सुभाष सिंह सुमन-
बीती रात बड़ी गजब रही. पहाड़ और जंगल के रास्ते में गाड़ी खराब हो गई. रात के ग्यारह बज चुके थे और मौसम बारिश वाला. गाड़ी खराब भी हुई तो गजब ही. मध्य प्रदेश के सागर से चलती आई मस्त और घर से 30 किलोमीटर दूरी रही तो खराब हो गई. फिर रात ऐसी काली हुई कि महिंद्रा और टाटा से मेरा पर्सनल प्यार बढ़ गया.
नई ही गाड़ी है. ढाई साल हुए हैं अभी. महिंद्रा की XUV 300 W8(O). जब खरीदी गई, तब XUV 300 की टॉप मॉडल थी. महिंद्रा ने इंजन ऑन करने के लिए इसमें पुश बटन वाला फीचर दिया है. चाबी लगाकर घुमाने का झंझट नहीं. बटन दबाए और चल दिए. फीचर मस्त है, लेकिन महिंद्रा ने इसका कबाड़ कर दिया है. जिस चाबी से गाड़ी महीनों से चल रही है, अभी-अभी हजार किलोमीटर से ज्यादा चलकर आई है और अब सेंसर उस चाबी को डिटेक्ट ही न करे. घर से दूसरी चाबी लेकर गए. गाड़ी उससे भी स्टार्ट नहीं हो. सेम एरर आते रहा. बटन दबाएं तो एरर आए कि पहले चाबी रखिए.
गाड़ी रुकी थी एकदम ढलान पर. स्टीयरिंग और ब्रेक लॉक. दूसरी गाड़ी से टोचन करना भी संभव नहीं. महिंद्रा का रोड साइड असिस्टेंट इतना दुरुस्त कि फोन कनेक्ट होने में एक घंटे से ज्यादा लग गए. उधर से लिंक भेजा गया लोकेशन शेयर करने के लिए. इधर लोकेशन सबमिट हो जाए, उधर लोकेशन कैप्चर न हो. तब तक बोनट खोलकर सारे सेंसर साफ कर दिए. बीएमडब्ल्यू वाली कारों में ऐसी दिक्कत आने पर स्मार्ट की से स्टार्ट बटन प्रेश करते हैं तो काम हो जाता है. ये भी दोनों चाबियों से कई बार आजमाए. ऐसे ही रैंडम ट्राई करते हुए में डेढ़ बजे के करीब गाड़ी स्टार्ट हो गई. फाइनली घर पहुंच गए 2 बजे तक.
भैया बताए ये पहली बार नहीं है. यही दिक्कत पहले भी हो चुकी है. एक बार दिक्कत हुई तो महिंद्रा वालों ने चाबी बदलने को कहा. दोनों पुराने सेट की जगह नए सेट लिए गए. फिर एक बार दिक्कत हुई तो महिंद्रा के इंजीनियर सॉफ्टवेयर की गड़बड़ी बताए. सॉफ्टवेयर अपडेट कराया गया. दिक्कत अभी भी उसी तरह है.
इंटरनेट ब्राउज करने पर पता चला कि यह समस्या अकेले की नहीं है. टीम बीएचपी और कई फोरम पर एक्सयूवी 300 वालों को इस परेशानी से रोते देखे. सब मामले में दिलचस्प बात कॉमन मिली- बेचारे महिंद्रा वाले भी नहीं जानते ये दिक्कत किस कारण है. तुक्का लगाते हैं. ट्रायल एंड एरर मैथड का नंगा नाच चल रहा है महिंद्रा के यहां.

अब मैं सोच रहा हूं- इस 5 स्टार सेफ्टी का आदमी अचार बनाएगा, जब रिलाइबिलिटी जीरो है. इससे तो बढ़िया बेचारी बलेनो है. सितारे कम हैं, पर बीच रास्ते में ऐसे धोखा नहीं देती है. फिर लगा कि कुछ ट्रैक्टर और टैंपो बनाने वालों को सिर्फ ट्रैक्टर-टैंपो बनाने पर ही ध्यान देना चाहिए. लैंबोर्गिनी ने गलत उदाहरण सेट कर दिया. उसकी स्पोर्ट्स कार की कीमत टाटा और महिंद्रा की कार खरीदने वाले चुका रहे हैं. क्या जरूरत थी इस तरह इंस्पायर करने की! या फिर इंस्पिरेशन और मोटिवेशन जैसी चीजों को अयोग्य लोगों से बारने की कोई व्यवस्था होनी चाहिए.


