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सियासत

घरों को बर्बाद करता सट्टा

रजनीश कपूर-

चुनावी मौसम हो या कोई टूर्नामेंट, सटोरियों की हमेशा मौज ही रहती है। इस आधुनिक जुए के खेल ने अपनी गिरफ़्त में करोड़ों घर बर्बाद किए हैं। आए दिन अख़बारों में खबर छपती हैं कि किसी ने सट्टे में हारी हुई रक़म न अदा कर पाने के चलते या तो अपनी ज़मीन, वाहन या ज़ेवर बेच दिये या परिवार सहित आत्महत्या कर ली। सवाल उठता है कि सीधे-सादे लोग जो मेहनत कर अपना घर, चूल्हा-चौका चला रहे होते हैं उन्हें सट्टे की आदत कैसे पड़ती है? दूसरों की बर्बादी देखने के बावजूद सट्टेबाज़ी इतनी लोकप्रिय क्यों हो रही है? मशहूर खिलाड़ी और अभिनेता इस खेल के बदले हुए स्वरूप ‘गेमिंग ऐप’ के लिए विज्ञापन कर बेक़सूर लोगों को क्यों इस चक्रव्यूह में फँसा रहे हैं? क्या इसके लिए सूचना क्रांति को ज़िम्मेदार ठहराया जाए?

जब कभी क्रिकेट, फुटबॉल या अन्य किसी लोकप्रिय खेल के टूर्नामेंट की धूम मचती है वैसे ही सट्टा बाज़ार भी अपने पाँव पसार लेता है। आधुनिकता के चलते ऐसे कई गेमिंग ऐप सामने आ चुके हैं जो लुभावने विज्ञापन बना कर सीधे-सादे लोगों को इस काले कारोबार के मायाजाल में फँसा लेते हैं। शुरुआत में एक छोटी सी जीत ही काफ़ी होती है किसी को इस जाल में आसानी फँसाने के लिए। मिसाल के तौर पर यदि कोई व्यक्ति किसी मित्र या जानकार को जीतता हुआ देखता है तो उत्सुकतावश वो भी एक छोटी सी रक़म किसी खिलाड़ी या टीम पर लगा देता है। यदि मित्र की सलाह काम कर जाए और बताई गई टीम या खिलाड़ी पर लगी बाज़ी जीत में बदल जाती है तो लगता है कि बिना कुछ परिश्रम किए घर बैठे ही पैसे कमा लिए। बस इतना ही काफ़ी होता है सट्टे की लत लगने के लिये।

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ऐसा ही कुछ होता है चुनावों के नतीजों के अनुमानों को लेकर। जैसे ही चुनाव संपन्न हो जाते हैं सट्टा बाज़ार गर्म होना शुरू हो जाता है। कभी-कभी तो कई चरणों में संपन्न होने वाले चुनावों को सट्टा बाज़ार के भाव और उससे संबंधित खबरें प्रभावित भी करने का काम करते हैं। ऐसे में कभी-कभी चुनावी उम्मीदवारों और राजनैतिक पार्टी का समर्थन करने वाले भी इस पशोपेश में हो जाते हैं कि कहीं उनके द्वारा दिया गया मत ज़ाया तो नहीं गया? परंतु चुनावों में ऐसा नहीं होता कि चुनावी नतीजों को सट्टा बाज़ार नियंत्रित करे। चुनावों में जिस भी पार्टी या उम्मीदवार की हवा होती है वही विजयी होता है क्योंकि उसके काम को ही जनता का समर्थन मिलता है। सट्टा बाज़ार के आँकलन को तो केवल मनोरंजन की दृष्टि से देखना चाहिए। अभी तक ऐसा कोई भी उदाहरण नहीं मिला है जहां सट्टा बाज़ार ने चुनावी नतीजों को प्रभावित कर उन्हें बदल दिया हो।

वहीं अगर खेलों की बात करें तो ज्यादातर सट्टेबाजी अंडरवर्ल्ड के माफियाओं द्वारा संचालित होती है। वो किसी न किसी रूप में खेल और खिलाड़ियों दोनों को अपने तरीके से प्रभावित करने की कोशिश में लगे रहते हैं। वो अपने फायदे में मैचों को फिक्स कराना भी चाहते हैं। उनके द्वारा खिलाड़ियों को फांसने की कोशिश भी की जाती है। ऐसे कई उदाहरण सामने आए हैं जब कोई खिलाड़ी उनके जाल में नहीं फँसना चाहता तो उन्हें धमकियां भी मिली हैं। पिछले कुछ बरसों में एशियाई मुल्कों में मैच फिक्सिंग और स्पाट फिक्सिंग की घटनाएं भी बढ़ी हैं।

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ऐसा नहीं है कि जाँच एजेंसियों के पास इस ख़तरनाक खेल की कोई जानकारी नहीं है। पिछले दिनों कई गेमिंग ऐप की शिकायतें मिलने पर जाँच एजेंसियों ने कड़ी कार्यवाही भी की। परंतु इन गोरखधंधों को चलाने वाले कभी पकड़े नहीं जाते। केवल उनके प्यादे ही बलि का बकरा बनते हैं। एक अनुमान के तहत भारत का सट्टा बाजार करीब तीन लाख करोड़ या इससे अधिक रकम का है। क्रिकेट के खेल को ही लें तो इस खेल में सट्टेबाजी का धंधा हर मैच पर करीब दो सौ करोड़ रुपए का है। परंतु अघोषित तौर पर ये आंकड़ा सात सौ करोड़ रुपए का बताया जाता है। सट्टेबाजी के गैरकानूनी माफिया सिंडिकेट, आधुनिक मैच फिक्सर्स क्रिकेट में अपने पैर जमा चुके हैं। कारोबार इतने सुव्यवस्थित तरीके से चलता है कि कोई सोच भी नहीं सकता।

परंतु इस गोरखधंधे में हारने वाले मासूम लोग यह नहीं जानते कि लालच के चलते जल्दी ज़्यादा पैसा कमाने के चक्कर में वे अपने बाप-दादा की मेहनत से बनाई हुई ज़मीन जायदाद को गिरवी या बेचने में क्षण बाहर भी नहीं लगाते। बहकावे में आकर जब यह सट्टा हार जाते हैं तो या तो मज़दूरी करने को मजबूर हो जाते हैं या आत्महत्या कर लेते हैं। सोचने वाली बात है कि सट्टे या जुए के खेल में कोई हारता है तो कोई जीतता है। परंतु सट्टा खिलाने वालों का घर हमेशा भरा रहता है। सट्टा चलाने वाले माफिया अपने प्यादों की मदद से मासूमों को फँसाते हैं और अपने धंधे को बढ़ाते हैं। परंतु एक बात इस खेल में एक बात अहम है कि ‘सट्टे की जीत बुरी है’। क्योंकि सट्टे की जीत ही है जो उसकी लत लगाती है, यदि कोई सट्टे के शुरुआती दौर में हारने लग जाए तो वो सचेत हो जाएगा और आगे नहीं खेलेगा। इसलिए सट्टे की यह कड़वी सच्चाई जानने के बाद जहां तक हो सके सट्टे से बच कर रहें और बर्बादी की ओर न जाएँ।

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लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के प्रबंधकीय संपादक हैं।

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