अशोक पांडेय-
आप मंगलेश डबराल को अकेले याद नहीं कर सकते. उनका और उनकी कविता का तसव्वुर ज्ञानरंजन, विष्णु खरे, वीरेन डंगवाल, आलोक धन्वा, असद जैदी, नीलाभ, त्रिनेत्र जोशी, पंकज बिष्ट, लीलाधर जगूड़ी और पंकज सिंह जैसे उनके अन्तरंग दोस्तों के जिक्र के बगैर संभव ही नहीं. इस मित्र-मंडली में और कुछ और नाम भी होंगे लेकिन तीस-बत्तीस सालों मैंने जितना उन्हें देखा-जाना यही लोग उनके सबसे नजदीक दिखाई दिए.
अलग-अलग सामाजिक-भौगोलिक पृष्ठभूमियों से आईं ये सारी बड़ी रचनात्मक प्रतिभाएं 1970 की दहाई की शुरुआत में एक साथ आईं और ऐसे जुड़ गईं जैसे वे एक ही कबीले, एक ही परिवार के बिछड़े हुए हिस्से हों. इन सब को कविता-कहानी-साहित्य-संगीत-कला-सिनेमा का चस्का था और वे एक दूसरे को अपना भाईबन्द मानते थे.
कुछ लिख कर उनमें से कोई एक बीस रुपये कमाता था तो वह अकेले उसकी कमाई नहीं होती थी. उस पर सबका हक़ होता था. एक कुछ अच्छा लिखता था तो सब को लगता था वह उसने लिखा है. उसके लिखे पर भी सब का हक़ होता था. कोई कुछ अच्छा पढ़ता-देखता-सुनता तो उसे सब के साथ शेयर करता. एक दूसरे को लम्बी चिठ्ठियाँ लिखी जातीं, समय कम हुआ तो पोस्टकार्ड डाले जाते और कभी-कभार टेलीफोन. जब भी मिलने का मौक़ा होता तो मिला जाता और वीरेन दा के शब्दों “दो चार जशन भी कभी कभी कुछ धूम धांय” जी जुगत बनाई जाती.
कई मुद्दों पर एक दूसरे से असहमत होने के बावजूद कला-साहित्य के माध्यम से ये दोस्त जीवन का सारा रस चूस लेना चाहते थे और इस काम को मिल कर करने के हिमायती थे. एक दूसरे के जीवन को बेहतर बनाने में लगातार सन्नद्ध वैसी यारी-दोस्ती और वैसी निश्छल मोहब्बतों की आज के नौजवान लेखक कल्पना भी नहीं कर सकते.
गहरी समझ वाली वैश्विक चेतना और दुनिया भर की साहित्य-कला में दिलचस्पी रखने वाले इस ऊर्जावान समूह ने कितने लोगों को जीने की तमीज सिखाई होगी इसकी गिनती मुश्किल है. दोस्तों की मंडली में मंगलेश दा सबसे कम बोलने वाला और सबसे ठहरा हुआ लगता था. सबसे अधिक संकोच और साधारणपन भी उसी के भीतर था. उसके आईटीओ वाले जनसत्ता दफ्तर में सालों-साल बेहिसाब लोग आते थे जहाँ उनकी बात सुनी जाती थी और उन्हें चाय मिलती थी. आदमी में थोड़ी भी संभावना होती तो उसे बेशकीमती सलाहें भी मिलतीं.

ऐसे ही 1989-90 में किसी दिन वीरेन डंगवाल मुझ बाईस साल के छोकरे को उनके उस दफ्तर में लेकर गए. उस पहली मुलाक़ात के बाद मंगलेश दा के साथ बहुत गहरी दोस्ती हुई और जीवन समृद्ध होता चला गया. उन्होंने मुझे दुनिया के तमाम बड़े रचनाकारों से परिचित करवाया. उन्होंने मुझे फर्नान्दो पेसोआ से लेकर येहूदा आमीखाई और अर्नेस्तो कार्देनाल से लेकर एमे सेज़ायर तक की अनगिनत किताबें तोहफे में दीं. उस अमेज़न-पूर्व युग में ऐसी दुर्लभ किताबें मिलना तकरीबन असंभव हुआ करता था.
न जाने कितनी दफा वे मुझे दिल्ली की सिरी फोर्ट जैसी जगहों में होने वाले फिल्म शोज़ में लेकर गए जहां उनकी संगत में कभी ईरानी सिनेमा की धीमी रफ़्तार के तिलिस्म से रूबरू होने का मौक़ा मिला तो कभी ऑस्ट्रेलिया के एबोरिजिनल आदिवासियों की जिन्दगानियों का त्रासद इतिहास मालूम पड़ा. कभी रात-रात बेला टार के सिनेमा गप चलती कभी उस्ताद शास्त्रीय गवैयों के किस्से होते. हमने खूब दावतें भी उड़ाईं.
कुछ साल पहले टेलीफोन पर मेरा उनसे एक विवाद हो गया. हम दोनों पिए हुए थे और मेरी बचकानी हठ के कारण हमारे दरम्यान लंबा अबोला चला. इसी अबोले के बीच एक दिन वे इब्बार रब्बी जी के साथ मेरे घर हल्द्वानी आ पहुंचे. सारा कलुष मिट गया. यह उनका बड़प्पन था. इसकी भी कल्पना करना मुश्किल है.
हाल के बरसों में छोटे-बड़े कई लोगों के साथ पब्लिक प्लेटफार्मों पर उनके विवाद हुए. कुछ ने तो बहुत बदसूरत सूरतें अख्तियार कीं और उनके अनेक शत्रु बन गए. इनमें से किसी ने उन्हें गिरोहबाज कहा तो किसी ने गिरोहबाजों का सरगना. यह बहुत निराश कर देने वाला था. यह और बात है कि अगर कपड़े का पुराना थैला कंधे पर टाँगे दफ्तर जाने वाले, आधी-पौनी जिन्दगी लोकल बसों का सफ़र करने वाले, दुनिया भर की जबानों में अनूदित-पुरस्कृत हो चुके कवि और शास्त्रीय संगीत-सिनेमा के जानकार आदमी को ऐसे नामों से पुकारा जाता हो तो तो हर किसी को ऐसा बदमाश बनने का जतन करना चाहिए.
सच यह है कि मंगलेश डबराल ऐसे ही बहुत सारे शत्रुओं और उससे कई गुना अधिक मित्रों से बने हुए थे. उनका दिया बहुत सारा मैंने अपने भीतर सम्हाला हुआ है जो मेरे खुद के मरने तक बचा रहेगा. इतना तय है.
यकीन नहीं आता उन्हें गए आज पूरे पांच बरस बीत गए!


