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छत्तीसगढ़

मेरा बस चले तो पत्रकारिता संस्थानों में मुकेश हत्याकांड की यह पूरी वारदात बाकायदा पाठ्यक्रम में शामिल करवा दूं!

अश्विनी कुमार श्रीवास्तव-

त्तीसगढ़ में एक युवा पत्रकार मुकेश चंद्राकर की हत्या एक अरबपति ठेकेदार ने महज इसलिए कर दी क्योंकि उसकी बनाई सड़क के गढ्ढों पर एक खबर उसे नागवार गुजरी थी।

हत्या का राज उजागर नहीं होता अगर मारे गए पत्रकार की गुमशुदगी से परेशान उसके मित्र पत्रकारों ने निजी खोजबीन न की होती। पुलिस गुमशुदगी पर भी बहुत एक्टिव नहीं थी और दिल्ली या राज्य के मीडिया को तो छोड़िए, खुद उसके जिले में भी मीडिया समूहों ने इस पर कोई हो हल्ला नहीं मचाया।

खुद मुकेश जिस संगठन एनडीटीवी के लिए पत्रकारिता करता था, उसने भी इसे कोई गंभीर या ध्यान देने योग्य मुद्दा नहीं बनाया।

जब मित्रमंडली के हो हल्ला मचाने के बाद ठेकेदार के एक परिसर से पत्रकार की लाश मिली, तो भी मीडिया समूहों ने इसे किसी बड़ी या चिंताजनक खबर की तरह पेश नहीं किया।

एक बड़े मीडिया समूह ने तो मुकेश को पत्रकार की बजाय यूट्यूबर लिखा। मानों पत्रकार केवल उन्हें ही माना जाएगा, जिन्हें सरकार मान्यता प्राप्त का दर्जा देती है। जबकि मान्यता लेने के लिए या लेने के बाद पत्रकार कितनी पत्रकारिता करते हैं और सरकार की कितनी चाटुकारिता, दलाली या गलत धंधे करते हैं, यह शायद ही किसी को नहीं पता होगा।

बहरहाल, स्थानीय स्तर पर उन्हीं तथाकथित यूट्यूबर यानी पत्रकारों ने जमकर हो हल्ला मचाया तो राज्य में खलबली मच गई। ठेकेदार की गिरफ्तारी और बुलडोजर एक्शन आदि की शुरुआत हुई।

लेकिन दुखद तो यह है कि लखनऊ, दिल्ली, भोपाल, रायपुर, पटना जैसे अहम राजनीतिक केंद्रों में बैठे सरकारी मान्यताप्राप्त पत्रकार या पत्रकार संगठन इस मसले पर तकरीबन खामोश ही हैं। सिवाय छिटपुट बयानबाजी के उनकी तरफ से कोई हो हल्ला नहीं हुआ। न ही मीडिया समूहों ने इसे कोई बड़ा मुद्दा बनाया।

ऐसे में ज्यादातर खबरें मुझे भड़ास पर ही मिलीं, जिसने इस मुद्दे पर ज्यादा से ज्यादा लिखा और पत्रकारों के बीच अहम बनाए रखा।

वैसे मेरे लिए मीडिया या पत्रकार संगठनों की यह बेरुखी और मौन ऐसी कोई बड़ी बात नहीं है, जिस पर लिखा जाए। क्योंकि टाइम्स ग्रुप में कुछ साल बतौर पत्रकार नौकरी करके हिंदुस्तान टाइम्स समूह में जब तक पहुंचा, तब तक “जन्नत की हकीकत” टाइप अनुभवों से रूबरू हो चुका था। रही सही आँखें अगले कुछ और बरसों में होने वाले अनुभवों और यशवंत सिंह तथा उनके भड़ास ब्लॉग भड़ास4मीडिया मंच से जुड़ने के बाद मिलने वाली खबरों से खुल ही गईं थी।

बावजूद इसके जब मुकेश जैसे युवा पत्रकारों को मीडिया को मिशन मानकर अपनी जान गंवाते देखता हूं तो दिल नहीं मानता और कुछ लिख ही देता हूं।

जबकि जानता हूं कि मीडिया का तंत्र जिस गहरे गड्ढे में धंसा है, वहां से उसे कोई मसीहा ही निकाल सकता है… और ऐसा मसीहा कब आएगा, कोई नहीं जानता।

मेरा बस चले तो पत्रकारिता संस्थानों में मुकेश की हत्या की यह पूरी वारदात बाकायदा पाठ्यक्रम में शामिल करवा दूं ताकि इस गलतफहमी में पत्रकार बनने वाले युवा सच तो जान सकें। वह यह कि महज खराब सड़क की मामूली खबर से भी उनकी जान को खतरा है इसलिए…

पत्रकारिता वही करें, जो उनके वरिष्ठ करते आए हैं और इसीलिए मान्यता प्राप्त और बड़े-बड़े पदों मोटी सेलरी की उपलब्धि उनके पास है।

उन्हें या देश में क्या किसी को यह चिंता भी है कि कुल 180 देशों की एक सूची है, जिसमें भारत लगभग सबसे नीचे है। सूची इस बात की है कि इन देशों में पत्रकार और पत्रकारिता कितनी सुरक्षित है।

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