लास्लो क्रास्नाहोरकाई László Krasznahorkai : हंगरी के लेखक, जिन्हें इस बार का नोबेल पुरस्कार मिला है, पेश है उनका एक इंटरव्यू-
बीस पेज लम्बा वाक्य
लोग मेरी भाषा व वाक्यों पर अचरज जताते हैं. कई बार मेरा एक वाक्य बीस पेज लंबा होता है. मैंने अपनी हंगारी भाषा को इस तरह इस्तेमाल किया है, कि उसे लोग ‘क्रास्नाहोरकाई हंगारी’ कहने लगे हैं. जब कोई इसे अंग्रेज़ी में अनुवाद करता है, तो उसे इसके लिए एक ख़ास किस्म की ‘क्रास्नाहोरकाई अंग्रेज़ी’ खोजनी पड़ती है.
मैं अपने लेखन में इतने लंबे वाक्यों का प्रयोग क्यों करता हूं?
लंबे वाक्यों के पीछे एक कहानी है. जब मैंने लिखने की शुरुआत की, तो मुझे एकांत नहीं मिल पाता था. मैं हमेशा परिवार व भीड़ के बीच रहता था. अपने मन में लिखता रहता था. मैं आरंभ में एक वाक्य बनाता, फिर उस वाक्य में जोड़ता जाता, वह सबकुछ मैं याद रखता था. जब भी मौक़ा मिलता, मैं उन्हें लिखने बैठ जाता. इस तरह मेरी स्मृति से एक लंबा वाक्य निकल कर आ जाता. इस तरह मेरे वाक्यों की लंबाई बढ़ती गई.
मेरी किताबों पर महान फिल्मकार बेला तार (Bela Tarr) ने कई फिल्में बनाई हैं. वह मेरी किताब पढ़ते हैं, उसके किसी हिस्से पर फिल्म बनाने के बारे में सोचते हैं, और उनके इस विचार पर मैं महज़ इतना सोचता हूं- वह चाहे, जैसी फिल्म बनाएं, लेकिन मुझे उनकी मदद करनी है. मैं कैसे मदद कर सकता हूं? ऐसा सोचते ही मेरे भीतर के लेखक का अहं दब जाता है और मैं उनकी फिल्म में शामिल हो जाता हूं, क्योंकि फिल्म अलग ही माध्यम है. वैसे, मैं फिल्मों का आदमी नहीं हूं, क्योंकि वह दुनिया मुझे कभी पसंद नहीं रही.
मेरे लिए लेखन एक तरह का प्रतिरोध है. किताब के ज़रिए मैं प्रतिरोध कर सकता हूं, लेकिन फिल्म के ज़रिए नहीं, क्योंकि फिल्म में आपकी बाध्यता होती है कि आपको कहानी का साथ नहीं छोड़ना है, जबकि किताब में मैं चाहे जब कहानी से दूर हटकर अपने विचार प्रस्तुत कर सकता हूं. फिल्मों में आपके पास इतनी गुंजाइश नहीं होती. आप कहानी से दूर नहीं जा सकते, आपको जो कहना है, कहानी के भीतर कहना है. किताब में आप कहानी के दो हिस्सों के बीच आसानी से अपनी बात कह सकते हैं, चिंतन कर सकते हैं.
अब मैं बेला तार के साथ नहीं हूं, क्योंकि हंगरी में फिल्म बनाना आसान नहीं रह गया. आर्थिक मदद पाना बेहद मुश्किल काम है.
मैं जब भी देश से बाहर रहता हं, मेरा समय बड़े शहरों में गुज़रता है. मैं काफ़ी समय बर्लिन में बिताता हूं क्योंकि वह शहर मुझे पसंद है. ऐसा इसलिए भी है कि हंगरी में मैं बिल्कुल संन्यासियों की तरह जीवन जीता हूं. सब लोगों से दूर रहता हूं. प्रकृति की गोद में. आसपास लोग नहीं होते. मेरे घर के सामने एक बड़ा सा पहाड़ है, बड़े चौड़े खेत हैं. बड़ा-सा वह पहाड़ इतना भी बड़ा नहीं है कि भव्य और दैवीय लगे, बल्कि मात्र इतना बड़ा है कि इंसानी पहाड़ जैसा लगे. उसका आकार हमारी इंसानियत जैसा है. बस, बड़े शहरों की जो बात मुझे सबसे ज़्यादा बुरी लगती है, वह यह कि वहां का कलाकार अपनी कला को बेचना चाहता है, उसके भीतर अपनी कला की रचना करने से ज़्यादा बेचने का भाव भरा होता है.
मुझे क्लासिक्स पसंद हैं. मैं हमेशा काफ़्का को पढ़ता हूं. जिस समय मैं काफ़्का को नहीं पढ़ रहा होता, मैं उनके बारे में सोच रहा होता हूं. जिस समय मैं उनके बारे में सोच नहीं रहा होता, मैं उनके बारे में सोचने को ‘मिस’ कर रहा होता हूं. थोड़ी देर तक ‘मिस’ करने के बाद मैं उनकी एक किताब उठाता हूं और पढ़ना शुरू कर देता हूं. काफ़्का के साथ मेरा इस तरह का रिश्ता है. उनके अलावा और भी कई लेखक हैं, जिन्हें मैं अक्सर पढ़ना पसंद करता हूं – होमर, दान्ते, दोस्तोएव्स्की, प्रूस्त, एज़रा पाउंड, बेकेट, थॉमस बर्नहार्ड, अत्तिया योज़ेफ़, सोडोर वेयोर्स और पिलिन्स्की.
आज मुझे अंतर्राष्ट्रीय सम्मान और स्वीकृति मिल रही है, इसका कारण सिर्फ़ मेरा लेखन नहीं है, बल्कि असली श्रेय तो उन अनुवादकों को है, जिन्होंने अंग्रेज़ी और दूसरी भाषाओं में मेरा साहित्य पहुंचाया है. मेरा ऐसा मानना है कि मैंने अपनी भाषा में अपनी किताब लिख दी. मेरा काम वहीं तक है. उसके बाद जब कोई उस किताब को दूसरी भाषा में अनुवाद करता है, तब वह मेरी किताब के आधार पर एक नई किताब की रचना करता है. वह किताब मेरी नहीं, उसकी होती है. उसकी भाषा, शब्द सब कुछ उसके होते हैं.
— अनुवाद और प्रस्तुति : गीत चतुर्वेदी
(यह आलेख तब प्रस्तुत किया गया था, जब 2015 में हंगरी के लेखक लास्लो क्रास्नाहोरकाई को 2015 में मैनबुकर अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। 2025 में उन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार।दिया गया है। उन्हें लंबे समय से समकालीन यूरोपीय साहित्य के सर्वश्रेष्ठ लेखकों में से एक माना जाता है. यह टुकड़ा उनसे हुए विभिन्न साक्षात्कारों के चुनिंदा अंशों से बनाया गया था। – गीत चतुर्वेदी)


