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बिहार

दुलारचंद यादव हत्याकांड; नीतीश का प्रशासन और मीडिया एकदम बेहूदगी पर उतर आया है!

सत्येंद्र पीएस-

जब भी किसी राज्य में चुनाव होता है तो वहाँ चुनाव पर्यवेक्षक नाम का जीव भेजा जाता है. यह सीनियर आई ए एस अधिकारी होते हैं. चुनाव में इनकी तूती बोलती है. किसी डीएम एसपी की भी औकात नहीं होती है कि वह इनके सामने बोल पाए.

यूपी में तो मैंने यही देखा है. बिहार में अनंत सिंह कह रहा है कि उसके काफिले में 50 गाड़ी थी. उसका वीडियो भी है. क्या चुनाव आयोग और उसके पर्यवेक्षक किसी कब्र में दफन हैं? न्यायालय अंधा हो गया है? पटना के अधिकारी जिस दुलार चन्द यादव को माफिया बता रहे हैं, मीडिया के लोग उनको लालू प्रसाद के दौर का दीघा का सबसे ताकतवर आदमी बता रहे हैं. वो या तो बहुत शातिर हैं या निहायत मूर्ख.

हमारे यूपी में कोई गली का गुंडा होता है, वह भी दस पांच करोड़ रुपये कमा लेता है, माफिया के तो दर्जनों कॉलेज चलते हैं, हेलिकाप्टर होते हैं. एक विधायक का कोई करीबी हो तो सौ पचास करोड़ का ठेका पट्टा पा जाता है. मुख्यमन्त्री का करीबी कम से कम सौ करोड़ का मालिक होता है, उससे कम होने पर कोई मानेगा ही नहीं कि बन्दा मुख्यमन्त्री का करीबी है.

दुलार चन्द पहलवान थे. बड़ी बड़ी मूछ थी. साफ कुर्ता पहन लेते थे. उनके परिवार की महिलाओं को देखा तो बदन पर ऐसा कपड़ा भी नहीं था, जैसा हम जैसे गरीबी रेखा के नीचे वाले पहन लेते हैं. घर वाले ट्रैक्टर पर लाश लेकर जा रहे थे. मैंने अपनी जिंदगी में ऐसा माफिया और ऐसा मुख्यमन्त्री का करीबी नहीं देखा था! कुछ तो शर्म करना चाहिए प्रशासन और मीडिया को? बिहार पता नहीं किस युग में जी रहा है. पैथेटिक!

शायद अनंत सिंह उस पत्रकार को सही कह रहे थे कि हम अगर तुमको गोली मार दें तो नीतीश कुमार या सरकार क्या कर लेगी? उस पत्रकार का दांत चियारना भी उचित था कि आप तो खुद सरकार हैं, सरकार क्या कर लेगी? शायद वह ये कहता कि सरकार तुमको नँगा करके पटना की सड़क पर घसीटते हुए ले जाएगी, उसके बाद तुम्हारे जैसा गुंडा किसी को गोली मारना क्या, गोली मार देने को कहने की हिम्मत नहीं करता. लेकिन तब शायद पत्रकार की जान न बचती. यही बिहार की कानून व्यवस्था है.

दुलार चन्द की हत्या ने कानून व्यवस्था की वर्दी ही नहीं, चड्ढी भी उतार दी है. पूरा प्रशासन मीडिया, जन संपर्क तंत्र यह साबित करने में लगा है कि जो मारा गया, उसी की गलती है. सरकार के किसी एक हरकारे ने तो ब्लू टिक आईडी से लिख रखा था कि जन सुराज के आपसी झगड़े में एक व्यक्ति घायल हो गया.

नीतीश सरकार, प्रशासन, चुनाव आयोग से ईमानदार वह अनंत सिंह है, जिसने कम से कम यह कहा कि हमारे लोगों से दुलार चन्द से झगड़ा हुआ. वरना नीतीश सरकार यह साबित करने वाली थी कि दुलार चन्द नाम के गुंडे को उसके अपने लोगों ने मार डाला!


बिहार में दुलार चन्द यादव हत्याकांड में नीतीश कुमार का प्रशासन एकदम बेशर्मी और बेहूदगी पर उतर आया है. आदतन मैं किसी विषय पर त्वरित टिप्पणी नहीं करता. लेकिन प्रशासन ने हद ही कर दी. बिहार के लोग दुलार चन्द्र को जानते रहे होंगे. मैंने पहली बार नाम सुना. कल ही उनके बारे में डिटेल में पढ़ा. मुझे यही समझ में आया कि बन्दा दलितों पिछड़ों के लिए समर्पित था. राजनीतिक दुर्भावना से मुकदमे किए गए.

प्रशासन यह सब जानता है, उसके लिए जानना कठिन भी नहीं है. अनंत सिंह इस मामले में नामजद किया गया है, जो जदयू का प्रत्याशी है. इसमें जाँच जैसा कोई मामला ही नहीं है, अनंत सिंह के भाई भतीजों ने एक क्षेत्रीय पहलवान, लोकप्रिय व्यक्ति को पीटा और फिर गोली मार दी. इसमें झड़प कहाँ हुई?

हम 90 के दौर में पहुँच रहे हैं, मोकामा अनंत और सूरज भान की बपौती है और कोई दूसरा वहाँ चुनाव लड़े और इनके खिलाफ बोले तो पीटकर मार दिया जाएगा, उसे गोली मार दी जाएगी. अब वहाँ की जनता को फैसला करना है. नीतीश कुमार या लालू यादव ने किसी वोटर का हाथ नहीं बँधा है कि वह अनंत या सूरजभान को वोट दे. वहाँ की सत्ता पलट दीजिए. जो लालू नीतीश बिहार में नहीं कर पाए, वह क्रांति वोटर कर सकते हैं, इन अपराधियों से मुक्ति पा सकते हैं.

और क्या ही कहा जाए? पटना प्रशासन का ट्वीट सोशल मीडिया पर मिला. डाउट हो रहा है कि क्या सच में नीतीश सरकार के प्रशासन का ये ट्वीट है? या फर्जी है? प्रशासन ऐसा कैसे कर सकता है.

खैर… बिहार के लोगों को मोकामा देखना है. मेरा तो केवल आक्रोश ही हैं. दुलार चन्द्र यादव को विनम्र श्रद्धांजलि.


महेंद्र सुमन-

मोकामा के टाल क्षेत्र में जितना पानी जमा है, सवर्ण वर्चस्व को चुनौती देने वाले बहुजन नायकों का खून भी उस क्षेत्र में कम नहीं बहा है. दुलारचंद के खून ने उस पानी को और रक्ताभ, चमकीला कर दिया है. दुलारचंद अपने नाम के अनुरूप सचमुच में उस क्षेत्र के दुलारे थे. वे टाल क्षेत्र की बगावत के सबसे बेखौफ, फक्कड़ स्वर थे. उन्हें महज सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता कहना उनके कद को छोटा करना होगा.

वास्तव में, वे बाबा चौहरमल की परम्परा के टाल क्षेत्र के बागी थे, ठीक उसी तरह जैसे चम्बल के बीहड़ों की रानी फूलन देवी और कैमूर की पहाड़ियों के राजा मोहन बिंद.

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