संतोष भारतीय-
कल टीवी पर कुछ देख रहा था कि अचानक एक शीर्षक उभरा — लास्ट एपिसोड। टीवी या ओटीटी पर तो पता रहता है कि कौन-सा एपिसोड आखिरी है, लेकिन असल जिंदगी में यह कभी पता नहीं चलता कि जीवन का लास्ट एपिसोड किस घंटे, किस घड़ी और किस सेकंड पर सामने आकर खड़ा हो जाएगा।
जीवन का लास्ट एपिसोड खत्म होने के बाद कुछ नज़दीकी मित्र, कुछ प्रशंसक श्मशान या कब्रिस्तान तक साथ जाते हैं। लेकिन वहां भी कई लोग घड़ी देखते रहते हैं— कि कब शरीर भस्म हो या कब्र मिट्टी से भर दी जाए ताकि वे अपने-अपने कामों में लौट सकें।
बहुत-से लोग तो चिता शांत होने तक या कब्र पूरी मिटने तक भी नहीं रुकते। श्मशान से बाहर निकलते ही वे रेडियो या मोबाइल में गाने सुनने लगते हैं, ताकि उस बोझिल माहौल से मन हट सके।
घरवाले और रिश्तेदार पहले 24 घंटे तक बातें करते हैं — जाने वाला ऐसा था, वैसा था। कुछ उसके गुणों की चर्चा करते हैं तो कुछ कर्मों की। तीसरे दिन से बातें बंद हो जाती हैं, और मृत्यु के बाद होने वाले समारोह की तैयारी शुरू हो जाती है।
यह समारोह धीरे-धीरे श्रद्धांजलि से अधिक शक्ति प्रदर्शन का आयोजन बन जाता है। लोग आते हैं, खाना खाते हैं, स्वाद पर चर्चा करते हैं और चले जाते हैं। कोई यह नहीं सोचता कि जिस परिवार का सदस्य चला गया है, उसके पास इस अचानक आए खर्च की व्यवस्था है भी या नहीं।
शादी में लोग लिफाफे में रुपये देकर नवदंपति को आशीर्वाद देते हैं, लेकिन किसी बीमार व्यक्ति के इलाज या किसी के निधन के बाद आए संकट में वही समाज मौन रहता है। न कोई मदद करता है, न संवेदना से आगे बढ़कर कोई हाथ बढ़ाता है।
व्यक्ति के जीवन का लास्ट एपिसोड जब खत्म होता है, तब उसके परिवार में संपत्ति के बंटवारे का नया अध्याय शुरू हो जाता है। कानून के पन्ने पलटे जाते हैं, वकीलों से सलाह ली जाती है ताकि हर कोई उस हिस्से पर दावा कर सके — जो उन्होंने खुद नहीं कमाया होता।
जिस व्यक्ति का लास्ट एपिसोड खत्म होता है, उसके दुख, संघर्ष, और खामोशियां किसी को नहीं दिखतीं। और अगर दिखती भी हैं, तो कोई उन्हें जानना या समझना नहीं चाहता।
यह कहानी केवल साधारण व्यक्ति की नहीं है — यह उन लोगों की भी है जिन्होंने अपने दम पर साम्राज्य खड़ा किया, करोड़ों कमाए, सम्मान पाया। लेकिन उनके जाने के बाद परिवार के भीतर वही लोग उनकी आलोचना में जुट जाते हैं — अगर उन्होंने ऐसा किया होता तो और पैसा आता, इतना बर्बाद क्यों किया…। उनका नाम परिवार के इतिहास से धीरे-धीरे मिटा दिया जाता है। और जाने वाला यह देखने लौटकर नहीं आता कि कौन शोक मनाने आया, और कौन नहीं।
इसलिए, अपने लास्ट एपिसोड से पहले हंस लेना चाहिए, मिल लेना चाहिए, और मुस्कुरा लेना चाहिए। जीवन के अंतिम दृश्य के लिए तैयार रहना ही सबसे बड़ा आत्मज्ञान है।
क्योंकि किसी को नहीं पता कि उसका लास्ट एपिसोड 18 साल की उम्र में आएगा या 80 में। मनुष्य खुशियाँ बाँट नहीं सकता, लेकिन वह मुस्कुराहट बाँट सकता है — और यही सबसे बड़ा उपहार है।
जब कोई अनजान व्यक्ति आपसे कह दे कि “आपकी मुस्कुराहट बहुत खूबसूरत है”, तब समझिए कि आपने जीवन में वह काम कर दिया है जिसे याद रखा जाएगा। लास्ट एपिसोड के बाद भी अगर लोग आपकी मुस्कुराहट को याद रखें, तो समझिए कि आपका जीवन अधूरा नहीं था — बल्कि पूर्ण था।
इसलिए, जीवन के लास्ट एपिसोड के लिए हमेशा तैयार रहिए — मुस्कुराहट के साथ।


