पुष्परंजन-
सज्जन व्यक्ति अक्सर शैतानों से घिरा रहता है. नहीं मानेंगे, तो डॉ. मनमोहन सिंह सबसे बड़े उदाहरण हैं. उनके एक मीडिया सलाहकार थे, डॉ. संजय बारू. बौद्धिक बदमाश. अपनी बदमाशियों की वजह से ही चार साल में नप गए. लेकिन संजय बारू ने मनमोहन सिंह पर जो किताब लिखी, क्या उसमें बीजेपी या संघ की कोई भूमिका रही है? ‘ द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ पर बनाई गई फ़िल्म, उसी ‘मास्टर स्ट्रोक’ का हिस्सा थी.
किसे कहें साधु, और किसे शैतान ?
डॉ. मनमोहन सिंह शालीन ज़िंदगी जी गए. बौद्धिक. सादगी पसंद. उनके अंतिम संस्कार तक काफी-कुछ लिखा, और बोला गया. डॉ. मनमोहन सिंह, जिन्हें अपना समझ कर पीएमओ में मीडिया सलाहकार बनाकर ले आये, वैसे डॉ. संजय बारू ने भी उन्हें नहीं बक्शा. उस पल को लोग गाहे-बगाहे याद करते हैं, जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार द्वारा लाए गए एक अध्यादेश को “बकवास” करार देते हुए उसे फाड़कर फेंक दिया था. वही राहुल गांधी, आज डॉ. मनमोहन सिंह को अपना ‘मेंटर-मार्गदर्शक’ बता रहे हैं. उनके लिए स्मारक को मान-अपमान का मुद्दा बना रहे हैं. 8 फरवरी 2017 को राज्यसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान मनमोहन सिंह पर कटाक्ष करते हुए कहा था, कि बाथरूम में रेनकोट पहनकर नहाने की कला तो कोई मनमोहन सिंह जी से सीखे। आज वही पीएम मोदी निगमबोध घाट पर उपस्थित थे. पीएम मोदी ने श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए मनमोहन सिंह के निधन को राष्ट्र के लिए एक बड़ी क्षति बताया, और कहा कि उन्हें एक दयालु इंसान, विद्वान अर्थशास्त्री, और सुधारों के लिए समर्पित नेता के रूप में याद किया जाएगा. भारतीय राजनीति में अजब-गज़ब परिस्थितियां एकबार फिर से प्रस्तुत है.
2004 से 2008 तक मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रहे डॉ. संजय बारू ने ‘ऐक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ नाम से एक किताब लिखी थी, जिसके आधार पर फिल्म बनी। इस फिल्म के ज़रिये बीजेपी ने अपने राजनीतिक निशाने को साधा था. पत्रकार के तौर पर डॉ. संजय बारू बिजनस स्टैंडर्ड के चीफ एडिटर, इकनॉमिक्स टाइम्स, और टाइम्स ऑफ इंडिया के असोसिएट एडिटर रह चुके हैं। उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर डॉ. मनमोहन ने मीडिया सलाहकार बना दिया. संजय बारू को हम ‘एक्सिडेंटल मीडिया एडवाइज़र’ बोलें, तो अनुचित नहीं होगा. मई 2004 से अगस्त 2008 तक संजय बारू के कार्यकाल की सही से समीक्षा की जाए, तो पता चलेगा कि इस शख्स ने मनमोहन सिंह की जड़ों में मट्ठा पटाने का काम अधिक किया. बारू के रहते मीडियाकर्मियों के सम्बन्ध पीएमओ से ख़राब हुए, उसके अनेक उदाहरण मिलेंगे.
डॉ. मनमोहन सिंह ने अपनी पहली विदेश यात्रा जुलाई 2004 में प्रथम बिम्सटेक शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए थाईलैंड की थी। 22 मई 2004 से 26 मई 2014 के बीच बतौर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 72 विदेश यात्राएं कीं, जिनमें संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाग लेने के लिए अमेरिका सहित 46 देशों का दौरा शामिल था। आप इसकी तुलना मोदी के साढ़े दस वर्षों की विदेश यात्राओं से करें, तो बात समझ में आ जाएगी. पीएम मोदी ने दिसंबर 2024 तक, 84 विदेश यात्राएं की हैं, जिनमें यूएन समेत 73 देशों का दौरा शामिल है।
पीएम के दौरे में अमूमन जो मीडिया टीम जाती है, उसका चयन मूलतः प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार के हाथों में ही होता है. केवल 22 मई 2004 से 26 मई 2014 के बीच जो पत्रकार विदेश यात्राओं में पीएम मनमोहन सिंह के साथ गए, उसकी सूची यदि आरटीआई के ज़रिये मिल जाये, आपको हैरान कर देने वाले चेहरे मिलेंगे.
अप्रैल 2006 में डॉ. मनमोहन सिंह जर्मनी की यात्रा पर हनोवर आये थे. उनके साथ कपिल सिब्बल, कमलनाथ, अर्जुन सिंह, अश्विनी कुमार जैसे मंत्रियों ने एक-एक करके मुझे इंटरव्यू दिया था. मगर, डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा अलग से इंटरव्यू न देने की लक्षमण रेखा, पीएमओ ने पहले से तय कर रखी थी. वो केवल साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में चांसलर आंगेला मैर्केल के साथ दो बार मीडिया से मुखातिब हुए थे. जर्मनी से परमाणु पनडुब्बी समझौते को लेकर भारत के दिग्गज पत्रकार एन. राम तक सुनिश्चित थे, कि समझौता हो गया. ‘द हिन्दू’ में उन्होंने ऐसा लिखा भी. लेकिन, तत्कालीन मैर्केल सरकार में ग्रीन पार्टी साझीदार थी, इसलिए जर्मन मीडिया को पता था, कि ग्रीन पार्टी यह डील नहीं होने देगी. इस तरह की चूक जब रिपोर्टिंग में होती है, तो उसकी वजह प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार द्वारा प्रेस टीम को सही से जानकारी नहीं देना ही है.
पत्रकारों में प्रभु चावला, आरती जैरथ और दिवाकर जैसे दिग्गज चेहरे दिखे. लेकिन, बहुतेरे ऐसे पत्रकारों को भी मीडिया सलाहकार संजय बारू दिल्ली से ढोकर ले आये थे, जिनमें से अधिकांश की दिलचस्पी शॉपिंग, और ख़ुसूसन हनोवर के रेड लाईट एरिया “राइटवाल श्ट्राशे” में जाने की थी. चुनांचे, शाम का प्रोग्राम वहीं का बना. वहां एक ऐसे क्लब की इंट्री फ़ीस पीएमओ ने ही दी, जहाँ सुरा-सुंदरी का पूरा इंतज़ाम था, और रति क्रीड़ा के विभिन्न पोजिशंस का डेमो हो रहा था. पीआईबी की एक अधिकारी भावना की विवशता थी, या शौक़, मगर वहां के पूरे कार्यक्रम में पत्रकार बंधुओं का ध्यान उनकी उपस्थिति में रखा गया. अपने शासन प्रमुखों के साथ फॉरेन मीडिया टीम दिल्ली भी आती है, लेकिन इस तरह की भूख-प्यास शायद ही देखने को मिले. क्या डॉ. मनमोहन सिंह के संज्ञान में था कि भारत के टैक्स पेयर्स के पैसे का “सदुपयोग” हनोवर के रेड लाईट एरिया में हुआ है, या सबकुछ उनके मीडिया सलाहकार ही तय कर रहे थे?
‘ द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ किताब प्रकाशित करवा कर सियासी भूचाल लाने वाले संजय बारू ने कभी खुद की कमियों को उजागर नहीं किया. इस पुस्तक के प्रकाशन में बीजेपी की दिलचस्पी क्यों थी, उसके बारे में संजय बारू ही बेहतर बता सकते हैं. अपनी किताब में संजय बारू ने लिखा है- “पीएमओ में तैनात रहे मेरे पूर्ववर्ती लोगों ने अपने कार्यकाल के दौरान की यादों को कभी किताब की शक्ल देने की कोशिश नहीं की. यहां तक कि कई प्रतिष्ठित पत्रकारों ने भी यह पहल नहीं की. मसलन, कुलदीप नैयर, बीजी वर्गीज, प्रेम शंकर झा, एचके दुआ जैसे नामी पत्रकार कई प्रधानमंत्रियों के साथ काम कर चुके थे. प्रेस सचिव ही नहीं, मातहत अफसरों ने भी ऐसी कोई किताब नहीं लिखी, जिससे उनके बॉस के व्यक्तित्व और राजनीति की झलक मिले. जबकि भारत की तुलना में अमेरिका और ब्रिटेन के कई प्रेस सचिवों ने वहां के राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्री के कार्यकाल के बारे में स्वतंत्र रूप से किताबें लिखीं हैं.”
संजय बारू कहते हैं, ” 2012 के अंत तक मैने तय किया कि मै कोई किताब नहीं लिखूंगा. मगर पेंग्विन बुक्स इंडिया के चिकी सरकार और कामिनी महादेवन ने मेरे दृढ निश्चय को बदल दिया. मेरा मानना था कि एक नेता, या तो प्रशंसा का पात्र हो, या फिर घृणा का, मगर उपहास का पात्र नहीं बनना चाहिए.” संजय बारू ने लिखा, कि जब मैने 2008 में पीएमओ छोड़ा, तब मीडिया उन्हें ‘सिंह इज किंग’ कहती थी. चार साल बाद एक न्यूज मैग्जीन ने सिंग इज सिन’किंग’ कहा. यह तेजी से गिरती छवि का प्रमाण था.
संजय बारू लिखते हैं- “मनमोहन सिंह ने कई गलतियां की, मुझे इस किताब में उसका उल्लेख करने में झिझक नहीं है. पहले कार्यकाल ठीक रहा, मगर दूसरा कार्यकाल वित्तीय घोटालों और बुरी खबरों से भरा रहा. उन्होंने राजनीति पर से नियंत्रण भी खो दिया. पीएमओ असरहीन हो गया.”
यानी, जबतक संजय बारू डॉ. मनमोहन सिंह के साथ रहे, पीएमओ सही चल रहा था. उनके जाने के बाद, पीएमओ वित्तीय घोटालों में ग़र्क़ हो गया था.
अगस्त 2004 में जर्मन ब्रॉडकास्टर ‘डॉयचेवेले’ की हिंदी सेवा के चालीस साल पूरे हो रहे थे. उसकी स्मारिका प्रकाशित करने की ज़िम्मेदारी मुझे मिली. तय हुआ, कि दोनों देशों के शासन प्रमुखों से सन्देश मंगा लिये जाएँ. उस समय ग्रेहार्ड श्रोएडर जर्मनी के चांसलर थे. मैंने अनुरोध मेल किया. एक हफ्ते में जर्मन चांसलर ग्रेहार्ड श्रोएडर का शुभकामना सन्देश आ भी गया. इस बीच मैंने दिल्ली, प्रधानमंत्री कार्यालय में प्रिंसिपल सेक्रेटरी टीकेए नायर से बात की. उनकी तरफ से हाँ थी. लेकिन, दूसरे दिन टीकेए नायर का सन्देश आया, कि आप संजय बारू से बात कर लो.
मुझे इस बात की खुशफहमी थी, कि संजय बारू जेएनयू में मेरे सीनियर रहे हैं, इसलिए कोई दिक़्क़त दरपेश नहीं होगी. संजय बारू ने पहले हाँ की, लेकिन पूरे दस दिन फोन पर टरकाते रहे. और अंत में भेजा वैसा सन्देश, जो पीएम मनमोहन सिंह के हवाले से संजय बारू के खुद के नाम से था. स्मारिका प्रकाशन की डेड लाइन सामने थी, मेरे लिये यह दुविधा वाली स्थिति थी, कि जर्मन चांसलर के मैसेज के सामने भारतीय पीएम के प्रेस सलाहकार का सन्देश कैसे रखें? यह कूटनीति की दृष्टि से असमान, और अपमानजनक स्थिति थी, जिसे संजय बारू जैसे दुष्ट व्यक्ति ने खड़ा कर दिया था. फिर, पेज के सबसे आखिर में मैंने संजय बारू का सन्देश डाला. ” शठे शाठ्यं समाचरेत्”, यही एक मार्ग बचा था मेरे लिये. डॉ. संजय बारू अपनी हरकतों की वजह से चार साल में ही नप गए, वरना, डॉ. मनमोहन सिंह 2014 तक उन्हें अपने साथ रखते.
हालाँकि, डॉ. मनमोहन सिंह ने अपने दूसरे कार्यकाल के आखिरी वक़्त बुलाये प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्वीकार किया था, कि उनके कालखंड में कुछ “फाइनेंशियल इरेग्युलरिटीज़” भी हुई थी. 1984 के सिख विरोधी दंगों के लिए मनमोहन सिंह की माफी राजनीतिक साहस का एक दुर्लभ क्षण था. उन्होंने कांग्रेस के शासनकाल के दौरान सिख समुदाय को दिए गए घावों पर मरहम लगाने का प्रयास किया था। क्या प्रधानमंत्री मोदी ऐसा स्वीकार कर पाएंगे? मोदी और मनमोहन सिंह में यही बुनियादी फ़र्क़ है. भारत जैसे विराट देश का प्रधानमंत्री कैसा हो? मोदी जैसा मुखर, आक्रामक, ‘किलर स्टिन्क्ट ‘ , अपनी ग़लतियाँ नहीं स्वीकार करने वाला हो, या कि मनमोहन सिंह जैसा ‘मौनी बाबा’, सहनशील, सादगी पसंद, व आर्थिक सुधारों वाला हो? यह सवाल सबके समक्ष है.
आप मनमोहन सिंह के लिए स्मारक- म्यूज़ियम बनायें, न बनायें, क्या फ़र्क़ पड़ता है? राजघाट बनाने की ख्वाहिश बापू ने भी कभी नहीं व्यक्त की थी, न ही मनमोहन सिंह ने ख़ुद के लिए स्मारक की. लेकिन, जिन्हें इनके नाम से राजनीति करनी है, वो कहाँ से बाज़ आने वाले? अब संसद भी शायराना नोंक-झोंक को तरसेगी- “ तू मेरा शौक देख, मेरा इंतजार देख.” पंद्रहवीं लोकसभा में मनमोहन सिंह पीएम थे. भाजपा पर निशाना साधते हुए मिर्ज़ा ग़ालिब का मशहूर शेर पढ़ा था, ‘‘हम को उनसे वफा की है उम्मीद, जो नहीं जानते वफा क्या है.’’ इसपर बीजेपी नेता सुषमा स्वराज ने शायराना अंदाज़ में ही जवाब देते हुए कहा, “तू इधर उधर की न बात कर, ये बता कि काफिला क्यों लुटा.” अब न सुषमा स्वराज हैं, और न ही मनमोहन सिंह !


