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सुख-दुख

तस्वीर में दिख रहे दूसरे शख्स के निधन पर मयंक ने उस दिन कुछ ऐसा ही लिखा था

अनुराग अनंत-

यंक सक्सेना आंदोनल के आदमी थे। रचना और संघर्ष के पाँव पर खड़े रीढ़ की हड्डी वाले आदमी। अपनी पहचान के लिए कसकते और पूरी जीवटता से उसके लिए लड़ते-भिड़ते। कुछ करने, कुछ बेहतर करने, अपने विचार को कहने और उसके खतरे उठाने वाले आदमी।

मेरी कभी व्यक्तिगत मुलाक़ात नहीं थी पर परिचय था। उनके काम को देखता रहा। गीतों को, खबरों को, पत्रकारिता में उनके प्रयासों को, विवादों-आंदोलनों को, देखता पढ़ता, जानता रहा। अभी कुछ दिन पहले रवि राव भइया के यहाँ उनका जिक्र हुआ तो भइया ने उन्हें फोन लगा दिया। बात हुई और उन्होंने भइया से कहा जल्दी मिलेंगे। कभी कभी जल्दी का मतलब कभी नहीं होता है। अब मयंक सक्सेना कभी नहीं मिलेंगे।

एकदम स्वस्थ प्रतीत होता आदमी ऐसे छोड़ जाएगा कभी सोचा भी नहीं था और सोचना पड़ रहा है तो यह कितना भयानक है शब्द नहीं है। पता चला कि कल सीने में दर्द की शिकायत के बाद सफ़दरगंज अस्पताल में डॉक्टर को दिखाने गए और वहीं पर्चा लेते-लेते हार्ट अटैक आया और बस सब झंझट, सब परेशानी, सब उलझन छोड़कर चले गए। दुःखद है ये। डरावना है ये। ये कोई उम्र नहीं है जाने की। ये कोई तरीका नहीं है जाने का।

अलविदा मयंक सक्सेना। बस इतना ही कहना है। बस इतना ही कह सकूँगा।

तस्वीर में दिख रहे दूसरे व्यक्ति चंडीदत्त शुक्ल हैं। एक दिन उनके जाने की ख़बर भी ऐसे ही मिली थी। उस दिन मयंक ने ये तस्वीर साझा करते हुए कुछ ऐसी ही पोस्ट लिखी थी।

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