मोदी के पीएम पद पर बने रहते हुए सबूत कैसे जुटाए जाएंगे माई लॉर्ड!

Sanjaya Kumar Singh : मामला पर्याप्त सबूत होने या न होने का नहीं है… मामला देश की सर्वोच्च अदालत में है और बड़े-बड़े लोग जुड़े हैं। मेरी कोई औकात नहीं कि इस मामले में टिप्पणी करूं पर जैन हवाला मामले को अच्छी तरह फॉलो करने के अपने अनुभव से कह सकता हूं कि सुप्रीम कोर्ट की चिन्ता जायज है। लेकिन यहां मामला पर्याप्त सबूत होने या न होने का नहीं है। मामला ठीक से जांच कराए जाने का है।

जैन हवाला मामले में 115 अभियुक्त थे और सभी मामलों की जांच, तथा उन्हें साबित करना अपेक्षाकृत मुश्किल था। पर यहां मामला सीधा है। आज टेलीग्राफ की इस खबर से भी लगता है गुजरात सीएम अगर गुजरात अलकली केमिकल है तो उसे भुगतान क्यों हुआ, हुआ कि नहीं इसकी जांच हो जाए और यह रिश्वत है (किसी और कारण से, किसी और को) तो उस मामले में कार्रवाई हो और इसे खत्म माना जाए। पर मामला है तो उसे अंजाम तक पहुंचाना ही चाहिए।

राजदीप सरदेसाई के साथ अरविन्द केजरीवाल की बातचीत से जो मामला समझ में आता है वह यह है कि बुनियादी तौर पर एक मामला है, शक है। सुप्रीम कोर्ट के लिए यह पर्याप्त नहीं है इस पर कोई विवाद नहीं है। पर मामला यह है कि इसकी जांच होनी चाहिए। पर्याप्त सबूत जुटाए जा सकते हैं कि नहीं? जुटाने की कोशिश हुई कि नहीं? कौन करेगा? क्यों और कैसे करेगा? अरविन्द केजरीवाल ने कहा कि इसकी जांच नहीं कराई जा रही है, नहीं होने दी जा रही है। संबंधित अधिकारियों का तबादला कर दिया गया आदि। इस लिहाज से सुप्रीम कोर्ट में अपील यह होनी चाहिए थी (मुझे लग रहा है अभी ऐसा नहीं है, मैं गलत हो सकता हूं) कि इस मामले की निष्पक्ष जांच कैसे सुनिश्चित हो? यह नहीं कि उपलब्ध सबूतों पर ही कार्रवाई हो। सबूत कार्रवाई के लिए पर्याप्त न हों, यह संभव है। पर जांच के लिए तो पर्याप्त हैं ही।

इस खबर में कहा गया है कि गुजरात सीएम का मतलब गुजरात अलकली केमिकल्स है – गुजरात के मुख्यमंत्री नहीं। ठीक है। हो सकता है। पर इस बात की जांच हो जाए पुष्टि हो जाए कि गुजरात सीएम गुजरात अलकली केमिकल्स ही है। अगर किसी ने किसी कंपनी को इतनी राशि दी है तो उसका कारण होगा, संबंध होगा, सबूत भी होंगे। आदि। साबित होना कोई मुश्किल नहीं है।

और, जब ईमानदारी की बात हो रही है और वह देश के सभी लोगों पर समान रूप से लागू होना है तो गुजरात अलकली केमिकल्स को यह भुगतान किसलिए हुआ, नकद हुआ कि चेक से और नकद हुआ तो क्यों? संतोषजनक जवाब मिल जाए। बात खत्म। नैतिकिता का तकाजा है और चूंकि मामला प्रधानमंत्री से संबंधित है, और प्रधानमंत्री न भी चाहें तो जांच करने वाले को एक भय रहेगा इसलिए यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि काम (जांच) करने वालों को यह भय न रहे। कैसे न रहे – यह सुनिश्चित करना संबंधित विभागों, लोगों और संस्थाओं का काम है।

इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट की यह चिन्ता भी जायज है कि चूंकि मामला प्रधानमंत्री के खिलाफ है इसलिए इसे जल्दी निपटाया जाना चाहिए और सबूत जल्दी चाहिए। अगर सुप्रीम कोर्ट में अपील करने वालों को अपने सबूतों पर यकीन है और लगता है कि सब साबित हो सकता है पर प्रधानमंत्री के इस पद पर बने रहते हुए सबूत कैसे जुटाए जाएंगे या सबूत जुटाने में क्या समस्या आ रही है – सुप्रीम कोर्ट को यह बताया जाता तो मेरे ख्याल से बेहतर रहता।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : https://www.facebook.com/sanjaya.kumarsingh

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