ना चाहा तो पूरी सरकार ने उन्हें रोकने के लिए जो सब किया वह सर्वविदित है। किताब के अंश अब सार्वजनिक हैं लेकिन मीडिया में उसपर चर्चा नहीं है। मुझे नहीं पता किसी ने जनरल नरवणे से बात करने की कोशिश की या नहीं और उनका कोई इंटरव्यू इस सिलसिले में अभी तक हुआ है या नहीं। जो स्थितियां हैं उनमें जनरल नरवणे इंटरव्यू के लिए तैयार होंगे या नहीं – यह भी अलग मुद्दा है। 2014 की आजादी और अमृतकाल से पहले ऐसे लोगों का इंटरव्यू तुरंत आ जाता था। अभी राहुल गांधी को किताब के अंश पढ़ने से रोक दिया गया। इस तर्क पर कि किताब अप्रकाशित है और अगले दिन भाजपा के निशिकांत दुबे को तमाम छपी हुई किताबें ‘पढ़ने’ दी गईं। मुद्दा यह है कि किताबें पहले की छपी हुई हैं, तमाम लोगों की जानकारी में हैं और उसमें खबर नहीं है। खबर, अगर है तो यही कि उस समय किताबें छपने दी गईं, दी जाती थीं और उपलब्ध भी हैं जबकि भाजपा शासन में रक्षा मंत्रालय ने 2020 से लेकर 2024 तक के चार साल में 35 आवेदनों में से 34 को निपटा दिया है, अनुमति दे दी है लेकिन 35वें के मामले में दो साल में भी फैसला नहीं कर पाई है। यह खबर कहीं नहीं दिख रही है। दूसरी ओर, जिस दिन संसद में हंगामा हुआ और सरकार को इसके विस्तार का अंदाजा लग गया उसी दिन अचानक ट्रम्प ने व्यापार करार की घोषणा कर दी। मुझे लगता है कि यह हेडलाइन मैनेजमेंट के लिए ही किया-कराया गया होगा। एपस्टीन फाइल में फंसे तो ट्रम्प भी हैं। मेरी शंका की पुष्टि अगले दिन प्रधानमंत्री मोदी के सम्मान से हो गई। क्योंकि करार का मसौदा नहीं था और सम्मान हो रहा था जबकि सम्मान करना ही था तो ई-यू से समझौते के लिए किया जाना चाहिए था। पर तब भाजपा को इसकी (या ऐसी खबर की) जरूरत नहीं थी।
मोटा-मोटी छह फरवरी को खबर छपी थी कि व्यापार समझौते पर चार से पांच दिन में साझा बयान जारी करेंगे। यानी यह पांच की घोषणा है। नौ से पहले घोषणा का मतलब है चार से पांच दिन का अनुमान गलत है। घोषणा सात को ही हो गई। पांच फरवरी की घोषणा यही थी कि अमेरिका मसौदा तैयार कर रहा है। इससे साबित होता है कि समझौते के मसौदे को लेकर भारत को जानकारी नहीं थी या गलत जानकारी दी गई है। क्रोनोलॉजी और घोषणाओं के आधार पर यह बात साबित होती है। शुरुआत 27 जनवरी 2026 को भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) से होती है। इसे ई-यू टर्न भी कहा गया था। खबर यह थी कि भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। प्रधानमंत्री ने बाद में कहा कि पहले ऐसे समझौते क्यों नहीं होते थे। उन्होंने बोफर्स डील का उदाहरण भी दिया। इसमें भ्रष्टाचार अदालत में साबित नहीं हुआ। तथ्य यह भी है कि अन्य लोगों के अलावा भाजपाई अरुण शौरी ने भी इसे मुद्दा बनाया था। बदले में केंद्रीय मंत्री बने थे। नरेन्द्र मोदी का विरोध किया तो उनके खिलाफ भी जांच शुरू हुई फिर आश्चर्यजनक रूप से बंद हो गई। विरोध भी बंद है। हालांकि अरुण शौरी की उम्र भी इसका कारण हो सकती है। ई-यू के साथ करार लगभग 20 वर्षों की बातचीत के बाद हुआ और इसे भारी टैरिफ़ हटाने वाला महत्व दिया गया। यह समझौता लम्बे समय से चल रही वार्ता की परिणति जैसा था और वैश्विक व्यापार में भारत-ईयू रिश्तों को एक नया आयाम देता है। इसके बाद 6–7 फरवरी 2026 को भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते की घोषणा होती है। उसी दिन भारत की संसद में हंगामा हुआ था और सरकार घिर गई थी। अचानक रात में करार की घोषणा हो गई। अगले दिन अखबारों की लीड करार की खबर थी। मोटे तौर पर दिखाया गया कि 6 फरवरी 2026 के आसपास अमेरिका और भारत ने एक अंतरिम व्यापार ढाँचा तैयार किया। इससे भी टैरिफ में कटौती की घोषणा हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस फैसले को सकारात्मक बताया और अमेरिकी राष्ट्रपति को धन्यवाद कहा जबकि यह पूर्ण व्यापार समझौता नहीं, बल्कि अंतरिम ढाँचा है जिसे अंतिम रूप देना है। अब सबको पता है कि ट्रम्प प्रशासन ने घोषणा जल्दी या सबसे पहले कर दी। भारत ने अंतरिम व्यापार घोषणा के बाद विस्तृत मसौदा सार्वजनिक नहीं किया। यह स्पष्ट दिख रहा है कि भारत ने यूरोपीय बाजार के साथ डील को प्राथमिकता दी। यह अमेरिका-भारत व्यापार समझौते की तुलना में बड़ा और अधिक तैयारी से जुड़ा हुआ था। इसके बावजूद अमेरिका से करार की अचानक घोषणा संयोग है या प्रयोग? क्रोनोलॉजी से यह साबित होता है कि घोषणा भारत-ईयू करार के बाद अपेक्षाकृत जल्दी आई। इस और अन्य कारणों से अमेरिका-भारत डील की घोषणा ने मीडिया और राजनीतिक विमर्श का ध्यान अन्य बड़े विषयों से खींचा। इसके बाद प्रधानमंत्री का सम्मान और बोफर्स डील की चर्चा विवाद बढ़ाने के लिए भी हो सकती है। अब यह साफ हो चला है कि भाजपा कांग्रेस के बनाए पिच पर खेलती है कांग्रेस (और विपक्ष) भाजपा की जाल में नहीं फंसता है। (जारी)
आगे पढ़िए – अपुष्ट, घिसी-पिटी ‘खबर’ को सबने प्रमुखता दी है और लगता है अभी चलता रहेगा। लिंक – https://www.bhadas4media.com/apust-ghisi-piti-khabar-ko-subne-pramukhta-dee-hai/
लेखक, संजय कुमार सिंह से [email protected] के जरिए संपर्क किया जा सकता है।


