मोकामा हत्याकांड आज इंटरनेट पर सुर्खियों में है। सोशल मीडिया से लेकर न्यूज़ पोर्टल्स तक हर जगह दुलारचंद की हत्या की चर्चा है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने पूरे मामले को नया मोड़ दे दिया है—खुलासा हुआ है कि मौत गोली से नहीं, बल्कि सीने पर गाड़ी चढ़ाने से हुई थी। फेफड़े फटने से हुई ये दर्दनाक मौत अब कई सवालों को जन्म दे रही है—क्या ये हादसा था या एक सोची-समझी साजिश?
रवीश कुमार-
ये चुनाव के बीच हुआ है।

राजेश साहू-
दुलारचंद यादव की मौत कैसे हुई, इसका खुलासा पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से हुआ। दुलारचंद के सीने पर गाड़ी चढ़ी थी। इससे सीने की हड्डी टूट गई। दोनों फेफड़े फट गए। यही उनकी मौत की वजह बनी। शुक्रवार को बाढ़ में मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में 3 डॉक्टरों की टीम ने करीब दाे घंटे तक पोस्टमॉर्टम किया।
क्रांति कुमार-
अनंत सिंह को बोलने का शऊर नहीं है. हिन्दी भी ठीक से बोल नहीं पाता है. इस आदमी पर 38 मुकदमे दर्ज हैं. सात मर्डर के, हत्या करने का प्रयास पर 11 और 4 अपहरण का मुकदमा दर्ज है.
इसके बावजूद इस आदमी को इसकी जाति के पत्रकार छोटे सरकार बोलकर महिमामंडित करते हैं,
हर बड़े न्यूज़ चैनल के पत्रकारों ने इस हिस्ट्री शीटर का इंटरव्यू किया है. देश का पूरा राजनीतिक इको सिस्टम अनंत सिंह के साथ खड़ा है. ब्यूरोक्रेसी और पुलिस डिपार्टमेंट में सवर्ण अधिकारी भी अपनी जाति के बाहुबलियों के लिए सॉफ्टकॉर्नर रखते हैं.
दलित पिछड़ा और आदिवासी को तो एक दो मुकदमों के बाद निपटा दिया जाता है. सवर्णों को आगे बढ़ने दिया जाता है. ताकि क्राइम में भी सवर्णों का वर्चस्व कायम रहे.
कृष्ण कांत-
बिहार में चुनाव चोरी आयोग की देखरेख में रिश्वत बांटी जा रही है। चुनाव आचार संहिता का अचार बन गया। संविधान अब सिर्फ एक पोथी है।
मेरी समझ में नहीं आता कि विपक्ष इस चुनाव में शामिल क्यों है?
विपक्ष को मांग करनी चाहिए कि चुनाव चोरी आयोग भाजपा से एक आदेश लेकर आए और देश के सामने पढ़ दे। उसी को चुनाव माना जाए।

शीतल पी सिंह-
बिहार चुनाव 2025: बारिश, हिंसा और जातिगत ध्रुवीकरण के बीच NDA का संकल्प पत्र
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 अब चरम पर पहुंच चुका है। 31 अक्टूबर को जारी एनडीए के संकल्प पत्र ने विकास के वादों के साथ राजनीतिक बहसको आगे बढ़ाया लेकिन मौसम की मार, मोकामा में हुई हत्या और जातिगत बंटवारे की आशंकाओं ने अभियान को जटिल बना दिया है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अगुवाई वाला एनडीए और महागठबंधन के बीच मुकाबला न केवल सत्ता की लड़ाई है, बल्कि सामाजिक न्याय, विकास और जातीय समीकरणों का भी संघर्ष है।
31 अक्टूबर को बिहार में भारी बारिश ने चुनावी अभियान को ठप कर दिया। चक्रवात मोंथा के अवशेषों से उत्पन्न लगातार वर्षा ने पटना सहित कई जिलों में जलभराव पैदा कर दिया। हेलीकॉप्टर से प्रचार करने वाले बड़े नेताओं—चाहे नीतीश कुमार हों, तेजस्वी यादव हों या चिराग पासवान—का हवाई दौरा रुक गया। नीतीश कुमार को सड़क मार्ग से 250 किलोमीटर से अधिक का सफर तय करना पड़ा, जो उनके अभियान को प्रभावित करने वाला था। विपक्षी दलों ने इसे ‘प्राकृतिक आपदा’ बताते हुए एनडीए पर निशाना साधा, जबकि एनडीए ने इसे ‘विकास की गति रोकने वाली बाधा’ करार दिया। सोशल मीडिया पर यूजर्स ने मीम्स और वीडियो शेयर कर मजाक उड़ाया—‘बारिश ने नेताओं को जमीन पर उतार दिया’—लेकिन गंभीरता से देखें तो यह युवा मतदाताओं के बीच निराशा बढ़ाने वाला था। बिहार जैसे राज्य में, जहां बेरोजगारी और प्रवासन पहले से ही मुद्दा हैं, प्रचार की कमी ने पार्टियों को डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर और निर्भर कर दिया।
इसी बीच, मोकामा हत्या कांड ने चुनावी हिंसा की आशंकाओं को जन्म दे दिया। 30 अक्टूबर को जन सुराज पार्टी के कार्यकर्ता और पिछड़ी जाति के बाहुबली नेता दुलार चंद यादव की गोली मारकर हत्या कर दी गई। यह घटना मोकामा विधानसभा क्षेत्र के पुराने गुटबाजी को फिर से उजागर कर रही है, जहां लालू प्रसाद यादव के करीबी रहे दुलरचंद का परिवार राजनीतिक रंजिश का शिकार बना। अंतिम संस्कार के दौरान पथराव और गोलीबारी हुई, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। तेजस्वी यादव ने इसे ‘जंगल राज की वापसी’ बताते हुए प्रधानमंत्री मोदी से सवाल किया—‘मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट के तहत बंदूकों के साथ घूमने वालों पर कार्रवाई क्यों नहीं?’ निर्वाचन आयोग ने बिहार डीजीपी से रिपोर्ट मांगी है, लेकिन विपक्ष इसे एनडीए सरकार की विफलता का प्रतीक बता रहा है।
सोशल मीडिया पर Mokama Murder ट्रेंड कर रहा है, जहां हजारों पोस्ट्स में एनडीए पर ‘अराजकता फैलाने’ का आरोप लगाया जा रहा है। पूर्व आईपीएस अधिकारी अमिताभ दास ने एक इंटरव्यू में इसे ‘चुनावी हिंसा का अंदरूनी खेल’ बताया, जो बिहार की अस्थिरता को दर्शाता है। यह कांड न केवल स्थानीय स्तर पर ध्रुवीकरण बढ़ा रहा है, बल्कि पूरे राज्य में सुरक्षा चिंताओं को हवा दे रहा है।
चुनाव का सबसे संवेदनशील मुद्दा जातिगत बंटवारा है। क्या बिहार धीरे-धीरे अगड़े-पिछड़े के बीच बंट रहा है, या नीतीश कुमार इसे रोक पाने में सफल हैं? बिहार की राजनीति हमेशा से जातियों की गोलबंदी पर आधारित रही है। 2023 के जाति सर्वे के अनुसार, ओबीसी और ईबीसी मिलाकर 63% आबादी हैं, जबकि सवर्ण मात्र 15.5%। एनडीए कुर्मी-कुशवाहा और सवर्ण वोटों पर निर्भर है, जबकि महागठबंधन यादव-मुस्लिम-दलित (एमवाई) समीकरण से आगे बढ़ रहा है। सोशल मीडिया पर पोस्ट्स दिखाते हैं कि बीजेपी को ‘सवर्ण-विरोधी’ कहा जा रहा है—उनके 65% आरक्षण के वादे को ‘सवर्णों के लिए खतरा’ बताया जा रहा है। एक पोस्ट में कहा गया, ‘बीजेपी ने सवर्णों को धोखा दिया, नेक्स्ट कास्ट सेंसस-आरक्षण सब कुछ।’ वहीं, नीतीश कुमार की भूमिका दिलचस्प है। उन्होंने सामाजिक इंजीनियरिंग से ईबीसी (36% आबादी) को मजबूत किया—महिलाओं के लिए 35% आरक्षण, बुजुर्ग महिलाओं की पेंशन बढ़ाना और 10,000 रुपये की सहायता। एक सर्वे के अनुसार, केवल 4.2% मतदाता जाति को प्राथमिकता देते हैं, लेकिन वास्तविकता में टिकट वितरण जाति पर आधारित है। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, भूमिहार और राजपूतों का प्रतिनिधित्व सबसे अधिक है। नीतीश ने सभी वर्गों—हिंदू, मुस्लिम, सवर्ण, पिछड़े, दलित—के लिए काम का दावा किया है, लेकिन आलोचक कहते हैं कि यह ‘संतुलन’ मात्र है, न कि वास्तविक एकीकरण। तेजस्वी यादव की ‘बीएएपी’ (बिहार एजेंडा फॉर ऑल पीपल) रणनीति पिछड़ों-दलितों को एकजुट कर रही है। कुल मिलाकर, नीतीश ने बंटवारे को कुछ हद तक रोका है, लेकिन जाति का भूत अभी भी घूम रहा है। युवा मतदाता, जो 40% हैं, विकास और रोजगार चाहते हैं, लेकिन जातिगत ध्रुवीकरण उन्हें प्रभावित कर रहा है।
एनडीए ने इसी दिन पटना के होटल मौर्या में ‘संकल्प पत्र 2025’ जारी किया, जिसमें 1 करोड़ नौकरियां, 1 करोड़ लखपति दीदियां, केजी से पीजी तक मुफ्त शिक्षा, किसानों को 9,000 रुपये सम्मान निधि और 7 एक्सप्रेसवे जैसे वादे हैं। लेकिन सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया मिश्रित रही। विपक्ष ने नीतीश के आचरण को ‘अपमान’ बताया—वे मंच पर पहुंचे, घोषणापत्र जारी किया और बिना भाषण 2 मिनट में चले गए। अशोक गहलोत ने कहा, ‘यह बिहारियों का अपमान है।’ तेजस्वी ने दावा किया, ‘नीतीश को अंधेरे में रखा गया।’ एक्स पर #NitishInsult ट्रेंड हुआ, जहां यूजर्स ने कहा, ‘भाजपा नीतीश को मास्क की तरह इस्तेमाल कर रही।’ एनडीए समर्थकों ने वादों की तारीफ की—‘युवाओं-किसानों के लिए क्रांति’—लेकिन कुल 20% पोस्ट्स नकारात्मक थे। यह पत्र विकास-केंद्रित लगता है, लेकिन जातिगत संतुलन की कमी ने इसे विवादास्पद बना दिया।
बिहार चुनाव 2025 बारिश की तरह अनिश्चित है—विकास के वादे हैं, लेकिन हिंसा और जाति के बादल मंडरा रहे हैं। नीतीश कुमार ने बंटवारे को नियंत्रित करने की कोशिश की है, लेकिन सफलता आंशिक है। मोकामा जैसी घटनाएं जंगल राज की याद दिलाती हैं, जबकि डिजिटल अभियान नई उम्मीद जगाते हैं। अंतिम फैसला युवाओं और महिलाओं के वोट पर होगा। यदि एनडीए वादों को साकार कर सका, तो जीत संभव; वरना महागठबंधन का पलड़ा भारी है।
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