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अदाणी के लिए फिक्रमंद मोदी सरकार ने राज्यों का हेल्थ बजट घटाया, हिंदी अखबारों से गायब अस्पतालों का हाल!

जितेंद्र कुमार-

इस तरह की खबरें आपको अभी और देखने को मिलेंगी. दिखनी भी चाहिए क्योंकि अगर मरीजों को इतनी परेशानी हो रही है, इतनी देर हो रही है तब तो यह खबर बड़ी है. लेकिन आपको यह खबर किसी हिन्दी अखबारों में नहीं दिखेगी कि मोदी और राज्यों में भाजपा की सभी सरकारों ने स्वास्थ्य बजट में बेवजह कटौती किया है.

यह तब है जब जनसंख्या बढ़ रही है, उम्र बढ़ रही है तो स्वास्थ्य सेवा पर बजट व खर्च बढ़ाने की जरूरत है. आखिर एम्स जैसे संस्थानों में ऐसी स्थिति तो इसलिए पैदा हुई क्योंकि सरकार ने आने वाले मरीजों के अनुपात में व्यवस्था और खर्च नहीं किया है? लेकिन इस तरह की खबरें या विश्लेषण हिन्दी अखबारों में नहीं छापा जाता है. अखबारों की बेहयाई, संपादकों का दलाल होना और सरकार का मीडिया पर दवाब, जो भी हो हिन्दी अखबार अपने ग्राहकों के साथ अन्याय कर रहा है.

लेकिन वही अखबार अडाणी के उस विज्ञापन को छापने में उदारता बरतता है कि कैसे वह स्वास्थ्य सेवा में प्रवेश कर गया है.

इसलिए उस खबर और नीचे दिए विज्ञापन को एक साथ मिलाकर पढ़िए, पूरी बातें साफ हो जाएगी कि ऐसा क्यों हो रहा है? हो सकता है कि नरेन्द्र मोदी अपने मित्र अदाणी को इस बार कई-कई बड़े व प्रतिष्ठित सरकारी अस्पतालों को तोहफा में यही सौगात देना चाह रहे हों!

सरकारी अस्पतालों को बदनाम व अराजक साबित नहीं करेगा तो जनता नाराज भी हो सकती है न? वैसे मीडिया और मोदी से जनता नाराज कहां होती है!

अदाणी का हेल्थ सेक्टर में प्रवेश…

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