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सियासत

इज़रायल में ठठाकर हँसे मोदी का मकसद क्या रैडिकल इस्लामिक ताक़तों का विरोध है?

प्रकाश के रे-

प्रधानमंत्री मोदी की इज़रायल यात्रा कोई कूटनीतिक, राजनीतिक या आर्थिक यात्रा नहीं है. यह एक रणनीतिक यात्रा है.

पश्चिम एशिया में एक बड़े युद्ध, संभवत: बहुत निर्णायक युद्ध, से पहले नेतन्याहू ने यह दिखाया है कि एक और सरकार का साथ इज़रायल को मिला है. नेतन्याहू के अनुसार, यह साथ रैडिकल इस्लामिक ताक़तों के ख़िलाफ़ है.

ईरान पर अमेरिका और इज़रायल के हमले को लेकर एक अनुमान यह है कि अभी कुछ समय यानी कुछ या कई महीनों तक यह हमला नहीं होगा. इसकी वजह यह है कि अमेरिका के पास कोई ठोस योजना नहीं है और ट्रम्प प्रशासन में अनेक लोग, जेडी वैन्स और तुलसी गबार्ड समेत तथा कई उच्च सैनिक अधिकारी हमले के पक्ष में नहीं हैं.

लेकिन इज़रायल और एप्स्टीन क्लास युद्ध के पक्ष में है. यह बहुत ताक़तवर लॉबी है.

इस आधार पर यह अनुमान लगाया जा रहा है कि 27 फ़रवरी और दो मार्च के बीच युद्ध हो सकता है. जिस दिन भारतीय प्रधानमंत्री इज़रायल से लौटेंगे, उसी दिन जेनेवा में ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत होगी. बातचीत में अमेरिका वही शर्तें रख रहा है, जो उसे इज़रायल ने दिया है.

ईरान केवल यूरेनियम पर बात करना चाहता है. तो, बातचीत असफल होनी ही है.

यह बहाना हमले के लिए पर्याप्त होगा क्योंकि अमेरिका और इज़रायल अपने समर्थक देशों को कह सकेगा कि ईरान नहीं मान रहा है.

एंटी-ड्रोन लेज़र डिफ़ेंस तकनीक को भारत के साझा करने और बनाने के समझौते से इज़रायल को अमेरिका और ब्रिटेन के साथ-साथ एक और आपूर्तिकर्ता मिल जाएगा.

भारतीय सरकार, मीडिया और विश्लेषक रणनीतिक साझेदारी को यह कहकर अच्छा बता सकते हैं कि पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की भी रणनीतिक साझेदारी कर रहे हैं, तो भारत को भी करना चाहिए.

भाजपा और संघ वैचारिक रूप से ज़ायोनिज़्म के वैसे भी क़रीब हैं. विपक्ष और अन्य पार्टियों का नियो-लिबरल कबाल भी इज़रायल-परस्त है.

कुल मिलाकर, यह सब एप्स्टीन क्लास का एक और पैंतरा है.


दिलीप ख़ान-

मोदी ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के नाम पर जो सबसे बड़ी चीज़ सीखी है, वह है मौक़ा पाते ही ठठाकर हंस देना। अपने घरेलू ऑडियंस को टारगेट करने की यह उसकी राजनीतिक शैली बन गई है।

अब तक इस पर काफ़ी चर्चा हुई है कि किसी बड़े नेता से मिलते समय मोदी हाथ मिलाते नहीं, निचोड़ लेते हैं, जबरन गले में लिपट जाते हैं। अभी AI समिट में सुंदर पिचई और सैम ऑल्टमैन का हाथ पकड़कर अचानक उठा दिया, जैसे किसी रैली में हो। ऑल्टमैन ने बाद में कहा कि उन्हें कुछ समझ में नहीं आया कि ये हुआ क्या!

लेकिन असली दृश्य शुरू होता है इस तरह के मिलन समारोह की औपचारिकता के चंद सेकंड बाद। गलबहियां पूरी होते ही जैसे कैमरा के पीछे से कोई कह रहा हो, “अब हंसो।” और जैसे जमूरा, मदारी के हुक़्म में बंधा होता है, मोदी भी उसी तर्ज पर बिना चूके इसे तामील करता है।

यह हंसी ऐसी होती है जैसे समूचे फेफड़े का ज़ोर लगा दिया गया हो और आख़िर में आते-आते आवाज़ के बदले सिर्फ़ हुस-हुस की ध्वनि निकलने लगती है। अगर इसे थोड़ा और खींचा जाए, तो अगला चरण खांसी का होगा। पर, बंदे को हंसना है, तो हंसता है।

मैं नेतन्याहू वाला वीडियो देख रहा था। पहले गले मिले, फिर ठठाकर हंसे। एक बार में बात नहीं बनी, तो दो-तीन बार, ताकि कैमरा अच्छे से उसे कैप्चर कर ले। फिर उनकी पत्नी से मिलते हुए अचानक एक वाक्य दाग़ा, “यू आर वियरिंग सैफ़्रन।”

बस, ख़ुद ही बोले और ख़ुद की इस वाक्य को ‘पन’ मानते हुए बावले की तरह हंसने लगे। सामने कोई नहीं हंस रहा है, न नेतन्याहू और न उसकी पत्नी।

अब ANI इस वीडियो को म्यूट करके बांटेगा और सारे चैनल ऐसे दिखाएंगे जैसे दोनों मिलते ही चुटकुले शेयर करने लगे, जैसे दोनों तीसरी क्लास के बैचमेट रहे हो।

बहुपक्षीय बैठकों में उंगली उठाकर पोज़ देना, कैमरे की तरफ़ आधा मुड़कर मुस्कुराना, यह सब एक रिहर्सल की तरह हो गया है। इसी से विराट हिंदू ख़ुश रहता है।

अभी हाल में राजीव शुक्ला ने संसद में अच्छा कहा कि गुरु वह होता है जिसके शिष्य हो। हम विश्वगुरु का आश्रम खोलकर बैठ गए हैं और शिष्ट का कहीं अता-पता ही नहीं है। मोदी के दौर में यही हुआ है। यह आदमी सबके सामने जाकर हंस चुका है, लेकिन किसी बड़ी घटना पर कभी यह चार देशों को भारत के पक्ष में नहीं कर पाया। सब इसको सिर्फ़ हंसने का पूरा मौक़ा देते हैं। हंसो, ठठाकर हंसो।

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