आज तक के संपादक रोहित को इतना जहर बोने क्यों दे रहे हैं?

Sanjaya Kumar Singh : एक मशहूर टेलीविजन एंकर के बारे में Dilip Mandal की यह पोस्ट पढ़ने लायक है।

“जिस संपादक ने रोहित सरदाना को टीवी में पहली नौकरी दी थी, उन”के दर्द को कौन समझ सकता है. उन्हें क्या मालूम था कि रोहित में इतना जहर भरा है. रोहित तब बेहद मासूम बनकर उनके पास आया होगा. चूंकि मैं उस संपादक को जानता हूं, इसलिए उस दर्द को महसूस कर सकता हूं. अगर उन्हें पता होता कि रोहित की हरकतों से आगे चलकर समाज टूटेगा, तो रोहित को वह नौकरी कतई न मिलती. रोहित की हरकतों से लोगों के मन में नफरत भर रही है. इस दुष्कर्म का बोझ लेकर रोहित पता नहीं क्या बनना चाहता है. वह एक सम्मानित पत्रकार तो कभी नहीं बन पाएगा. हद से हद उसकी हैसियत उस बंदर की होगी, जिसके बनाए पुल पर चढ़कर सेना ने लंका की ओर प्रस्थान किया था. इतिहास तो राजा का होता है, बंदरों का इतिहास नहीं होता. रोहितों का इतिहास में कोई जिक्र नहीं होता. रोहित पत्रकारिता का तोगड़िया बनेगा और आखिर में रोएगा. लेकिन यह होने तक समाज को इसकी कीमत चुकानी होगी. इतनी कड़वाहट क्यों बो रहे हो रोहित? हो सकता है कि निजी जीवन में तुम या तुम्हारे परिवार का कोई दर्द हो. कोई शिकायत हो. लेकिन मासूमों के घर जलाकर उसकी कीमत वसूलोगे क्या? आज तक के संपादक रोहित को इतना जहर बोने क्यों दे रहे हैं? उन्हें ही क्या हासिल हो जाएगा? गाड़ी की लंबाई चार इंच बढ़ भी गई तो क्या? कौन देखता है, कौन जानता है, कौन पूछता है? टीआरपी की वासना में लोगों की जान चली जाएगी. अब तो रुक जाओ. पत्रकारिता नहीं तो इंसानियत की खातिर ही सही.”

दिलीप मंडल की इस पोस्ट के बाद हिन्दी टेलीविजन पत्रकारिता में नियुक्तियों पर यह लेख पढ़िए। इसे मैंने अपनी पुस्तक, ”पत्रकारिता : जो मैंने देखा, जाना, समझा”  www.goo.gl/xBHcEx में भी साभार उद्धृत किया है। इस आलेख की सिफारिश इसलिए कर रहा हूं कि इसके बारे में एक पाठक ने लिखा है, “जितेंद्र जी, आपने जो बयां किया उसे पोस्टर बनाकर दीवारों पर चिपकाना चाहिए”। लिंक यह रहा…

http://old1.bhadas4media.com/article-comment/12842-2013-07-07-08-49-31.html

आलेख जिसकी सिफारिश कर रहा हूं

http://old1.bhadas4media.com/print/12808-2013-07-05-13-58-10.html

हिन्दी पत्रकारिता के पतन को समझना हो तो काम आएगा। खासकर उदारीकरण के बाद के भारत में पत्रकारिता के क्षेत्र में आए लोगों के लिए।

पुनःश्च

आपकी मान्यता (जो भी है, जैसी भी है) का विस्तार होगा अगर आप उस टिप्पणी को पढ़ेंगे। मैंने दिलीप की पोस्ट को बतौर संदर्भ लिया है। लिखा भी है कि इसके बाद इस टिप्पणी को पढ़िए। – किसी ने पढ़कर कमेंट लिखा हो ऐसा नहीं लगता है। सबकी दिलीप (और रोहित के बारे में) एक तय राय है जिसपर बात करने, सुनने के लिए कोई तैयार नहीं है। चूंकि जो राय बनी है वह ऐसे ही, सुनी-सुनाई बातों पर, ऊपरी जानकारी के आधार पर है इसलिए कोई और जानना नहीं चाहता – शायद पढ़ने लिखने का रिवाज ही नहीं रह गया है। या हर कोई समझता है कि ज्यादा जानने की जरूरत नहीं है। जितेन्द्र जी को पढ़िए तो सही। यह पोस्ट दिलीप की पोस्ट पढ़वाने के लिए नहीं है। हिन्दी (टेलीविजन) पत्रकारिता पर आपकी जानकारी बढ़ाने के लिए है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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अंग्रेजी अखबार भी खबर की जगह लोरी छापते हैं!

Sanjaya Kumar Singh : कानपुर में पकड़े गए 92 करोड़ रुपए के पुराने नोट वाली खबर का फॉलो अप आज हिन्दुस्तान टाइम्स में भी छपा है। मैं अंग्रेजी अखबारों को हिन्दी वालों के मुकाबले थोड़ा गंभीर मानता हूं और दिल्ली में टाइम्स ऑफ इंडिया के मुकाबले हिन्दुस्तान टाइम्स को। पर ये भी सरकार के भोंपू का ही काम करते हैं।

मूल खबर थी कि कोई व्यक्ति पुराने नोट को बदलवाने का दावा कर रहा था और उसके इस आश्वासन पर देश के भिन्न शहरों से कई लोग आए थे और मूल खबर पर यकीन किया जाए तो यह पैसा किसी एक व्यक्ति का नहीं, कई लोगों का है। इसीलिए 16 लोग गिरफ्तार किए गए हैं। मूल खबर में यह नहीं बताया गया था कि पुराने नोट इस समय तक कैसे बदले जा सकते थे – जबकि रिपोर्टिंग के लिहाज से और मेरे जैसे पाठक के लिए भी यही सवाल सबसे महत्वपूर्ण है।

अभी तक उसकी कोई चर्चा नहीं है जबकि इतना पैसा अगर कई लोगों से इकट्ठा किया गया था तो कोई भरोसेमंद कहानी जरूर बनाई गई होगी और यह कोई बहुत गोपनीय नहीं रहा होगा। वैसे भी कहा जाता है कि जिस बात को तीन लोग जान जाएं वह गोपनीय नहीं रह सकता है। यहां तो 16 लोग जानते ही थे। फिर भी उसपर कोई रोशनी नहीं है।

मूल खबर के फॉलो अप में आज हिन्दुस्तान टाइम्स में छपा है कि इस राशि पर इतना टैक्स बनेगा और चूंकि एक व्यक्ति के घर से पकड़ा गया है इसलिए वही जिम्मेदार होगा, दूसरों से पूछताछ की जाएगी और अगर बाकी लोगों ने अपना स्वीकार नहीं किया तो जिसके घर से बरामद हुआ है उसी का माना जाएगा।

देखना है कि जांच एजेंसियां पुराने नोट रखने से संबंधित नया कानून लागू करती हैं कि नहीं आदि। खास बात यह है कि आज की खबर का शीर्षक यही बनाया गया है कि पकड़े गए दलाल को 483 करोड़ रुपया जुर्माना देना हो सकता है – उसके पास इतने पैसे हैं कि नहीं और नहीं हैं तो सरकार क्या करेगी आदि ज्यादा दिलचस्प और चिन्ताजनक मामलों पर खबर लगभग मौन है।

खबर में बहुत सारी बातें हैं पर यह नहीं है कि नोट बदले कैसे जाते या लोग बदले जाने के झांसे में कैसे आ गए। मजे की बात यह है कि खबर मूल मुद्दे पर तो शांत है अधिकारियों के (यानी ईमानदार सरकार) के दावे को प्रमुखता से छाप रहा है। जैसे कि नए कानून से जिसके यहां पुराने नोट बरामद हुए उसे पांच गुना जुर्माना देना होगा। ये अखबार वाले भी सरकार की तरफ से लोरी गाने और जनता को मीठी नीन्द सुलाने का ही काम कर रहे हैं।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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क्या अमित शाह का इस्तीफा नहीं होना चाहिए?

Sanjay Kumar Singh : सीबीआई जज बीएच लोया की मौत के मामले की स्वतंत्र जांच कराने की याचिका पर जब सुनवाई हो रही है तो क्या भारतीय जनता पार्टी का यह नैतिक दायित्व नहीं है कि वह अपने अध्यक्ष अमित शाह से इस्तीफा मांग ले। जैसा कि कहा जाता है न्याय होना ही नहीं चाहिए, होता हुआ दिखना भी चाहिए। इसी तरह जनता की सेवा का दावा करने वाली पार्टी को क्या न्यूनतम आदर्शों का पालन नहीं करना चाहिए उसपर अमल करते हुए नजर भी आना चाहिए।

मंत्री होना और सरकारी नौकरी में रहना एक बात है और सत्तारूढ़ राजनीतिक दल का अध्यक्ष होना बिल्कुल अलग बात है। पूर्व भाजपा अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण खुफिया कैमरे में एक फर्जी हथियार डीलर से पैसे लेते पकड़े गए थे तो उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था। अबके अध्यक्ष पर हत्या कराने के आरोप हैं, गवाहों को डराने-धमकाने के परिस्थिति जन्य साक्ष्य हैं और सुप्रीम कोर्ट के पांच वरिष्ठतम जजों में से चार ने तकरीबन इसी मामले में ऐसी कार्रवाई की जो देश में अभी तक अनूठा और अकेला है।

दूसरी ओर अमित शाह से संबंधित मामले में राहत देने वाले जज को रिटायरमेंट के बाद राज्यपाल बनाने से लेकर जज लोया से पहले के आदेश और बाद की स्थितियां तथा इतना बड़ा बवाल होने के बाद जज लोया के बेटे का प्रेस कांफ्रेंस कर कहना कि उसे हत्या के मामले में कोई शक नहीं है अमित शाह की ताकत भी बताता है। यही नहीं, जज लोया के बेटे ने पहले भी बांबे हाईकोर्ट में यह बात कही थी फिर प्रेस कांफ्रेंस की जरूरत और उसका समय बहुत कुछ कहता है।

इस मामले में कारवां की खबर जज लोया की बहन और पिता के बयान पर आधारित है। उनकी सुरक्षा का भी सवाल है। इन सारी परिस्थितियों में अगर अमित शाह का कानूनन इस्तीफा देना जरूरी न हो तो क्या नैतिकता का तकाजा नहीं है कि वे स्वयं इस्तीफा दें। और अगर नहीं देते हैं तो क्या पार्टी को पार्टी के आम कार्यकर्ता को यह मांग नहीं करना चाहिए कि निष्पक्ष और बाहरी प्रभाव तथा गवाहों की सुरक्षा के लिए उनका सत्तारूढ़ दल के अध्यक्ष पद से अलग होना जरूरी है।

अमित शाह का अध्यक्ष बने रहना इस समय उनके लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। पार्टी के लिए नहीं है। दूसरी तरफ अगर पार्टी कानून और देश की न्याय व्यवस्था पर विश्वास करती है तो उसे चाहिए कि वह अपने अध्यक्ष को अपने ऊपर लगे आरोपों से मुक्त होने के लिए कहे।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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नौकरी दिलाने वाले एक नामी पोर्टल ने प्रोफाइल बनाने के लिए इस वरिष्ठ पत्रकार से 5,000 रुपए लिए..

Sanjaya Kumar Singh : चपरासी की नौकरी और विधायक के बेटे की सफलता…  70 साल कुछ नहीं हुआ बनाम चार साल खूब काम हुआ… 2002 में जनसत्ता की नौकरी छोड़ने के बाद मुझ नौकरी ढूंढ़ने या करने की जरूरत ही नहीं महसूस हुई। 2011 में साथी Yashwant Singh ने bhadas4media के लिए बीता साल कैसे गुजरा पर लिखने की अपील की थी। तब मैंने लिखा था, “मेरे लिए बीता साल इस लिहाज से महत्त्वपूर्ण है कि इस साल एक ज्ञान हुआ और मुझे सबसे ज्यादा खुशी इसी से हुई। अभी तक मैं मानता था कि जितना खर्च हो उतना कमाया जा सकता है। 1987 में नौकरी शुरू करने के बाद से इसी फार्मूले पर चल रहा था। खर्च पहले करता था कमाने की बाद में सोचता था। संयोग से गाड़ी ठीक-ठाक चलती रही। …. पर गुजरे साल लगा कि खर्च बढ़ गया है या पैसे कम आ रहे हैं। हो सकता है ऐसा दुनिया भर में चली मंदी के खत्म होते-होते भी हुआ हो।

हालांकि, मई 2002 में जनसत्ता की नौकरी छोड़ते समय मैंने यह नहीं सोचा था कि नौकरी नहीं करूंगा या बगैर नौकरी के काम चल जाएगा। पर सात साल कोई दिक्कत नहीं आई। आठवें साल आई तो और भी काफी कुछ सीखने-जानने को मिला पर वह ज्यादा महत्त्वपूर्ण नहीं है। …. अनुवाद के अपने धंधे से खर्च नहीं चला तो नौकरी के बाजार को टटोलना शुरू किया और पाया कि बहुत खराब स्थिति में भी मैं बगैर नौकरी के घर बैठे जितना कमा ले रहा था उतने की नौकरी आसानी से उपलब्ध नहीं थी (मन लायक तो बिल्कुल नहीं) और जिन साथियों से बात हुई उनसे पता चला कि मैं जो अपेक्षा कर रहा हूं वह ज्यादा है और मुझ जैसी योग्यता वाले के लिए उतने पैसे मिलना संभव नहीं है।”

अब आता हूं 2017 पर और यह पोस्ट लिखने की प्रेरणा पर। इससे पहले आप पढ़ चुके हैं कि चपरासी की नौकरी के लिए कितने और कैसे लोगों के आवेदन आए और आखिरकार वह नौकरी एक विधायक के शाहजादे को मिली। अब इसमें यह महत्वपूर्ण नहीं है कि नौकरी विधायक की सिफारिश से मिली या विधायक का बेटा ही सर्वश्रेष्ठ था। दोनों ही स्थिति अच्छी नहीं है। एक स्थिति पिछले 70 साल के कारण है और दूसरी पिछले लगभग चार साल के कारण। असल में हमारी सरकारें ऐसी ही रही हैं। आप कह सकते हैं कि हम भी ऐसे ही हैं। पर फिलहाल वह मुद्दा नहीं है।

मैं बता चुका हूं कि 2014 में देश में आई ईमानदार सरकार ने एक जुलाई 2017 से जीएसटी लागू किया जो छोटा-मोटा धंधा करने वालों को मार डालने का पुख्ता इंतजाम है। मैंने अपना काम छोड़कर यही बताने की कोशिश की कि मेरे जैसा सामान्य पढ़ा-लिखा, वर्षों से कंप्यूटर पर काम कर रहा व्यक्ति जो ठीक-ठाक कमा भी लेता है, जीएसटी की शर्तें पूरी नहीं कर सकता है तो आम आदमी कैसे करेंगे। सरकारी नियमों के कारण बैंक ने मेरा चालू खाता ब्लॉक कर दिया है क्योंकि 21 साल से चल रही मेरी फर्म की ऐसी कोई पहचान नहीं है जो बैंक की केवाईसी जरूरतें पूरी करे और नया मैं बनवाऊंगा नहीं। जाहिर है उसका असर काम-धंधे और कमाई पर भी पड़ा है। और यह सिर्फ मेरे साथ नहीं हुआ होगा।

2011 के आस-पास जब मैंने नौकरी का बाजार टटोलना शुरू किया था कि नौकरी दिलाने वाले एक नामी पोर्टल ने उस समय 5,000 रुपए में मेरा प्रोफाइल बनाने की पेशकश की थी। प्रोफाइल क्या बनाना था, जो डिग्री और अनुभव होगा वही ना? उसमें बेल-बूटे और फूल-पत्ती आदि तो लगने नहीं थे। पर मैंने ठगी सीखने के लिए बेवकूफ बनना स्वीकार किया और 5000 रुपए खर्च करके प्रोफाइल बनवाया। उस समय मैंने यही सोचा था कि एक इंटरव्यू कॉल भी आ गया (हिन्दी में काम करने के लिए किसी अहिन्दी क्षेत्र यथा कोलकाता, बंगलौर, चेन्नई या हैदराबाद) तो विमान किराए में अपना 5000 रुपया निकल जाएगा। मैं इससे ज्यादा की उम्मीद नहीं कर रहा था। पर आज सात साल में उस प्रोफाइल पर एक इंटरव्यू कॉल भी नहीं आया। आप कह सकते हैं मैंने आवेदन ही नहीं किया होगा। यह आंशिक रूप से सही है पर मुझे नौकरी दे सकने वाले को मेरी सिफारिश करने का काम भी उस 5000 में शामिल था। वैसे भी ये कंपनी तो सही उम्मीदवार ढूंढ़कर कंपनी से कमीशन लेगी ही। तो मैंने भले कोशिश नहीं की, उस कंपनी ने तो की ही होगी। खैर।

उसी कंपनी का एक मेल आज आया। जी हां, सात साल में एक इटरव्यू नहीं करा पाने के बावजूद कंपनी मुझे छोड़ नहीं रही है (उसे लगता होगा मैं 5000 रुपए दे सकने वाला बेवकूफ हूं) और मेल आते रहते हैं। पेशकशें भी। एक बड़े हिन्दी दैनिक के स्थानीय संपादक के लिए भी फोन आया था। मैंने न्यूनतम अपेक्षा बताई और बात खत्म हो गई। फिर भी संपर्क (एकतरफा) बना हुआ है। कंपनी अब (काफी समय से) कह रही है कि मैं कोई कोर्स कर लूं (इस समय, साढ़े 53 साल की उम्र में) तो मुझे नौकरी मिलने की संभावना बढ़ जाएगी। हंसी आती है मैं मेल पढ़ता भी नहीं हूं। क्योंकि जमशेदपुर के एक्सएलआरआई में नौकरी करने वालों की तरक्की के लिए पार्ट टाइम कोर्स हुआ करता था (जो मैं कर सकता था) नहीं करने का अफसोस है और उसकी भरपाई के लिए 2010-11 के दौरान ही एक कोर्स के बारे में पता किया तो कुल खर्च था 17 लाख रुपए। जी हां, 17 लाख रुपए। मैंने तय किया कि बेटे पर इतने पैसे खर्च किए जाएं तो लाभ जल्दी और पक्का होगा। और हुआ। हो रहा है।

सच यही है कि दूरदृष्टि ना हो परिवार छोड़कर शिखर पर पहुंच जाइए या फिर बेटे को चपरासी बनवाइए – अपने लिए तो सब ठीक है पर देश के लिए तो कोई कोर्स कर लीजिए। कब तक हार्ड वर्क का तबला बजवाकर लोगों को ठंड से बचाइएगा।

संजय कुमार सिंह जनसत्ता अखबार में कार्य करने के बाद से अनुवाद की अपनी कंपनी का संचालन कर रहे हैं. उनसे संपर्क https://www.facebook.com/sanjaya.kumarsingh के जरिए किया जा सकता है.

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जीएसटी के खिलाफ लगातार लिखने वाले पत्रकार संजय कुमार सिंह की फर्म का चालू खाता बैंक ने ब्लॉक किया

जीएसटी की प्रयोगशाला की अपनी अंतिम किस्त लिख चुका हैं. यह 100 वीं किस्त है. इसी दरम्यान पता चला कि एचडीएफसी बैंक ने केवाईसी के चक्कर में (मतलब, जीएसटी जैसा कोई पंजीकरण हो) मेरी फर्म का चालू खाता ब्लॉक कर दिया है जबकि नियमतः मुझे किसी पंजीकरण की आवश्यकता नहीं है। लेकिन अब आयकर रिटर्न व टीडीएस चालू खाता चलाने के लिए पर्याप्त नहीं है। फिर भी हमें डिजिटल लेन-देन करना है। अभी उससे निपटना है।

जीएसटी पर लिखना मैंने 50 किस्त के बाद ही बंद करना सोचा था पर इतना मसाला था कि 100 किस्तें हो गईं। कुछ और व्यस्तताओं के कारण मैंने जीएसटी की प्रयोगशाला बंद कर दी पर जीएसटी की ही सख्ती में मेरा अकाउंट ब्लॉक हो गया है। मैंने पहले भी कई बार लिखा है कि जीएसटी में छूट का अपेक्षित लाभ नहीं मिलेगा उल्टे इसका दुरुपयोग हो सकता है और छूट देने के अधिकारों का चुनावी लाभ के लिए दुरुपयोग किया जा रहा है। असल में अंतिम लाभार्थी तक कोई लाभ नहीं पहुंच रहा है।

जीएसटी से मेरी शिकायत यही है कि पहले 10 और अब 20 लाख रुपए प्रतिवर्ष तक के कारोबार को जब जीएसटी से मुक्त रखा गया है तो कंप्यूटर पर काम करने के कारण या राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) दिल्ली के गाजियाबाद में रह कर दिल्ली और गुड़गांव के काम कंप्यूटर से करके ई-मेल से भेजने के कारण मुझपर जीएसटी की बाध्यता क्यों हो। यह तकनीक का उपयोग नहीं करने देना है। तकनीकी रूप से इसका कोई मतलब नहीं है। व्यावहारिक तौर पर यह संभव ही नहीं है और पहले भी ऐसी कई कोशिशें नाकाम होती रही हैं पर अभी उस विस्तार में नहीं जाउंगा। फिलहाल राहत की बात यही है कि सरकार ने इन पर छूट दे दी है और अब मेरे जैसे मामलों में जीएसटी पंजीकरण की कोई तकनीकी बाध्यता नहीं है। लेकिन बैंक वालों को यह कौन समझाएगा? लकीर के फकीरों ने मेरा (असल में मेरी पत्नी की फर्म का) खाता ब्लॉक कर दिया है।

कारण यह है कि हमलोग घर से काम करते हैं और घर हमारा अपना है। अगर किराए का होता तो हम मकान मालिक से किराए का करार अपनी फर्म के नाम से करते और बैंक उस करार के आधार पर मान लेता कि मैं अपने किराए के घर से ही अपना कारोबार करता हूं। पर चूंकि घर मेरा अपना है इसलिए ऐसा कोई करार नहीं कर सकता और जरूरत नहीं है तो किराए पर ऑफिस के लिए जगह क्यों लूं? इसी तरह, अगर मैं घर से दुकान चला रहा होता (जो गलत है पर देश भर में खुलेआम चल ही रहे हैं) तो नगर निगम से दुकान और प्रतिष्ठान प्रमाणपत्र या व्यापार लाइसेंस ले लेता – अभी भी ले सकता हूं पर नहीं है इसलिए खाता ब्लॉक है क्योंकि उस पर पैसे (रिश्वत कहिए) खर्च नहीं किए हैं।

बैंक ने ऐसे तमाम दस्तावेजों की सूची दी है जो तीन समूहों में है और मौखिक रूप से कहा गया है कि हरेक समूह का एक दस्तावेज चाहिए। समस्या हमारी इकाई की पहचान और पते को लेकर है क्योंकि हमारे मामले में ऐसे किसी दस्तावेज (दरअसल पंजीकरण) की आवश्यकता नहीं है और हम पर दबाव डाला जा रहा है कि हम कोई पंजीकरण कराएं और उसके नियमों में बंधें। लालफीताशाही के नियंत्रण में आएं। ऊपर मैंने कुछ उदाहरण दिए हैं और जो बाकी विकल्प हैं उनकी चर्चा करें तो आप पाएंगे कि देश में (दरअसल बैंक में) छोटा-मोटा प्रोपराइटरशिप कंसर्न चलाने से आसान है एचयूएफ चलाना। एचयूएफ यानी हिन्दू अविभाजित परिवार। कुछ लोग कहते हैं कि यह सुविधा हिन्दुओं के तुष्टिकरण के लिए है। यहां मैं उस विस्तार में नहीं जाउंगा पर इसकी तुलना प्रोपराइटरशिप कंसर्न से करके बताउंगा कि बाप-दादा के धन पर ऐश करना तो वैसे ही आसान है एचयूएफ की सुविधाएं उसे भोगने की पूरी व्यवस्था करता है और बैंकों ने प्रोपराइटरशिप कंसर्न को उसी के मुकाबले रखकर काम करके पैसा कमाना मुश्किल बना दिया है या बना रहे हैं।

एंटाइटी यानी इकाई के सबूत के रूप में सोल प्रोपराइटरशिप कंसर्न या एचयूएफ से एक ही दस्तावेज मांगे जाते हैं जैसे बिजली, पानी, लैंडलाइन फोन का बिल जो इकाई के नाम पर हो। एचयूएफ के मामले में यह कर्ता यानी परिवार के मुखिया के नाम पर ही होगा और यही पर्याप्त है पर प्रोपराइटरशिप कंसर्न के मामले में यह कंसर्न के नाम से चाहिए। कंसर्न के मुखिया के नाम से नहीं चलेगा। इसी तरह जो भी दस्तावेज बताए गए हैं वे मेरे मामले में आवश्यक नहीं हैं इसलिए नहीं हैं और खाता ब्लॉक है (हालांकि उसमें बहुत पैसा नहीं है)। खास बात यह है कि बैंक इस बात की जांच खुद नहीं करेगा और उसकी चिट्ठियां इस पते पर डिलीवर हो रही हैं पर वह पर्याप्त नहीं है। बैंक वाले आकर भी जांच नहीं करेंगे और ना यह कहने या लिखकर देने से मानेगें कि हम जहां रहेते हैं वहीं से अपना काम भी कर लेते हैं। इसलिए जय जय।

लेखक संजय कुमार सिंह ने जनसत्ता अखबार की नौकरी के बाद 1995 में अनुवाद कम्युनिकेशन AnuvaadCommunication.com की स्थापना की. बहुराष्ट्रीय निगमों और देसी कॉरपोरेट्स के साथ देश भर की तमाम जनसंपर्क व विज्ञापन एजेंसियों के लिए काम करते हुए संजय काफी समय से सोशल मीडिया पर ज्वलंत मुद्दों को लेकर बेबाक लेखन भी करते हैं. संजय से संपर्क sanjaya_singh@hotmail.com के जरिए किया जा सकता है.

पूरे प्रकरण को जानने-समझने के लिए इन्हें भी पढ़ें…

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लेखक, पत्रकार, चित्रकार, फ्रीलांसर… सब जीएसटी के दायरे में!

संजय कुमार सिंह, वरिष्ठ पत्रकार

वैसे तो मीडिया संस्थान, अस्पताल और शिक्षा संस्थान अपने मूल कार्यों के लिए जीएसटी से मुक्त हैं पर ज्यादातर मामलों में अन्य संबंधित सेवाएं देने या प्राप्त करने के लिए जीएसटी पंजीकरण आवश्यक है। बहुत सारे लेखक पत्रकार अभी तक यह माने बैठे हैं कि जीएसटी उनके लिए नहीं है। पर है और बहुत स्पष्ट रूप से है। असल में आरएनआई से पंजीकृत मीडिया संस्थान जीएसटी में नहीं हैं और अखबार या पत्रिकाओं (उत्पाद) पर जीएसटी नहीं है इसलिए जीएसटी की आंच फ्रीलांसर्स तक पहुंचने में अभी समय लगेगा। मेरे ज्यादातर ग्राहक कॉरपोरेट और पीआर एजेंसी हैं इसलिए मुझे सबसे पहले काम मिलना बंद हो गया। जुलाई में जो काम हुआ उसका पर्चेज ऑर्डर अब आना शुरू हुआ है। और काम नहीं आ रहा है सो अलग। संक्षेप में यही समझिए कि गाड़ी पूरी तरह पटरी से उतर चुकी है।

अखबारों और मीडिया संस्थाओं के लिए काम करना जीएसटी मुक्त नहीं है। सिर्फ खबर भेजना अपवाद है और इसके लिए जीएसटी पंजीकरण जरूरी नहीं है। आप सोच सकते हैं कि कुछ ना कुछ रास्ता निकल जाएगा नहीं तो मीडिया संस्थान नकद तो दे ही सकता है। पर ऐसा कुछ भी संभव नहीं है। एक तो अब नकद देना-लेना मुश्किल होता जा रहा है या कहिए बैंक के जरिए पैसे लेना-देना अपेक्षाकृत आसान है। दूसरे, कोई भी संस्थान या व्यक्ति आयकर के लिए अपने खर्चों का हिसाब रखता है। इसलिए नकद देकर भी काम कराएगा तो खर्चा दिखाना ही पड़ेगा और वह जीएसटी के नियमों का उल्लंघन होगा। इसे ऐसे समझिए कि कोई भी संस्थान या व्यक्ति अपना खर्च ना दिखाए तो आयकर में फंसे और दिखाए तो जीएसटी में फंसे। सबको चोर मानने वाली सरकार ने कोई रास्ता नहीं छोड़ा है। इसे आप सरकार की प्रशंसा मान सकते हैं।

वैसे भी, ज्यादातर लेखक, पत्रकार, फ्रीलांसर किसी एक अखबार में तो लिखते नहीं हैं और ना ही एक राज्य की पत्रिकाओं में। और नियम है कि दूसरे राज्य के अपंजीकृत सेवा प्रदाताओं से सेवा न ली जाए। इसलिए, नियमों में छूट को एक अप्रैल से आगे बढ़ाया नहीं गया तो देर-सबेर जीएसटी पंजीकरण जरूरी हो जाएगा। ऐसी हालत में मीडिया संस्थानों की मजबूरी है कि वे फ्रीलांसर्स से जीएसटी पंजीकरण कराने के लिए कहें और पंजीकरण न होने पर देर सबेर आपको छापना बंद कर दें। क्योंकि रिकार्ड में कोई कब तक गलती या गैर कानूनी काम करता रहेगा। जहां तक जीएसटी पंजीकरण के झंझट और खर्चों का सवाल है फ्रीलांसिंग की कमाई से उसका खर्चा उठाना संभव नहीं है। दूसरी ओऱ, मीडिया वाले क्यों लेख और विचार छाप कर झंझट में पड़ेंगे। वे भी सिर्फ खबरें छापने लगेंगे।

इससे राहत तभी मिलेगी जब नियम बदले जाएं। याद रखें, छह अक्तूबर को घोषित छूट अस्थायी हैं। अगर आप एनसीआर से कोई छोटी बड़ी पत्रिका निकालते हैं और गाजियाबाद, दिल्ली और गुड़गांव के फ्रीलांसर, चित्रकार, कलाकार, प्रूफ रीडर की सेवाएं लेते हैं तो नियमतः सबका जीएसटी पंजीकृत होना जरूरी है। इस संबंध में Pankaj Chaturvedi जी ने फेस बुक पर लिखा है, “जीएसटी में बदलाव नहीं हुए तो प्रकाशन उद्योग से जुड़े लोग भूखे मरेंगे। विडंबना है कि कोई भी प्रक्षक संघ इस पर आवाज़ नहीं उठा रहा हैं। जीएसटी में मुद्रित पुस्तक को तो मुक्त रखा गया है लेकिन कागज़ तो ठीक ही है, प्रूफ रीडिंग, सम्पादन, चित्रांकन जैसे कार्यों के भुगतान पर जीएसटी अनिवार्य कर दिया गया है। पिछले दिनों 16 साल से मेरे साथ काम कर रहे एक प्रूफ रीडर मेरे पास आये, उनसे मैंने भुगतान के लिए जीएसटी में पंजीयन के लिए कहा, उन्होंने कहा- यह काम मेरा मुफ्त में मान लेना, मैं इस झंझट में नहीं पड़ सकता।

“असल में नियम है कि दो-पांच हज़ार का कार्य करने वाले ऐसे लोग भी अपने बिल में अठारह प्रतिशत जीएसटी क्लेम करें, फिर वे इस राशि को खुद जमा करवाएं, फिर उसका रिटर्न फाइल करते रहें। जाहिर है कि चित्रकार या प्रूफ का कार्य करने वाले के पास ना तो इतना समय है, न कमाई और ना ही अनिवार्य जीएसटी का तकनीकी ज्ञान। नतीजतन इस तरह के काम करने वाले कुछ और करने लगेंगे और येन केन प्रकारेन पुस्तकों को तैयार करने में बड़ा नुकसान होगा। हिंदी के प्रकाशक वैसे ही आर्थिक दवाब में हैं। पुस्तक मेले आदि में सहभागिता के लिए भी जीएसटी लगने से स्टाल का किराया बढ़ गया हैं। मेरी जानकारी में कई ऐसे प्रकाशन गृह है जो बंद होने जा रहे हैं। उनमें कुछ हिंदी-अंग्रेजी की पाठ्य पुस्तकें छापने वाले भी हैं। ऐसे में प्रूफ, चित्र, अनुवाद जैसे अस्थायी कार्य करने वालों का विमुख होना खतरे की घंटी है।”

लेखक संजय कुमार सिंह ने जनसत्ता अखबार की नौकरी के बाद 1995 में अनुवाद कम्युनिकेशन AnuvaadCommunication.com की स्थापना की. बहुराष्ट्रीय निगमों और देसी कॉरपोरेट्स के साथ देश भर की तमाम जनसंपर्क और विज्ञापन एजेंसियों के लिए काम करते रहे संजय एक जुलाई 2017 से जीएसटी लागू होने के बाद परेशान हो गए. वह जीएसटी को जानने-समझने की अपनी कोशिश और अनुभव को वे रोज फेसबुक पर लिखते हैं और अभी तक 75 से ज्यादा किस्त लिख चुके हैं. संजय से संपर्क sanjaya_singh@hotmail.com के जरिए कर सकते हैं.

जीएसटी पर संजय का लिखा ये भी पढ़ सकते हैं :

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पत्रकारिता फील्ड में आने वालों, इस किताब को पढ़ लो… फिर न कहना- ‘ये कहां फंस गए हम!’

पत्रकारिता की दुनिया को ‘संजय’ की नजर से देखने-समझने के लिए ‘पत्रकारिता – जो मैंने देखा, जाना, समझा’ को पढें…

वरिष्ठ पत्रकार और उद्यमी संजय कुमार सिंह की पुस्तक “पत्रकारिता – जो मैंने देखा, जाना, समझा“ उन तमाम लोगों के लिए आंख खोलने वाली है, जो आज भी पत्रकारों में बाबूराव विष्णु पड़ारकर या गणेश शंकर विद्यार्थी देखते हैं और जो ग्लैमर से प्रभावित होकर पत्रकारिता को पेशा बनाना चाहते हैं। यह सच है कि चीजें जैसी दिखाई पड़ती हैं, उनको वैसी ही वही मान ले सकता है जिसके पास अंतर्दृष्टि नहीं होगी। पर जिसके पास अंतर्दृष्टि है वह चीजों को उसके अंतिम छोर तक देखता है। चीजें जैसी दिखती हैं, वह उसे उसी रूप में कदापि स्वीकार नहीं करता। चिंतन-मनन करता है और अपनी अंतर्दृष्टि से सत्य की तलाश करता है।

(पुस्तक लेखक संजय कुमार सिंह. उपर है संजय की किताब का कवर पेज)


इस पुस्तक के लेखक ने भी अपनी इसी अंतर्दृष्टि से तस्वीर के दूसरे पहलू को सामने लाने का प्रयास किया है और मैं कह सकता हूं कि लेखक इसमें कामयाब है। वह इस पुस्तक के माध्यम से अपने तीन दशकों से ज्यादा के पत्रकारीय अनुभवों के आधार पर नई पीढ़ी के पत्रकारों या पत्रकारिता को पेशा बनाने की इच्छा रखने वाले युवाओं को इस पेशे की हकीकत से रू-ब-रू कराकर यह समझाने में सफल हैं कि करियर के लिहाज से यह पेशा कैसे ठीक नहीं है।

अस्सी के दशक में हिंदी पत्रकारिता को नया आयाम देने वाले “जनसत्ता” के संपादक प्रभाष जोशी ने इस पुस्तक के लेखक संजय कुमार सिंह के साथ हुई एक घटना का हवाला देते हुए संपादकीय लिखा था – “तेजाब से बची आंखें।”…और कहा था कि ये आंखें राह दिखाएंगी। उनकी यह टिप्पणी भले किसी और संदर्भ में थी। पर मैं आज देख रहा हूं कि संजय कुमार सिंह की अंतर्दृष्टि वाकई नई पीढ़ी को राह दिखा रही है।

यह आदर्श स्थिति है कि पत्रकारिता ऐसी हो जो मनुष्य के पूरे व्यक्तित्व का पोषण करे। यानी उसके शरीर, मन और आत्मा को पुष्ट करे। दूसरे शब्दों में पत्रकारिता ऐसी हो जो बेहतर मनुष्यता को निर्मित करने में संलग्न हो, सिर्फ घटनाओं के वृतांत इकट्ठे न करे। पर यह पुस्तक इस सत्य से बखूबी पर्दा हटाती है कि बदलते परिवेश में पत्रकारिता जैसी वीभत्स दिखती है, उससे भी गई-बीती है। पत्रकारों को इस स्थिति में ला खड़ा किया गया है कि उसे कुछ नकारात्मक नहीं मिलता है तो वह उसे पैदा करने की कोशिश में रहता है। कह सकते हैं कि उनके सामने हर प्रकार के झूठ निर्मित करने की मजबूरी है।

मुझे उम्मीद है कि यह पुस्तक पत्रकारिता के बाहरी स्वरूप को देखकर उसे अपना कैरियर बनाने का सपना देखने वाले युवाओं को नई दृष्टि प्रदान करेगी। इसके बावजूद जो युवा पत्रकारिता को पेशा बनाएंगे तो उन्हें इस बात का मलाल नहीं होगा कि क्या सोचा था और क्या हो गया। अच्छी बात है कि यह पुस्तक Amazon पर भी उपलब्ध है। सुविधा के लिए उसका लिंक नीचे दिया जा रहा है। लेकिन उसके पहले, description पर इस किताब के बारे में जो description दिया गया है, उसे पढ़ें…

‘स्वतंत्रता मिलने के बाद देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित हुई। प्रकारांतर में अखबारों की भूमिका लोकतंत्र के प्रहरी की हो गई और इसे कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका के बाद लोकतंत्र का ‘चौथा स्तंभ’ कहा जाने लगा। कालांतर में ऐसी स्थितियाँ बनीं कि खोजी खबरें अब होती नहीं हैं; मालिकान सिर्फ पैसे कमा रहे हैं। पत्रकारिता के उसूलों-सिद्धांतों का पालन अब कोई जरूरी नहीं रहा। फिर भी नए संस्करण निकल रहे हैं और इन सारी स्थितियों में कुल मिलाकर मीडिया की नौकरी में जोखिम कम हो गया है और यह एक प्रोफेशन यानी पेशा बन गया है। और शायद इसीलिए पत्रकारिता की पढ़ाई की लोकप्रियता बढ़ रही है, जबकि पहले माना जाता था कि यह सब सिखाया नहीं जा सकता है। अब जब छात्र भारी फीस चुकाकर इस पेशे को अपना रहे हैं तो उनकी अपेक्षा और उनका आउटपुट कुछ और होगा। दूसरी ओर मीडिया संस्थान पेशेवर होने की बजाय विज्ञापनों और खबरों के घोषित-अघोषित घाल-मेल में लगे हैं। ऐसे में इस पुस्तक का उद्देश्य पाठकों को यह बताना है कि कैसे यह पेशा तो है, पर अच्छा कॅरियर नहीं है और तमाम लोग आजीवन बगैर पूर्णकालिक नौकरी के खबरें भेजने का काम करते हैं और जिन संस्थानों के लिए काम करते हैं, वह उनसे लिखवाकर ले लेता है कि खबरें भेजना उनका व्यवसाय नहीं है।

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लेखक किशोर कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क +919811147422 या kk2801@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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क्या एनडीटीवी पर नियंत्रण के लिए कॉरपोरेट तख्तापलट की कोशिश की जा रही है?

Sanjaya Kumar Singh : क्या एनडीटीवी पर नियंत्रण के लिए क्या कॉरपोरेट तख्ता पलट की कोशिश की जा रही है? शुक्रवार की सुबह एनडीटीवी के बिक जाने की खबर पढ़कर मुझे याद आया कि प्रणय राय को अगर कंपनी बेचनी ही होती तो वे आईसीआईसीआई बैंक के 48 करोड़ रुपए के लिए पड़े सीबीआई के छापे के बाद प्रेस कांफ्रेंस क्यों करते। क्यों कहते कि झुकेंगे नहीं। मुझे इंडियन एक्सप्रेस की खबर पर यकीन नहीं हुआ।

मैंने पूरी खबर पढ़ी और अंदर मिल गया कि इसकी पुष्टि नहीं हुई है और स्पाइस जेट के अधिकारी ने तो खबर को पूरी तरह गलत और निराधार कहा था। इसके बावजूद इंडियन एक्सप्रेस ने यह खबर छापी थी तो कारण सूत्र पर भरोसा होगा और इसके पक्ष में तर्क यह था कि एनडीटीवी ने इसपर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। मेरे हिसाब से ऐसी खबरों के सही होने की संभावना आधी-आधी ही रहती है। इसलिए मैं अगर ब्रेकिंग चलाने की जल्दी ना हो तो इंतजार करना पसंद करता हूं। दोपहर तक स्पष्ट हो गया कि इंडियन एक्सप्रेस चूक गया था। मेरा मानना है कि इस तरह गलत खबर प्लांट करने या कराने की कोशिश करने वालों को सबक सीखाना चाहिए पर अब नहीं लगता कि वैसे दिन कभी आएंगे। हालांकि वह अलग मुद्दा है।

शाम तक मुझे समझ में आ गया कि हो ना हो यह एनडीटीवी में तख्ता पलट की कोशिश चल रही होगी। देश में कॉरपोरेट तख्ता पलट का पहला और संभवतः सबसे चर्चित मामला अनिवासी भारतीय स्वराज पॉल और देसी उद्योग समूह डीसीएम तथा एस्कॉर्ट्स से जुड़ा था। डीसीएम यानी दिल्ली क्लॉथ मिल को तब खादी के बाद देसी कपड़ों यानी भारतीयता का प्रतीक माना जाता था। एस्कॉर्ट्स को उस समय उसके मालिक नंदा परिवार के लिए जाना जाता था। राजन नंदा दूसरी पीढ़ी के मालिक थे उनके पिता हर प्रसाद आजादी के समय पाकिस्तान से आए थे। राजन नंदा की पत्नी राजकपूर की बेटी ऋृतु हैं और उनके बेटे निखिल की शादी अमिताभ बच्चन की बेटी श्वेता से हुई है। यह विवरण ये बताने के लिए स्वराज पॉल ने किससे किसलिए पंगा लिया होगा और क्यों नाकाम रहे। एस्कॉर्ट्स समूह पर नंदा परिवार का नियंत्रण पांच से 10 प्रतिशत के बीच की हिस्सेदारी से था और नियंत्रण की इस कोशिश के बाद कई महीनों तक भारतीय उद्योग जगह में उत्सुकता औऱ चिन्ता छाई रही। आखिरकार स्वराज पॉल ने हथियार डाल दिए।

अब स्थिति थोड़ी अलग है। तख्ता पलट का उद्देश्य भी। एक मीडिया संस्थान जो सरकार के खिलाफ है उसे सरकार समर्थक ताकतें नियंत्रण में लेना चाहती हैं। तरीके वही आजमाए जा सकते हैं औऱ कल जो सब हुआ वह ऐसी ही कोशिश का हिस्सा लगता है। इसमें करना सिर्फ यह होता है कि बाजार से किसी कंपनी के इतने शेयर खरीद लिए जाएं कि जिसका नियंत्रण है उससे ज्यादा हो जाए या निदेशक मंडल में बहुमत हो जाए। यह आसान नहीं है पर तकनीकी रूप से संभव है। इसे कंपनी का बिकना नहीं कहा जाएगा पर स्थिति वैसी ही होगी। सैंया भये कोतवाल से यह संभव है। वैसे ही जैसे थानेदार अपना हो तो कितने भी पुराने किराएदार को भगा ही देगा। इसलिए मामला अभी खत्म नहीं हुआ है। पिक्चर अभी बाकी है दोस्तों।

जनसत्ता समेत कई अखबारों में काम कर चुके और इन दिनों सोशल मीडिया पर बेबाक लेखन के लिए चर्चित पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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जीएसटी का सच (पार्ट 25 से 36 तक) : छोटे अखबारों पर डीएवीपी के जरिए जीएसटी की मार

जीएसटी से बेरोजगारी की कगार पर खड़े एक पत्रकार की डायरी

जीएसटी का सच (25) सरकार की डीएवीपी पॉलिसी 2016 और जीएसटी के कारण 90 फीसदी अखबार बंद होने की कगार पर हैं

संजय कुमार सिंह
sanjaya_singh@hotmail.com

जीएसटी से छोटे अखबार भी परेशान हैं। सरकारी विज्ञापनों पर आश्रित इन अखबारों को डीएवीपी (विज्ञापन और दृश्य प्रचार निदेशालय) के जरिए विज्ञापन दिए जाते हैं। केंद्र में नरेन्द्र मोदी की सरकार बनने के बाद डीएवीपी ने विज्ञापन जारी करने के नियमों में सख्ती लाई है और इससे कई प्रकाशन पहले से मुश्किल में हैं। अब उनपर जीएसटी का डंडा भी चल रहा है। खास बात यह है कि डीएवीपी 20 लाख से कम टर्नओवर वाले प्रकाशकों पर भी जीएसटी पंजीकरण कराने के लिए दबाव डाल रहा है। डीएवीपी का कहना है कि बिना जीएसटी में पंजीकृत हुए सरकारी विज्ञापन उपलब्ध नहीं कराया जा सकता है। दूसरी ओर, एक छोटी पत्रिका के संपादक के मुताबिक जनवरी 2017 से अब तक मात्र 250 सेंटीमीटर विज्ञापन दिया गया है, जिसकी कीमत सर्कुलेशन के आधार पर 1500 सौ से 5000 रुपये है। ऐसे में डीएवीपी जीएसटी को लेकर छोटे अखबारों से क्यों जबरदस्ती कर रहा है यह प्रकाशकों की समझ से बाहर है। वो भी तब जब उनका टर्नओवर ही ढाई-तीन लाख से दस-बारह लाख तक ही है, और इसकी सीए ऑडिट, वार्षिक विवरणी हर साल ऑनलाइन और फिजिकली डीएवीपी को भेजी जाती है।

जानकारों का कहना है कि सरकार की डीएवीपी पॉलिसी 2016 और जीएसटी के कारण 90 फीसदी अखबार बंद होने की कगार पर हैं। छोटे अखबार मालिकों के मुताबिक यह समय छोटे और मध्यम अखबारों के लिए अब तक का सबसे कठिन समय है। समाचार पत्र उद्योग दूसरे उद्योगों की तरह सरकार से संरक्षण की उम्मीद करता है पर हालात उल्टे हैं। डीएवीपी की नई विज्ञापन नीति को दमनकारी बताने वाले छोटे अखबार मालिकों का कहना है जीएसटी ने प्रिन्ट मीडिया की जान लेना शुरू कर दिया है। प्रिन्ट मीडिया के लिए राज्य एवं केन्द्र सरकार ने हमेशा सर्कुलेशन स्लैब के आधार पर विज्ञापन दरें तय करने का प्रावधान रखा है। इसका नतीजा यह है कि अखबारों की सीनियारिटी पर कभी गौर नहीं किया गया। मजबूरन कुछेक अखबार मालिक विज्ञापन दर हासिल करने के फेर मे सर्कुलेशन बढा कर बताते हैं। यदि सीनियारिटी के आधार पर रेट तय होता तो अखबार वालों को यह सब करने की जरूरत ही नहीं पड़ती।

डीएवीपी की संशोधित विज्ञापन नीति से सैकड़ों अखबार पहले ही बाहर हो चुके हैं। 1 जून 17 से नई विज्ञापन नीति लागू कर डीएवीपी ने कइयों का गला घोंट दिया। अब तक डीएवीपी के सदमे से छोटे अखबार बाहर आये ही नही कि जीएसटी जैसे कानून ने इन अखबारों की जान खतरे मे डाल दी। न्यूज पेपर छापने वाली प्रिन्टिंग मशीन पर 5 प्रतिशत, विज्ञापनों पर 5 प्रतिशत और न्यूज प्रिन्ट पेपर खरीदने पर 5 प्रतिशत जीएसटी का प्रावधान हैं। हकीकत यह हैं कि राज्य एवं केन्द्र सरकार से कुल मिला कर छोटे अखबारों को सालाना एक से डेढ लाख का औसत विज्ञापन भी नहीं मिलता हैं। उसपर जीएसटी पंजीकरण की बाध्यता इन अखबारों को मार डालेगी।

प्रिंट मीडिया में विज्ञापन के लिए स्‍पेस (स्‍थान या जगह) की बिक्री पर लागू वस्‍तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की दर पर भी विवाद रहा। इस बारे में उठे सवाल पर सरकार ने एक विज्ञप्ति में कहा है कि प्रिंट मीडिया में विज्ञापन के लिए स्थान की  बिक्री पर जीएसटी 5 प्रतिशत है। यदि विज्ञापन एजेंसी ‘प्रिंसिपल से प्रिंसिपल’ के आधार पर काम करती है, अर्थात वह किसी समाचार-पत्र संस्‍थान से स्‍पेस खरीदती है और इस स्‍पेस को विज्ञापन के लिए ग्राहकों को अपने खाते के अंतर्गत ही यानी एक प्रिंसिपल के रूप में बेचती है, तो वह ग्राहक से विज्ञापन एजेंसी द्वारा वसूली गई पूरी राशि पर 5 प्रतिशत की दर से जीएसटी का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी होगा। वहीं, दूसरी ओर यदि कोई विज्ञापन एजेंसी किसी समाचार-पत्र संस्‍थान के एक एजेंट के रूप में कमीशन के आधार पर विज्ञापन के लिए किसी स्‍पेस को बेचती है, तो वह समाचार पत्र संस्‍थान से प्राप्त बिक्री कमीशन पर 18 प्रतिशत की दर से जीएसटी का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी होगी। इस तरह के बिक्री कमीशन पर अदा किए गए जीएसटी के आईटीसी का भुगतान समाचार पत्र संस्‍थान के लिए उपलब्ध होगा। स्पष्ट है कि जीएसटी के नियमों में कोई ढील छोटे अखबारों के लिए भी नहीं है और जीएसटी के दबाव में छोटे अखबार बंद होते हैं या नहीं निकल पाते हैं तो किसी को कोई परवाह नहीं है। अखबार मालिक अपना देखें।

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‘कॉमेडी नाइट्स विद कपिल’ वाले कीकू शारदा की गिरफ्तारी बाबा राम रहीम की ताकत दिखाने के लिए हुई थी!

Sanjaya Kumar Singh : क्या ये सच नहीं है कि कीकू शारदा की गिरफ्तारी तब बाबा राम रहीम की ताकत बताने के लिए की गई थी… धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने की शिकायत पर टीवी अभिनेता कीकू शारदा के खिलाफ कार्रवाई करने वाली पुलिस को क्या यह पता नहीं था कि गुरमीत सिंह पर बलात्कार के आरोप हैं और उसकी जांच चल रही है। पुलिस जब बलात्कार के मामलों में कार्रवाई नहीं करती है और धार्मिक आस्था भड़काने की शिकायत पर कार्रवाई करेगी तो भक्त पगलाएंगे ही। जांच होनी चाहिए कि पुलिस ने इस मामले में कार्रवाई किसके कहने पर की? हरियाणा पुलिस जब कीकू को गिरफ्तार कर मुंबई से ले आई थी तब स्थानीय मीडिया का काम था कि वह याद दिलाती कि बाबा बलात्कार के मामले में अभियुक्त है और पुलिस की फुर्ती असाधारण है। अगर मीडिया ने अपना यह मामूली सा काम किया होता और सरकार ने इस घटना से सीख ली होती तो पुलिस को भी जान रही होती।

‘कॉमेडी नाइट्स विद कपिल’ में पलक का किरदार निभाने वाले कीकू शारदा ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करके कहा कि डेरा सच्चा सौदा कोई धर्म नहीं है और यह बात डेरे की वेबसाइट से भी साफ पता चलती है। ऐसे में धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का मामला बनता ही नहीं है। फतेहाबाद पुलिस ने जांच में पाया कि कीकू के खिलाफ मामला बनता ही नहीं है, लिहाजा उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द करने की अर्जी अदालत में दायर की गई है। सरकार के इस जवाब को रिकार्ड में लेते हुए पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति आरके जैन ने सुनवाई 27 अप्रैल 2016 तक स्थगित कर दी थी।

इस मामले से संबंधित मार्च 2016 की खबरें वेब साइट पर मिलीं जिनके मुताबिक कीकू की रिहाई पीएमओ के हस्तक्षेप पर हुई थी और हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने कहा था कि कामेडियन का उत्पीड़न नहीं होने देंगे। इसके बावजूद यह सच है कि डेरा सच्चा सौदा के गुरमीत राम रहीम (और बलात्कार के आरोपी, अब दोषी) की मिमिक्री करने के ‘जुर्म’ में कमीडियन कीकू शारदा दो बार हिरासत में लिए गए। उन्होंने कहा है कि यह बेहद यातनापूर्ण और दुखद था। एनडीटीवी से बात करते हुए ऐक्टर ने कहा था, मैं खुशकिस्मत हूं कि मुझे जेल में 14 दिन नहीं गुजारने पड़े।

कीकू ने यह भी कहा था, ‘हालांकि जेल मेरे लिए ज्यादा महफूज थी, क्योंकि बाहर तो भयंकर भीड़ है।’ कीकू ने कहा कि अगली बार से वह ज्यादा सतर्क रहेंगे और ऐसे किसी ऐक्ट से पहले रिसर्च भी करेंगे। उन्होंने कहा, ‘काश हर कोई खुद पर हंसना सीख सके और सबमें थोड़ा ह्यूमर हो।’ लेकिन सरकार और पुलिस ने इससे कोई सीख नहीं ली। पुलिस को तो खैर क्या सीखना था पर सरकार कैसे चूक गई?

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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रजत शर्मा के सिर पर बालों की खेती अच्छी हो गई है!

Sanjaya Kumar Singh : इंडिया टीवी पर आप की अदालत में सोनू निगम थे। सोनू निगम के कारण आज मोदी वाले एपिसोड के बाद रजत शर्मा को देखा। बालों की खेती अच्छी हो गई है। पर फिलहाल मुद्दा यह है कि एक सवाल के जवाब में सोनू ने कहा कि मैं भिखारी बनकर यह देखना समझना चाहता था कि बिना प्रचार, ब्रांडिंग और माइक आदि के सिर्फ मेरी आवाज का क्या महत्व है। और सत्तर साल के एक भिखारी के रूप में मैंने महसूस किया कि मेरी आवाज वही कोई 12-14 रुपए की है जो उस दिन उसे मिले थे। जिसे सोनू निगम ने फ्रेम करवाकर ऑफिस में रखा है। सोनू ने स्पष्ट किया कि आदमी पर सिर्फ उसकी योग्यता का नहीं और भी बहुत सारी चीजों का असर होता है।

इस कार्यक्रम को देखने के बाद Raghwendra Singh की एक पोस्ट पढ़ने को मिली, जो इस प्रकार है-

आज किसी चैनेल पर लालूजी की जीवनी के बारे में बता रहा था। इससे पता चलता है की लालूजी तो मोदीजी से भी महान हैं। मोदीजी शहर में चाय बेचकर pm बन गये लालूजी उससे भी बुरी हालात में थे। मज़दूरी कर, काठ का सिलेट पर पढ़ाई की और भंगरैया से उसे मिटाते थे और भैंस पर चढ़कर स्कूल जाते थे और कई दिन भूखे रहे थे पर कभी भी गाला फाड़ का नहीं बोले मैं मज़दूरी कर cm बने। अगर ये भी अपनी पब्लिसिटी करते तो pm बन सकते थे।

भले ही यह पोस्ट लालू यादव या उस कार्यक्रम से असहमति में हो पर मुझे लगता है कि ब्रांडिंग का अपना महत्व तो है। वरना चार लाख का डिजाइनर सूट पहनने वाला क्यों कहता कि उसे प्रधान सेवक बना दिया जाए। क्यों सबके खाते में 15 लाख रुपए आने का सपना दिखाता? और अगर किसी ने यह सब नहीं किया तो वह कहे भी नहीं? वह भी तब जब चाय बेचने की कहानी सबको मालूम है। मालगाडियों में भी चाय बेचते थे।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से. इस पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ चुनिंदा यूं हैं :

Ambrish Kumar खेती? यह कैसे संभव हुई.

Sanjaya Kumar Singh पैसों का खेल है। काफी दिन से चल रहा था। खेती 2009 में ही शुरू हो गई थी। आलोक तोमर ने तब ये लिखा था-
इससे तो टकले ही अच्छे थे रजत शर्मा!
http://old.bhadas4media.com/tv/1299-alok-tomar.html

Alka Bhartiya प्रचार करने वाले सारे साधन खरीद लिए हैं उन्होंने और साधनों के मालिक हैं की उसके आगे हाथ जोड़े खड़े हैं

Sanjaya Kumar Singh मामला सिर्फ प्रचार का नहीं। अनैतिक होने और उसकी सीमा का है। कुछ लोग प्रचार में बिल्कुल अनैतिक नहीं होते और भाजपा इसकी कोई सीमा नहीं मानती।

Anil Saxena अलका जी आपकी बात सही है लेकिन भाजपा का संगठन बहुत मजबूत है और इसी लिये अफवाह फैलाने में भी इनका कोई मुकाबला नही।

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भाजपा के पक्ष में प्रायोजित तरीके से लिखने वाले प्रदीप सिंह कोई अकेले पत्रकार नहीं हैं

संजय कुमार सिंह, वरिष्ठ पत्रकार

Sanjaya Kumar Singh : चुनाव जीतने की भाजपाई चालें, मीडिया और मीडिया वाले… उत्तर प्रदेश चुनाव जीतने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने अपने सारे घोड़े खोल दिए हैं। भक्त, सेवक, कार्यकर्ता, प्रचारक सब अपनी सेवा भक्ति-भाव से मुहैया करा रहे हैं। इसमें ना कुछ बुरा है ना गलत। बस मीडिया और मीडिया वालों की भूमिका देखने लायक है। नए और मीडिया को बाहर से देखने वालों को शायद स्थिति की गंभीरता समझ न आए पर जिस ढंग से पत्रकारों का स्वयंसेवक दल भाजपा के पक्ष में लगा हुआ है वह देश के भविष्य के लिए अच्छा नहीं है। कहने की जरूरत नहीं है कि भाजपा एक सांप्रादियक पार्टी है जो लोकतांत्रिक व्यवस्था का पालन मजबूरी में ही करती है।

नरेन्द्र मोदी को जिन स्थितियों में जिस तरह प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया गया और उसके बाद जीतने पर उन्होंने जो सब किया, जो कार्यशैली रही वह काफी हद तक तानाशाह वाली है। इसे उनकी घोषित-अघोषित, दिखने वाली और न दिखने वाली अच्छाइयों के बदले तूल न दिया जाए यह तो समझ में आता है। पर अपेक्षित लाभ न होने पर भी नरेन्द्र मोदी और आज की भाजपा का समर्थन भारत जो इंडिया बन रहा था उसे हिन्दुस्तान बनाने का समर्थन करना है। मीडिया का काम आम लोगों को इस बारे में बताना और इंडिया से हिन्दुस्तान बनने के नफा-नुकसान पर चर्चा करना है पर मीडिया के एक बड़े हिस्से ने तय कर लिया हो उग्र हिन्दुत्व ही देशहित है।

मीडिया पैसे के लिए और दबाव में ऐसा करे – तो बात समझ में आती है। उसे रोकने के लिए भी दबाव बनाया जा सकता है। पाठकों को बताया जा सकता है और उम्मीद की जा सकती है कि जनता चीजों को समझेगी तो मीडिया से ऐसे प्रभावित नहीं होगी जैसे आमतौर पर हो सकती है। लेकिन स्थिति उससे विकट है। मीडिया के लोग खुलकर भाजपा का समर्थन कर रहे हैं। कुतर्क कर रहे हैं और स्वीकार कर रहे हैं वे तथाकथित राष्ट्रवादी, देशभक्ति वाली और हिन्दुत्व की पत्रकारिता कर रहे हैं। जो पुराने लोग संघ समर्थक पत्रकार माने जाते हैं उन्हें भी अब घोषित रूप से समर्थन करने में हिचक नहीं है।

इसी क्रम में आज वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह ने आज जागरण में प्रकाशित अपने लेख, “उत्तर प्रदेश की चुनावी हवा” का लिंक फेसबुक पर साझा किया है। पूरा लेख क्या होगा इसका अंदाजा है इसलिए पढ़ा नहीं और जो अंश हाइलाइट किया गया है उसे पढ़ने के बाद समझ में आ जाता है कि लेखक कहना क्या चाहता है। संबंधित अंश है, “यदि भाजपा मोदी के प्रचि वंचित तबकों के आदर भाव को वोट में बदल लेती है तो चुनाव जातीय समीकरणों से परे जा सकता है।” प्रदीप सिंह फेसबुक पर सक्रिय नहीं है। इस लेख से पहले उनका जो लेख उनकी वाल पर दिख रहा है वह 2 दिसंबर का है। आज 23 फरवरी को एक लेख का लिंक देने भर से यह आरोप लगाना उचित नहीं है कि वे भाजपा का प्रचार कर रहे हैं। पर दो दिंसबर की उनकी पोस्ट है, “राज्यसभा में हंगामा और नारेबाजी कर रहे सदस्यों से सभापति हामिद अंसारी ने पूछा ये नारे सड़कों पर क्यों नहीं लग रहे? सवाल तो बड़ा वाजिब है। पर अभी तक कोई जवाब आया नहीं है।” इसे 17 लोगों ने शेयर किया है।

दो दिसंबर को ही उनकी एक और पोस्ट है जो एक दिसंबर को जागरण में ही प्रकाशित उनके लेख का लिंक है या उसे साझा किया गया है। इससे पहले उनकी पोस्ट 6 अक्तूबर की है। यह भी जागरण में प्रकाशित उनके लेख का लिंक है। लेख का शीर्षक है, “कुतर्कों के नए देवता” और यह सर्जिकल स्ट्राइक पर है। इसकी शुरुआत इस तरह होती है, “कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना। फिल्म अमर प्रेम का यह गाना भारतीय नेताओं पर सटीक बैठता है। नेता किसी घटना, बयान या भाषण पर प्रतिक्रिया देने से पहले यह सोचता है कि जो हुआ है उसका फायदा किसे होगा। फायदा अपने विरोधी को होता दिखे तो वह विरोध में किसी हद तक जाने को तैयार रहता है। इस मामले में अमूमन फौज को अपवाद माना जाता था, लेकिन अब नहीं। यह नरेंद्र मोदी का सत्ता काल है।” इस पोस्ट में लिखा है, “मित्रों लम्बे अंतराल के बाद आपसे मुखातिब हो रहा हूं। दैनिक जागरण के आज के संस्करण में सम्पादकीय पेज पर छपा मेरा लेख आपकी सेवा में पेश है।”

इससे पहले की पोस्ट सात जुलाई की है जो उन्होंने किसी और का लिखा साझा किया है और अंग्रेजी में है। यह पोस्ट राजनीतिक नहीं है। प्रदीप सिंह का रुझान भाजपा की तरफ है, यह कोई नई बात नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि वे इनदिनों अपने सामान्य कार्य से अलग जागरण में लिख रहे हैं उसे फेसबुक पर साझा कर रहे हैं और जागरण उनके नाम के साथ उनकी ई-मेल आईडी नहीं, response@jagran.com छाप रहा है। क्या यह पेड न्यूज या प्रायोजित लेख है? कहने की जरूरत नहीं है कि Pradeep Singh अकेले ऐसे पत्रकार नहीं हैं।

जनसत्ता अखबार में लंबे समय तक कार्यरत रहे और इन दिनों सोशल मीडिया पर बेबाक लेखन के लिए चर्चित वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से यह मीडिया विश्लेषण लिया गया है. संजय से संपर्क anuvaad@hotmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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घटिया और लचर है प्रधानमंत्री का मीडिया मैनेजमेंट

Sanjaya Kumar Singh : घटिया और लचर है प्रधानमंत्री का मीडिया मैनेजमेंट… खादी एंड विलेज इंडस्ट्रीज कमीशन की डायरी और कैलेंडर पर महात्मा गांधी की फोटो हटाकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की फोटो लगाए जाने के सवाल पर भक्त मीडिया ने पता नहीं अधिकारियों की इच्छा या आदेश पर या अपने स्तर पर ही नया पैंतरा लिया है। और, इस मामले में प्रधानमंत्री की छवि को हो सकने वाले नुकसान को धोने की कोशिश है। तर्क वही कि फोटो के उपयोग से पहले प्रधानमंत्री कार्यालय से अनुमति नहीं ली गई थी। यहां, यह खबर जब पहली बार आई थी तो आधिकारिक तौर पर क्या कहा गया था, उल्लेखनीय है। इंडियन एक्सप्रेस की साइट पर मूल खबर के साथ पीएमओ की प्रतिक्रिया भी है और इसका उल्लेख शीर्षक में ही है, “विवाद अनावश्यक है”।

इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें :

indian express news

पीटीआई के हवाले से 13 जनवरी को शाम 740 बजे की इस खबर में कहा गया है, The Prime Minister ‘s Office (PMO) said the controversy was “unnecessary” as “there is no rule in KVIC that it’s diary and calendar should have only Gandhiji’s photo.”

PMO sources said in the past also, there was no picture of Mahatma Gandhi on such KVIC material.

“In the calendars and diaries of 1996, 2002, 2005, 2011, 2012, 2013, 2016, there was no picture of Gandhi. So there is no question of Modi replacing Gandhiji’s picture,” the sources said.

“Those stoking the controversy over the issue should realize that during Congress rule of 50 years, the sale of khadi remained restricted to 2 per cent to 7 per cent but in last two years, the sale has seen an unprecedented jump of 34 per cent. This is because of PM’s efforts to popularise khadi,” they added.

The PMO said “Modi is an icon of the youth and the growing popularity of khadi in the world is testimony to this.”

The PMO said the KVIC diary and calendar has photographs of Modi distributing charkha among poor women, they said.

लगभग ऐसा ही बयान उसी दिन केवीआईसी के चेयरमैन के नाम से जारी किया गया है। बाद में एनडीटीवी के कार्यक्रम में भी श्री सक्सेना ऐसी ही बातें करते रहे। इसके बाद अब यह छापने, कहने या लिखने का क्या मतलब कि प्रधानमंत्री की अनुमति के बिना उनकी फोटो का इस्तेमाल किया गया? तमाम लोग इस निर्णय का बचाव कर चुके हैं। भक्तगण चाहे जो कहें, महात्मा गांधी की फोटो हटाकर प्रधानमंत्री की फोटो लगाना चापलूसी के अलावा कुछ और हो नहीं सकता। इसके समर्थन में कुछ तर्क ढूंढ़े और गढ़े भी जा सकते हैं। बात खत्म हो जाती और मामला ठंडा हो ही जाता। पर अब यह खबर पूरे मामले में प्रधानमंत्री के लचर मीडिया मैनेजमेंट की पोल खोल रही है। प्रधानमंत्री के स्तर पर ऐसी खबरें कोई उच्च अधिकारी यूं ही नहीं छपवाएगा। इकनोमिक टाइम्स की यह खबर आज की है और एक्सक्लूसिव के तौर पर दी गई है। किसी अनाम सूत्र से ऑफ दि रिकार्ड बातचीत के आधार पर ऐसी खबरें हिन्दी में क्षतिपूर्ति कही जाती हैं और बड़े पदों पर बैठे लोगों की भक्ति और चापलूसी में ही चलवाई जाती हैं। पर होती मीडिया मैनेजमेंट का हिस्सा ही है। इसमें सूचना तो है नहीं. जो तर्क दिया जा रहा है वह भी निराधार।

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प्रधानमंत्री कार्यालय की सेवा में दी गई यह खबर बहुत ही लचर है और इसमें अनाम शिखर के अधिकारी के हवाले से कहा गया है, “This is not the first instance of someone walking the extra mile to impress the PM or to show their association with the PM.” इससे विवाद बढ़ेगा ही घटेगा नहीं और इन तर्कों को कोई मानने से रहा। इस खबर से यह समझना मुश्किल नहीं है कि पीएम से करीबी दिखाने की कोशिश करने वाले का पूर्व में बचाव करने के बाद अब उसी को बलि का बकरा बनाने की कोशिश की जा रही है और कोई भक्त होगा तो बन भी जाएगा या शहीद होना खुशी-खुशी स्वीकार कर लेगा। पर इससे यह भी साफ हो रहा है कि प्रधानमंत्री का मीडिया मैंनेजमेंट बहुत ही घटिया है। चर्चा है कि प्रधानमंत्री सारे निर्णय स्वंय लेते हैं और सलाहकारों की नहीं चलती है। ऐसे में उन्हें मान लेना चाहिए कि मीडिया मैनेजमेंट और राजनीति अलग-अलग चीजें हैं। मीडिया को दबाने, खरीदने धमकाने के आरोपों के बाद इस तरह की चूक उन्हें कहीं का नहीं छोड़ेगी।

लेखक संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं. जनसत्ता अखबार में लंबे समय तक वरिष्ठ पद पर कार्यरत रहे. उनसे संपर्क anuvaad@hotmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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अपनी रिपोर्टर पूजा की आड़ क्यों ले रहे हो सुधीर चौधरी, साफ कहो नैतिक जिम्मेदारी मेरी है

Sanjaya Kumar Singh : गैर-जिम्मेदार रिपोर्टिंग पर एफआईआर हुई तो पढ़िए सुधीर चौधरी का बचाव। संपादक जी कह रहे हैं कि रिपोर्टर पूजा मेहता सिर्फ 25 साल की है। पूजा को ममता बनर्जी की असहिष्णुता झेलना पड़ रहा है जबकि पूजा अपने संपादक की नालायकी झेल रही है। ज़ी न्यूज संतुलित खबरें कर रहा होता तो खिलाफ खबरों पर भी एफआईआर नहीं होती है और संपादकी झाड़ने वाले मौका मिलते ही फंसा दिए जाते हैं – ये कौन नहीं जानता है। पूजा नहीं जानती होगी सुधीर चौधरी को तो पता ही है। अब पूजा की आड़ क्यों ले रहे हो। कहो, नैतिक जिम्मेदारी मेरी है। पूजा का नाम एफआईआर से हटा दिया जाए। पूजा की आड़ में खुद बचने का रास्ता क्यों खोज रहे हो।

कायदे से रिपोर्टिंग के लिए परेशान किया जाना गलत है। ममता बनर्जी ने जो किया वह समर्थन करने लायक नहीं है लेकिन संपादक रिपोर्टर की आड़ क्यों ले? दोष उसके सिर क्यों मढ़े? जिम्मेदारी तो संपादक की होती है और अगर रिपोर्ट सही है तो संपादक कहेगा सही है और नहीं तो माफी मांगेगा? रिपोर्टर की आड़ लेने का क्या मतलब लगाया जाए?

मैं ज़ी न्यूज की रिपोर्टिंग / संपादकी देखता नहीं लेकिन संपादक के रूप में बचाव बड़ा लचर है। दम है तो यही कहते कि रिपोर्ट सही है। ममता मुझे झेल भेज दें। अब जूनियर रिपोर्टर की आड़ में रिरिया क्यो रहे हो? आखिर स्टोरी पास करने की जिम्मेदारी तो तुम्हारी है सुधीर चौधरी।  अगर ममता ने सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया (अभी तो एफआईआर ही हुई है) तो लिखो ना बताओ, दिखाओ, रोने क्यों लगे? अगर एफआईआर कराना मुख्यमंत्री की असहिष्णुता है तो तुम्हारा यह बचाव दुम दबाकर रिरियाना है। इससे अच्छा होता, सीधे गलती मान लेते। तुम भी तो मीडिया की आजादी के नाम पर भौंक रहे हो।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

मूल खबर…

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मोदी के पीएम पद पर बने रहते हुए सबूत कैसे जुटाए जाएंगे माई लॉर्ड!

Sanjaya Kumar Singh : मामला पर्याप्त सबूत होने या न होने का नहीं है… मामला देश की सर्वोच्च अदालत में है और बड़े-बड़े लोग जुड़े हैं। मेरी कोई औकात नहीं कि इस मामले में टिप्पणी करूं पर जैन हवाला मामले को अच्छी तरह फॉलो करने के अपने अनुभव से कह सकता हूं कि सुप्रीम कोर्ट की चिन्ता जायज है। लेकिन यहां मामला पर्याप्त सबूत होने या न होने का नहीं है। मामला ठीक से जांच कराए जाने का है।

जैन हवाला मामले में 115 अभियुक्त थे और सभी मामलों की जांच, तथा उन्हें साबित करना अपेक्षाकृत मुश्किल था। पर यहां मामला सीधा है। आज टेलीग्राफ की इस खबर से भी लगता है गुजरात सीएम अगर गुजरात अलकली केमिकल है तो उसे भुगतान क्यों हुआ, हुआ कि नहीं इसकी जांच हो जाए और यह रिश्वत है (किसी और कारण से, किसी और को) तो उस मामले में कार्रवाई हो और इसे खत्म माना जाए। पर मामला है तो उसे अंजाम तक पहुंचाना ही चाहिए।

राजदीप सरदेसाई के साथ अरविन्द केजरीवाल की बातचीत से जो मामला समझ में आता है वह यह है कि बुनियादी तौर पर एक मामला है, शक है। सुप्रीम कोर्ट के लिए यह पर्याप्त नहीं है इस पर कोई विवाद नहीं है। पर मामला यह है कि इसकी जांच होनी चाहिए। पर्याप्त सबूत जुटाए जा सकते हैं कि नहीं? जुटाने की कोशिश हुई कि नहीं? कौन करेगा? क्यों और कैसे करेगा? अरविन्द केजरीवाल ने कहा कि इसकी जांच नहीं कराई जा रही है, नहीं होने दी जा रही है। संबंधित अधिकारियों का तबादला कर दिया गया आदि। इस लिहाज से सुप्रीम कोर्ट में अपील यह होनी चाहिए थी (मुझे लग रहा है अभी ऐसा नहीं है, मैं गलत हो सकता हूं) कि इस मामले की निष्पक्ष जांच कैसे सुनिश्चित हो? यह नहीं कि उपलब्ध सबूतों पर ही कार्रवाई हो। सबूत कार्रवाई के लिए पर्याप्त न हों, यह संभव है। पर जांच के लिए तो पर्याप्त हैं ही।

इस खबर में कहा गया है कि गुजरात सीएम का मतलब गुजरात अलकली केमिकल्स है – गुजरात के मुख्यमंत्री नहीं। ठीक है। हो सकता है। पर इस बात की जांच हो जाए पुष्टि हो जाए कि गुजरात सीएम गुजरात अलकली केमिकल्स ही है। अगर किसी ने किसी कंपनी को इतनी राशि दी है तो उसका कारण होगा, संबंध होगा, सबूत भी होंगे। आदि। साबित होना कोई मुश्किल नहीं है।

और, जब ईमानदारी की बात हो रही है और वह देश के सभी लोगों पर समान रूप से लागू होना है तो गुजरात अलकली केमिकल्स को यह भुगतान किसलिए हुआ, नकद हुआ कि चेक से और नकद हुआ तो क्यों? संतोषजनक जवाब मिल जाए। बात खत्म। नैतिकिता का तकाजा है और चूंकि मामला प्रधानमंत्री से संबंधित है, और प्रधानमंत्री न भी चाहें तो जांच करने वाले को एक भय रहेगा इसलिए यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि काम (जांच) करने वालों को यह भय न रहे। कैसे न रहे – यह सुनिश्चित करना संबंधित विभागों, लोगों और संस्थाओं का काम है।

इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट की यह चिन्ता भी जायज है कि चूंकि मामला प्रधानमंत्री के खिलाफ है इसलिए इसे जल्दी निपटाया जाना चाहिए और सबूत जल्दी चाहिए। अगर सुप्रीम कोर्ट में अपील करने वालों को अपने सबूतों पर यकीन है और लगता है कि सब साबित हो सकता है पर प्रधानमंत्री के इस पद पर बने रहते हुए सबूत कैसे जुटाए जाएंगे या सबूत जुटाने में क्या समस्या आ रही है – सुप्रीम कोर्ट को यह बताया जाता तो मेरे ख्याल से बेहतर रहता।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : https://www.facebook.com/sanjaya.kumarsingh

पूरे मामले को समझने के लिए इसे भी पढ़ें :

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