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मीडिया में आए नए लोगों के लिए स्टिंग और ब्लैकमेलिंग वाली पत्रकारिता बन गई है मजबूरी!

Sanjaya Kumar Singh : नए पत्रकारों के लिए क्या करें, क्या नहीं… जानना जरूरी… फरीदाबाद में पत्रकार पूजा तिवारी की मौत के मामले में कहा जा रहा है कि ब्लैकमेलिंग का आरोप लगने के बाद वह अवसाद में थी और इसीलिए उसने आत्महत्या कर ली। आत्महत्या कर लेने से ब्लैकमेलिंग का मामला कम नहीं होता पर जिस ढंग से उसके अलग-थलग पड़ जाने के मामले सामने आ रहे हैं उसमें क्या यह जरूरी नहीं है कि मीडिया संस्थान स्टिंग (जोखिम वाली रिपोर्टिंग) करने करवाने के बारे में अपने नियम बनाए और घोषित करे। क्या इसमें सरकार और समाज की कोई भूमिका नहीं है। अव्वल तो मेरा मानना है कि गर्भधारण पूर्व एवं प्रसव पूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन प्रतिषेध) अधिनियम, 1994 ही बेजरूरत है और एक तरफ इसका अपेक्षित लाभ नजर नहीं आ रहा है तो दूसरी तरफ इसके दुरुपयोग के कई मामले हैं।

Sanjaya Kumar Singh : नए पत्रकारों के लिए क्या करें, क्या नहीं… जानना जरूरी… फरीदाबाद में पत्रकार पूजा तिवारी की मौत के मामले में कहा जा रहा है कि ब्लैकमेलिंग का आरोप लगने के बाद वह अवसाद में थी और इसीलिए उसने आत्महत्या कर ली। आत्महत्या कर लेने से ब्लैकमेलिंग का मामला कम नहीं होता पर जिस ढंग से उसके अलग-थलग पड़ जाने के मामले सामने आ रहे हैं उसमें क्या यह जरूरी नहीं है कि मीडिया संस्थान स्टिंग (जोखिम वाली रिपोर्टिंग) करने करवाने के बारे में अपने नियम बनाए और घोषित करे। क्या इसमें सरकार और समाज की कोई भूमिका नहीं है। अव्वल तो मेरा मानना है कि गर्भधारण पूर्व एवं प्रसव पूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन प्रतिषेध) अधिनियम, 1994 ही बेजरूरत है और एक तरफ इसका अपेक्षित लाभ नजर नहीं आ रहा है तो दूसरी तरफ इसके दुरुपयोग के कई मामले हैं।

ऐसे कुछ और कानून हैं जिनका उपयोग कम, दुरुपयोग ज्यादा होता है। इसलिए नए पत्रकारों को ऐसे मामलों में काम करने से पूर्व सतर्क रहना चाहिए और पढ़ाई के दौरान उन्हें इन बातों की भी जानकारी दी जानी चाहिए। पर पत्रकारिता के धंधे में पैसे नहीं होने के कारण जो लोग पत्रकारिता पढ़ाकर अपना परिवार चला रहे हैं, वे इन बुराइयों को क्योंकर बताने लगे। इसका नतीजा यह है कि पत्रकारिता ‘पढ़’ कर इस पेशे में आने वालों को भी इस पेशे की बुराइयों, खतरों और जोखिमों की जानकारी लगभग नहीं होती है। निश्चित रूप से इसका कारण यह है कि पत्रकारिता का कोई निश्चित पाठ्यक्रम ही निर्धारित नहीं है। इसके नुकसान ही हैं। पर नुकसान झेलने वाला इस धंधे में फंसने के बाद पुराने लोगों की नाराजगी नहीं लेना चाहेगा और पुराने लोग अपने धंधे का नुकसान क्यों करें। वह भी तब जब कोई विकल्प नहीं है। ऐसे में नए आने वाले पत्रकार दिशाहीन और लक्ष्य हीन हैं। पत्रकारिता से समाज सुधारने के सपने लेकर इस पेशे में आया युवा समाज की बुराइयों का शिकार हो जाए यह कम अफसोसनाक नहीं है।

मेरा मानना है कि मीडिया को जानने वाले पुराने लोगों की यह जिम्मेदारी है कि वे नए पत्रकारों के लिए – क्या करें और क्या नहीं तैयार करें जिसमें उन्हें ऐसी स्टोरी करने से बचने की सलाह दी जानी चाहिए। हो सकता है पूजा से यह स्टोरी वसूली के लिए ही कराई गई हो और उसका उपयोग किया गया हो। यह अलग बात है कि कामयाबी नहीं मिली और उसे आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़ा या उसकी हत्या कर दी गई। भविष्य में पूजा जैसों को इससे बचाने के लिए यह काम कैसे किया जा सकता है, इस पर विचार होना चाहिए। पत्रकारिता की पढ़ाई कराने वाले कुकरमुत्ते की तरह उग आए मीडिया शिक्षण संस्थान लाखों रुपए की फीस लेते हैं जबकि शुरुआती नौकरी 10 हजार रुपए महीने की भी मुश्किल से मिलती है। ऐसे में नए लोगों के लिए स्टिंग और ब्लैकमेलिंग वाली पत्रकारिता बहुत आसान और मजबूरी भी है। खासकर तब जब मीडिया संस्थानों पर भी ऐसा करने का आरोप हो। इसमें कौन किसका उपयोग करेगा और कौन फंस जाएगा यह सुनिश्चित करना वैसे भी मुश्किल है।

अंशकालिक संवाददाता से स्टिंग कराने में मीडिया संस्थान को लाभ ही लाभ है जबकि संवाददाता को अक्सर नाम या श्रेय भी नहीं मिलता है। स्टोरी हिट होती है तो चैनल का नाम होता है। नहीं चली या उसमें खामियां हों तो संवाददाता बदनाम होता है। कोई एफआईआर हो जाए, जिसके खिलाफ स्टोरी की जाए, वह मोर्चा खोल ले तो मीडिया संस्थान हाथ झाड़ ले और सीधे कह दे कि संबंधित व्यक्ति हमारा संवाददाता ही नहीं है। कोई खतरा जोखिम हो तो उसकी भरपाई नहीं ही होनी है। दूसरी ओर, मीडिया में स्टिंग का उपयोग खूब हो रहा है। जो प्रसारित हो रहे हैं वही कम नहीं हैं, जिन्हें प्रसारित नहीं करके सौदा कर लिया गया, उसकी संख्या भी कम नहीं होगी।

इसलिए जरूरी है कि मीडिया में नए आने वालों को पूरे मामले की जानकारी दी जाए। भावी पीढ़ी के लिए कुछ करना जरूरी है। मीडिया में काम करते हुए कई बार मनुष्य की संवेदनाएं वैसे भी कम हो जाती हैं। ऐसे में मीडिया मालिकों को अपने कर्मचारियों के मरने, बीमार होने और अवसाद में चले जाने की चिन्ता नहीं है तो यह काम समाज को करना होगा। समाज अभी तक मीडिया ट्रायल से ही परेशान है पर अभी की स्थिति यह है कि प्रधानमंत्री भी मीडिया ट्रायल के शिकार हैं। बात-बात पर ट्वीट करने वाले प्रधानमंत्री अपनी डिग्री के मामले में चुप हैं तो दूसरी ओर, तरह-तरह की खबरें छप रही हैं। भिन्न कारणों से प्रधानमंत्री को इसकी परवाह नहीं है तो आम आदमी परवाह करके भी क्या कर पाएगा। यह भी विचारणीय है।

जनसत्ता अखबार में लंबे समय तक वरिष्ठ पद पर रहे वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से. इस स्टेटस पर पत्रकार प्रतिमा का पठनीय कमेंट इस प्रकार है….

Pratima Rakesh देहरादून के अल्पकालिक अनुभव के आधार पर आपकी बात अक्षरशः प्रामाणिक मानती हूँ ! मैंने ड्रग्स पर एक स्टोरी किया पल्टनबाजार से लेकर राजपुर रोड तक ड्रग पैडलर्स का पीछा करते हुए तंग गली के मुहाने तक पहुँची! सरकारी नेम्पेलेट न लगी होती (प्राइवेट गाड़ी पर) तो जाने क्या होता. लेकिन संथानीय संपादक जी ने जो तीन नशीली चीज़ें मैं ले आई थी, अपने एक प्रिय संवाददाता के साथ गड़प करते हुए कहा- अरे मैडम क्यों खामखां रिस्क लेती हैं.. और मेरी सारी मेहनत मिट्टी में तो नहीं, स्थानीय सम्पादक जी के पेट में चली गई…! No evidence to prove!

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