चारा घोटाले में चर्चित रहे प्रत्याशी से मिलने उनके आलीशान आवास पर पहुंचा। तब उस आवास के 100-100 किलोमीटर दूर तक उसकी आधी शान वाला भी कोई भवन नहीं था। चर्चित था कि गाड़ी सीधे रैंप पर चढ़कर कमरे तक जाती है…

के जितेंद्र ज्योति-
मुकेश चंद्राकर को लेकर बहस चल रही कि यूट्यूबर कहें या पत्रकार! यूट्यूब पर भी पत्रकारिता हो रही है, यह तो मानना ही पड़ेगा। हां, यह मानता हूं कि यूट्यूब के सहारे और भी बहुत कुछ होता है। जब बात इतनी गंभीर थी कि निर्माण कार्य की क्वालिटी का मुद्दा उठाने पर हत्या हो गई, तो वह पत्रकारिता निश्चित थी। खैर, मैं इस बहस को बेतुका मानता हूं। वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव की बात याद आई। अगर चंद्राकर ने वह किया होता तो शायद कोई ऐसी हिमाकत नहीं करता।
बिहार में तब राष्ट्रीय जनता दल की सरकार थी। उस जमाने में ‘हिन्दुस्तान’ अखबार में काम कर रहा था। उसके पहले 1999-2001 के बीच जहां काम करता था, वहां राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव या उनकी पत्नी राबड़ी देवी से मुलाकात सहज होती थी।
‘हिन्दुस्तान’ बड़ा जहाज है, जिसमें आने पर मेरा कद छोटा हो गया था। उम्र भी बहुत नहीं थी। हां, आदतन पत्रकार हूं तो पत्रकारिता के दिग्गजों की बताई बातों को हमेशा गांठ बांधकर रख लेता था। नहीं रखता तो 21 साल पहले मैं भी जमींदोज़ हो जाता।
हुआ यूं कि तीन लोकसभा सीटों की ग्राउंड रिपोर्ट आधारित समीक्षा के लिए तत्कालीन संपादक नवीन जोशी सर ने भेजा था। एक क्षेत्र में अपराधी से राजनीति में आए धुरंधर प्रत्याशी थे। एक क्षेत्र में चारा घोटाले के लिए चर्चित रहे असल दबंग प्रत्याशी थे। और, एक क्षेत्र में एक घोटाले के चर्चित अभियुक्त (जेल में बंद)। तीनों जगह दुर्दांत कह सकते हैं।
मतलब, जान का खतरा हो सकता था। उम्र कम थी तो संपादक नवीन जोशी सर और समाचार संपादक देशपाल सिंह पंवार ने एक-दो लाइनों में कुछ सीख दी थी। बहुत गंभीरता से नहीं, मगर गंभीर सीख। उस सीख का पालन काम आ गया।
चारा घोटाले में चर्चित रहे प्रत्याशी से मिलने उनके आलीशान आवास पर पहुंचा। तब उस आवास के 100-100 किलोमीटर दूर तक उसकी आधी शान वाला भी कोई भवन नहीं था। चर्चित था कि गाड़ी सीधे रैंप पर चढ़कर कमरे तक जाती है।
खैर, वहां पहुंचने पर ठीक से ही बात हो रही थी। अंत में उन्होंने दावा किया कि पिछड़ों के अलावा उन्हें अगड़ों का भी साथ मिल रहा है। जीत का दावा तो था ही। खैर, इसी बात पर मैंने पूछ दिया कि लालू जी तो MY समीकरण की बात करते हुए भूराबाल साफ करो का नारा दे रहे, फिर यहां के भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण और लाला आपके साथ कैसे आ रहे?
इतना सुनते ही वह हत्थे से उखड़ गए। आप से तुम पर उतर आए। कहा- “हमको हराने आए हो? यहां से निकल कर जा सकते हो?” मैं कुछ बोलता, इससे पहले उन्होंने किसी को आवाज लगाई तो बंदूकधारी एक आदमी आया और उसे कहा गया कि मैं जिस कार से आया हूं, उसके ड्राइवर को तत्काल भगा दे। उसे भगाने के बाद मुझे सीधी धमकी देकर पूछा गया- “अब बताओ, हमें हराने के लिए लिखने की कोशिश कर रहे हो तो तुम्हें कहां गाड़ दिया जाए?”
फिर इशारा कर कहा गया कि देखो यहां से वहां, कहीं भी गाड़ देंगे तो कोई नहीं ढूंढ़ने के लिए अंदर आने की हिम्मत नहीं करेगा। जितनी दबंग उस प्रत्याशी की छवि थी, उससे ज्यादा साक्षात लगे। लेकिन, धैर्य नहीं खोया। तत्काल अपने पॉकेट से नया-नया खरीदा नोकिया 2100 मोबाइल निकाला। उससे मैंने अपने संपादक जी को एक मैसेज कर रखा था- …(प्रत्याशी का नाम)… के आवास में जा रहा हूं।
उस समय हिंदी टाइप का प्रावधान नहीं था, लेकिन रोमन में हिंदी ही लिखा था। वह मैसेज को दिखाने के बाद मैंने तत्काल एक नंबर दिखाते हुए कहा कि यह किसका है, आप जानते होंगे। वह लालू जी का नंबर था। मैंने कहा कि एक बार पूछ लीजिए कि क्या मैं किसी के पक्ष या विपक्ष का आदमी हूं? और, रही बात मारने की तो उसी के लिए आदेश ले लीजिए।
वह मैसेज, वह नंबर और मेरी बात उनके पल्ले तुरंत पड़ गई। तत्काल उसी बंदूकधारी को आवाज दी गई। उसे कुछ कहा गया तो उसने मुझे इशारे से बुलाया। मैं उसके साथ रैंप के रास्ते ही नीचे आया। एक गाड़ी पर वह मुझे लेकर बैठा। मैं डरा हुआ था, लेकिन हिम्मत दिखा रहा था। गाड़ी मुख्य सड़क पर होते हुए सीधे स्टेशन पर रुकी। पटना की तरफ आने वाली एक ट्रेन पर मुझे टिकट समेत चढ़ा दिया गया, इस ताकीद के साथ कि संसदीय क्षेत्र में मत रुकना।
इस कहानी में सामने वाले पात्रों का नाम नहीं दिया गया है। विस्तार से लिखने के पीछे एक सीख है। वह सभी पत्रकारों के पल्ले पड़नी चाहिए। जब हर कोई हथियार रखने में सक्षम और जान लेने के लिए तैयार है, ऐसे में पत्रकारिता करते हुए खतरा कई बार दिखता है। उस सीख पर मैं आज भी चलता हूं।
पटना में दैनिक भास्कर के डीबी स्टार के लिए इन्वेस्टिगेशन करते और कराते समय भी ऐसा खतरा कई बार सामने आया। तीन बार तो ठीक चंद्राकर जैसा। एक बार मेरे एक साथी पर भी इस तरह का खतरा आया था। मैं अपने साथ काम करने वालों को यह कहानी कई बार बता चुका हूं। यकीन मानिए, शायद हर बार बचने में यह फॉर्मूला काम आया।
इसलिए, आज सार्वजनिक रूप से शेयर किया है। अगर पत्रकारिता आदत होगी तो खतरा रहेगा ही। हम कलम और बुद्धि से लड़ सकते हैं।
मुकेश चंद्राकर को श्रद्धांजलि! हत्यारों के खिलाफ जंग में साथ दें सभी।
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मेरा बस चले तो पत्रकारिता संस्थानों में मुकेश हत्याकांड की यह पूरी वारदात बाकायदा पाठ्यक्रम में शामिल करवा दूं!


