विजय सिंह ठकुराय-
क्या आपको पता है कि भारत के झारखंड राज्य में कोयले के सबसे बड़े भंडार हैं, फिर भी इसी स्टेट में एक ऐसा कोयला-बिजली संयंत्र है, जिसकी खपत के लिए कोयला 9000 किमी दूर ऑस्ट्रेलिया से आता है, धामरा बंदरगाह पर उतरता है, फिर 600 किमी के रेलवे ट्रैक से गोड्डा शहर में पहुंचाया जाता है। आखिर क्यों?
पीएम बनने के बाद हमारे महात्मा जी ने अगले ही वर्ष बांग्लादेश का दौरा किया था और शेख हसीना से बात कर अपने “खास दोस्त” के कोयला बिजली पॉवर प्लांट से बिजली निर्यात का सौदा पटवाया था। फिर गोड्डा में दोस्त जी ने प्लांट लगाया, जिसके अल्ट्रा-क्रिटिकल तकनीक पर आधारित होने के कारण कम राख और हाई कैलोरिफिक वैल्यू वाले कोयले की आपूर्ति के लिए दोस्त को ऑस्ट्रेलिया में कारमाइकल खदान दिलवाई गयी।
तत्कालीन नियमों के अनुसार भारत की कोई कंपनी तभी बिजली निर्यात कर सकती थी, जब उसका उत्पादन सरप्लस में हो। सौदे के समय दोस्त जी इस स्लैब में नहीं थे पर फिर भी उन्हें विशेष छूट दी गयी। एक नियम यह भी था कि 25% बिजली घरेलू उपभोक्ताओं के लिए खर्च की जाएगी पर झारखंड भाजपा सरकार ने नियमों में बदलाव कर दोस्त जी को 100% बिजली निर्यात करने की छूट दे दी। उसके बाद तमाम पर्यावरण कारणों को ताक पर रख कर पानी आपूर्ति के लिए चिरु नदी की बजाय 100 किमी दूर से गंगा नदी तक पाइपलाइन बिछाने की अनुमति दी गयी।
अब ऑस्ट्रेलिया से कोयला आएगा तो जाहिर सी बात है कि बिजली की लागत बढ़ेगी। इससे बचने के लिए दोस्त की कंपनी को “विशेष आर्थिक क्षेत्र” अर्थात SEZ का दर्जा देकर कस्टम, जीएसटी, कार्बन टैक्स, अलाना टैक्स, फलाना टैक्स इत्यादि माफ किये गए। 5 साल के लिए आयकर से 100% छूट। मोटा-माटी दोस्त जी को एक अरब डॉलर की सरकारी रियायत प्रदान की गई।
अब दोस्त जी की चतुराई देखिए। दोस्त जी बांग्लादेश को बिजली भुगतान का जो बिल थमाते हैं, उसमें वे तमाम टैक्स वसूले जाते हैं, जिनकी रियायत वे भारत सरकार से प्राप्त कर रहे हैं। कुल मिलाकर अन्य कंपनियों के मुकाबले बांग्लादेश को दोस्त जी से खरीदी गई बिजली 27 से 63 परसेंट महंगी पड़ती है। दोस्त जी चालाक इतने हैं कि शेख हसीना से पहले ही 25 साल का एग्रीमेंट करवा लिए थे कि कैपेसिटी चार्ज के नाम पर हर साल 4 हजार करोड़, मतलब 25 साल में एक लाख करोड़ दोस्त जी वसूलेंगे ही वसूलेंगे, भले ही इस दौरान कोई बिजली न खरीदी जाए।

ठीक है, दोस्त तरक्की करें, अच्छी बात है पर कुछ नियम-कायदा-समाज देखना पड़ता है। आज बांग्लादेश में इस परियोजना की समीक्षा कर इसे रद्द किए जाने की मांग उठ रही है। शेख हसीना के खिलाफ जब बगावत हुई तो विद्रोह के कई कारणों में एक बड़ा कारण “दोस्त जी की बिजली परियोजना” भी थी, जिसके आधार पर शेख हसीना पर विदेशी कंपनियों को अनुचित लाभ पहुंचाने के आरोप लगे। तख्तापलट पलट हुआ। भारत विरोधी स्वर गूंजे। प्रतिशोध के नाम पर तमाम हिंदुओं को प्रताड़ित किया गया।
अब हिंदुओं के लिए तो महात्मा जी के मुंह से कभी एक शब्द निकला नहीं, अलबत्ता जैसे ही हसीना जी बांग्लादेश छोड़ कर भागी, महात्मा जी को अंदेशा हो गया कि भविष्य में दोस्त की परियोजना खतरे में अवश्य आएगी। इसलिए हसीना के बांग्लादेश छोड़ने के मात्र एक हफ्ते के अंदर भारत सरकार ने अपने नियमों को फिर से बदल कर दोस्त जी को निर्यात करने की बजाय घरेलू खपत की भी अनुमति दे दी। है न कमाल बात?
जगजाहिर है कि वर्तमान सरकार में एक उद्योगपति के लिए तमाम नियम बदल दिए जाते हैं। सरकारी स्तर पर उसे ठेके दिलवाए जाते हैं। वो डूबता है तो सरकारी कंपनियों के तीस हजार करोड़ उसे दिलवाए जाते हैं। आखिर ये विशेष कृपा एक आदमी पर क्यों? चलिए, देश का आदमी तरक्की करे तो अच्छी बात है पर बांग्लादेश से लेकर श्रीलंका, इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और तमाम मुल्क – जहां जहां इस दोस्त ने पांव पसारे हैं, पता करिये कि वे लोग किस तरह भारत विरोध के सुर अलाप रहे हैं। स्थानीय समुदाय, अधिग्रहण, पर्यावरण, कार्बन एमिशन इत्यादि को ताक पर रख कर एक आदमी की जेब भरी जा रही है। भ्रष्टाचार और घूसखोरी के तमाम आरोप लगते रहे हैं। एक फ़ाइल तो अमेरिका में खुली हुई है, जिसमें दोस्त जी पर घूसखोरी और भ्रष्टाचार के पुख्ता सबूत भी हैं। अमेरिका तो वैसे भी जासूसी में महारथी है। न जाने कौन-कौन से राज ट्रंप दबोचे बैठा है। खुल कर “पॉलिटिकल कैरियर खत्म कर देने” जैसी बात एक देश का मुखिया ऐसे ही कह देगा क्या?
तो बेसिकली मैं कहना यह चाहता हूँ कि बार-बार अपमानित होने के बाद भी हमारे महात्मा जी ट्रंप का नाम अपनी जुबान पर नहीं लाते, टोटल सरेंडर किए बैठे हैं, उस गली में जाना ही छोड़ दिये – जहां ट्रंप आ सकता हो तो ये सब ऐवई नहीं है।
हो सकता है कि महात्मा जी दोस्ती का फर्ज निभाते हुए ही चुप हो – उनका पुराना रिकॉर्ड है।
पर एक बात आज तक समझ न आई। एग्रीकल्चर सेक्टर में अमेरिका की एंट्री को लाल झंडी दिखाने और टैरिफ लगने से एक दिन पहले महात्मा जी ने जब पहली और आखिरी बार इस बाबत बयान दिया था तो ये क्यों कहा था कि – मेरा “व्यक्तिगत नुकसान” हो जाएगा?
व्यक्तिगत नुकसान क्या हो सकता है भला? किसी को कोई आईडिया है? मोदी जी भी सोचते होंगे कि ये ट्रंप नाम का राहु मेरी कुंडली मे कहाँ से आ गया। भारत होता तो ससुरे को गायब करवा देता। अमेरिका पर तो जोर चलता नहीं। अगले 3 साल में ये ससुरा ट्रंप न जाने क्या क्या कांड करके जाएगा।
कुणाल शुक्ला-
राष्ट्र सेठ गौतम अदानी के 10 घोटाले : 70 साल पहले अगर कोई कॉरपोरेट्स इतने घोटाले करता तो पीएम से लेकर सीएम तक, सभी अदानी के साथ जेल में ज़िंदगी भर चक्की पीस रहे होते।
ये भारत का 70 साल का इतिहास रहा है और इसीलिए भारत की दुनिया में इज़्ज़त रही। आरएसएस इसी इतिहास को बदलना चाहती है। लेकिन अब यह दुनिया का सबसे बदनाम, सबसे भ्रष्ट, सबसे दब्बू भारत है, जो इन आपराधिक घोटालों को नॉर्मल मानकर चुप बैठा है।
पढ़ें अदानी की लूट का आपराधिक इतिहास-
- केतन पारेख शेयर हेराफेरी घोटाला (1999-2001): अडानी प्रमोटर्स ने केतन पारेख के साथ मिलकर अडानी एंटरप्राइजेज के शेयरों की कीमतों में हेराफेरी की, जिसमें 14 निजी इकाइयों के माध्यम से $75 मिलियन के सर्कुलर ट्रेडिंग शामिल थे। SEBI ने प्रतिबंध लगाया, लेकिन बाद में जुर्माना कर दिया गया। (शेयर हेराफेरी, शेल कंपनियां)
- डायमंड ट्रेडिंग घोटाला (2004-2006): राजेश अडानी और समीर वोरा ने UAE, सिंगापुर और हॉन्गकॉन्ग की शेल कंपनियों के माध्यम से डायमंड आयात-निर्यात में सर्कुलर ट्रेडिंग की, जिससे ₹6.8 अरब के फर्जी निर्यात क्रेडिट क्लेम किए गए। राजेश अडानी की गिरफ्तारी हुई, लेकिन बाद में पदोन्नति। (मनी लॉन्ड्रिंग, शेल कंपनियां, लेखा गड़बड़ी)
- आयरन ओर निर्यात रिश्वत घोटाला (2011): कर्नाटक में अवैध आयरन ओर निर्यात के लिए अधिकारियों को प्रति जहाज ₹50,000 की रिश्वत दी गई, जो ₹600 अरब के घोटाले का हिस्सा था। ओम्बड्समैन रिपोर्ट में अडानी को मुख्य आरोपी बताया गया। (रिश्वतखोरी, बैंक घोटाला)
- पावर उपकरण ओवर-इनवॉइसिंग घोटाला (2014): UAE की डमी कंपनियों (विनोद अडानी नियंत्रित) के माध्यम से पावर उपकरण आयात की ₹39.74 अरब की ओवर-वैल्यूएशन की गई, जिससे $900 मिलियन मॉरीशस की शेल इकाइयों में लाए गए। DRI जांच में पुष्टि। (मनी लॉन्ड्रिंग, शेल कंपनियां, लेखा गड़बड़ी)
- इंडोनेशियन कोल ओवर-इनवॉइसिंग (2016): 40 कंपनियों सहित अडानी इकाइयों ने दुबई, सिंगापुर और BVI की मध्यस्थों के जरिए कोल आयात की 50-100% ओवर-वैल्यूएशन की, जिससे फंड सिफॉनिंग और टैरिफ महंगाई हुई। DRI ने जांच की। (बैंक घोटाला, शेल कंपनियां)
- 2015-2019: अमिकॉर्प ने अडानी के लिए मॉरीशस, साइप्रस आदि में शेल फंड्स (जैसे न्यू लेयना) बनाए, जो $4.5 अरब मनी लॉन्ड्रिंग में शामिल थे। अडानी स्टॉक में निवेश के लिए इस्तेमाल। (मनी लॉन्ड्रिंग, शेल कंपनियां)
- हिंडनबर्ग रिसर्च रिपोर्ट (जनवरी 2023): स्टॉक मैनिपुलेशन, अकाउंटिंग फ्रॉड, ऑफशोर टैक्स हेवन्स का दुरुपयोग और शेल इकाइयों (38 मॉरीशस शेल्स) से इंसाइडर ओनरशिप छिपाना। $104 अरब मार्केट वैल्यू लॉस। (शेयर हेराफेरी, शेल कंपनियां, लेखा गड़बड़ी, मनी लॉन्ड्रिंग)
- OCCRP ऑफशोर फंड्स रिपोर्ट (अगस्त 2023): अडानी परिवार ने मॉरीशस फंड्स के जरिए अपनी ही कंपनियों में गुप्त निवेश किया, जो स्टॉक मैनिपुलेशन और मनी लॉन्ड्रिंग का संकेत। SEBI जांच। (शेयर हेराफेरी, मनी लॉन्ड्रिंग)
- कोल प्राइस इन्फ्लेशन घोटाला (2023-2024): निम्न-गुणवत्ता वाले कोल को उच्च-गुणवत्ता का बताकर कीमतें 50-100% बढ़ाई गईं, सिंगापुर/दुबई शेल्स के माध्यम से। OCCRP और FT रिपोर्ट्स में उजागर। (लेखा गड़बड़ी, बैंक घोटाला)
- अमेरिकी रिश्वत और सिक्योरिटीज फ्रॉड अभियोग (नवंबर 2024): $250 मिलियन की रिश्वत देकर सोलर एनर्जी कॉन्ट्रैक्ट हासिल किए, निवेशकों से छिपाया। US DOJ/SEC ने गौतम अडानी समेत 8 पर आरोप, $28 अरब मार्केट लॉस। (रिश्वतखोरी, शेयर हेराफेरी, बैंक घोटाला)
भारत का मुखिया 2014 में गद्दी संभालने के बाद G20 की मीटिंग के बहाने ऑस्ट्रेलिया जाता है। वहां उसके साथ दोस्त गौतम अदानी भी है और भारत के सबसे बड़े स्टेट बैंक की तब की मुखिया अरुंधति भट्टाचार्य भी। सूट–बूट पहने मोदी की यह ऐतिहासिक बैठक तब के बाद कई बार सुर्खियों में आ चुकी है।
मामला क्वींसलैंड में कारमाइकल कोयला खदान का है। अदानी को 7 बिलियन डॉलर के इस खदान को खरीदने के लिए 1 बिलियन डॉलर का लोन चाहिए था। लिहाज़ा मोदी लोन लेने और देने वाले दोनों को पकड़कर अपने साथ ले गया। भारत की जनता के टैक्स के पैसों पर।
वहां तब के ऑस्ट्रेलियाई पीएम टोनी एबोट ने अपने देश की क्वींसलैंड सरकार को दलाली लेकर पहले ही पटा रखा था।
फिर क्या था। उसी मीटिंग में अरुंधति भट्टाचार्य ने अदानी को 1 बिलियन डॉलर, यानी 6 हज़ार करोड़ का चेक काट दिया। मानो बाप का पैसा हो।
और इस तरह मोदी और एबोट फ़ोटूबाज़ी कर वापस लौटे। फिर अदानी का कोयला और भारत में महंगी होती बिजली, सब इतिहास में दर्ज़ है।
गोदी मीडिया बिक चुका था। सो हम जैसे पत्रकारों ने गला फाड़कर सत्ता शीर्ष की इस बेशर्म दलाली के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना शुरू किया।
लेकिन क्या फ़र्क पड़ा। आज भी LIC के 32 हज़ार करोड़ अदानी को वैसे ही सौंप दिए गए, जैसे SBI का चेक।
बिहार के भागलपुर में 1 रुपए प्रति एकड़ में जमीन तो मोदी सत्ता ने अदानी को गुजरात में पहले भी दी थी। तब मोदी सीएम था।
2014 में अदानी पर 72 हजार करोड़ से ज्यादा का लोन था। लेकिन SBI की मुखिया ने दलाली लेकर 6000 करोड़ का लोन और दे दिया।
मोदी अरुंधति को पकड़कर इसीलिए ऑस्ट्रेलिया ले गया था, क्योंकि कोई और बैंक अदानी को लोन नहीं दे रहा था।
यानी जैसा 2014 में SBI के साथ हुआ, वैसा ही 2025 में LIC के भी साथ हुआ। क्या बदला, जो आज हायतौबा मची है?
दरअसल, ये क़र्ज़ मोदी पर था। 2002 के गुजरात दंगों के बाद जब उनके हाथ खून से सने थे, तब बजाज, अजीम प्रेमजी, दीपक पारेख और इन्फोसिस जैसे उद्योगों ने मोदी के खिलाफ बगावत की तो एक अदानी साथ खड़ा हुआ।
अदानी ही वह व्यक्ति है, जिसने मोदी की दी हुई खैरात पर अपने दोस्त को सीएम से पीएम की कुर्सी तक पहुंचाया था।
बदले में अदानी की दौलत 2002 में 3700 करोड़ से बढ़कर 2014 में 72 हज़ार करोड़ तक पहुंच गई।
मोदी की बदौलत ही अदानी को गुजरात में 1 रुपए से 16 रुपए प्रति वर्ग मीटर के भाव पर जमीन मिली।
जब ये सब हो रहा था, तब आज के मशहूर यूट्यूबर्स और इन्फ्लूएंसर्स सब जानकर चुप थे। अब ईमानदार संत बन गए हैं।
सवाल यह है कि 2004 से 2014 तक 10 साल केंद्र में रही कांग्रेस सत्ता ने क्या उखाड़ लिया?
कांग्रेस ने अपनी आंखों के सामने यह सब होते देखा और मनमोहन सत्ता चुप रही और राहुल गांधी की अम्मा भी।
इसका खमियाज़ा कांग्रेस को ही भुगतना पड़ा और एक के बाद एक पार्टी के कद्दावर नेता बीजेपी की वाशिंग मशीन में घुलते गए।
आज तक LIC के पैसे को अदानी के हवाले करने के ख़िलाफ़ कांग्रेस ने एक लफ्ज़ नहीं बोला है। क्या बिहार चुनाव की फंडिंग अदानी कर रहा है?
देश के सामने इतना बड़ा मुद्दा खड़ा है, जिस पर बिहार क्या, भारत जीता जा सकता है, कांग्रेस चुप है, अवाम चुप है, दलाल चैनल चुप हैं। और आवाज़ उठाने का ठेका हम मुट्ठी भर पत्रकारों ने ले रखा है। अब ये हमारी लड़ाई है। कांग्रेस, राहुल गांधी, विपक्ष से हमें कोई मतलब नहीं। भारत को कॉरपोरेट्स की इस दलाली के चंगुल से छुड़ाना हमारा मकसद है और रहेगा। भले जान भी चली जाए।
-सौमित्र रॉय


