सुमित सुभाष गुप्ता-
दैनिक भास्कर राजसमंद ब्यूरो के साथी मनोज शर्मा का शनिवार को ह्रदयघात से अल्पायु में निधन हो गया। कोरोना के बाद से एक के बाद एक लगातार ये खबरें हिम्मत तोड़ दे रही हैं… बेहद दुःखद… ईश्वर पुण्य आत्मा को शांति प्रदान करे… विनम्र श्रद्धांजलि!

श्रीपाल शक्तावत-
पत्रकार मनोज पुरबिया उर्फ़ मनोज शर्मा नहीं रहे. हार्ट अटैक आया था , नहीं बचे. उनका बेटा बमुश्किल 4- 5 साल का होगा.
सब कुछ फिल्मी दृश्य की तरह घूम गया.
मैंने नेटवर्क 18 ज्वॉइन किया तब मनोज कंट्रोल रूम में थे.खबर अपडेट करते थे. एक दिन रिसेप्शन पर टकरा गए.बोले -सर कुछ बात करनी थी.साथ ही अंदर ले आया .बोले – मैं भी फील्ड में जाना चाहता हूं ,रिपोर्टिंग के लिए. साथी संपादक Navin Jaiswal जी से बात कर रास्ता निकाला गया . नाइट शिफ्ट में कंट्रोल रूम के साथ -साथ क्राइम रिपोर्टिंग पर जाने लगे.
कोंफिडेंश आया तो जोधपुर ब्यूरो फिर जयपुर में रिपोर्टिंग करने लगे.गलतियां हुई.भरोसे में एक आध दफा इस्तेमाल हुए.मामला रिलायंस फाउंडेशन में शिकायत के रूप में पहुंचा तो उनके चेहरे पर घबराहट थी और मेरे मन में चिंता लेकिन उनकी रिपोर्टिंग में कोई गलत इंटेंशन नहीं था सो ज्यादा कुछ नहीं हुआ.
राजनीतिक दबावों के बीच ब्यूरो कम करने ,छंटनी के प्रेशर आए तो हमारी तबादले के साथ हैदराबाद की टिकिट हुई और मनोज नौकरी से बाहर हो गए . जूनून के साथ काम करने वालों के लिए नौकरी जाना दो तरह से सदमे देता है.एक मंच और मौके हाथ से निकलते हैं ,दूसरा चूल्हे -चौके के खर्च के संकट.
विदा होते वक्त न उनमें रूबरू होने की हिम्मत थी, न मुझमें . आपके साथी रोजगार से बाहर हों और आप बचाने में अक्षम/असहाय हों तो स्थिति विकट होती है.
हंसते हुए फोन पर बोले – ‘ सर,आपने भरोसा किया और मैंने काम.मेरे लिए ये ही काफी है .अब राजसमंद से ही कुछ करूंगा परिवार के बीच रहकर. बस आशीर्वाद बनाए रखना.’
वह राजसमंद चले गए और मैं हैदराबाद.फिर वह राजसमंद की तत्कालीन सांसद दिया कुमारी की टीम का हिस्सा बने .जब तब बात होती रही. कुछ महीनों पहले दैनिक भास्कर से जुड़े तो लगा जिंदगी पटरी पर लौट आई है .बीवी -बच्चे , मां -बाप के साथ रहने और पसंदीदा काम के साथ अपने शहर में होने का सुकून उनकी बातचीत में दिखने लगा था.लेकिन अंदर ही अंदर कुछ खत्म हो रहा है उसका अंदाज तभी लगा जब हार्ट अटैक ने उनकी जान ले ली.
पत्रकारिता में असुरक्षा , नित रोज के तनाव ,सियासी दबाव ,परिवार की जरूरतें और खुद को फील्ड में जिंदा रखने की जिद न जाने कितने पत्रकारों को अंदर ही अंदर मार रही है.
कोई चल बसा तो कोई जाने की कतार में हैं. रिटर्न टिकिट सभी की है लेकिन वेटिंग और आरएसी इतनी जल्दी कन्फर्म हो रही है कि हर दिन किसी मनोज को खो देने का डर अंदर तक हिला देता है. भगवान दिवंगत आत्मा को शांति और परिवार को हिम्मत दे .
नमन!


