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मुख्यधारा की मीडिया सत्यता की पुष्टि किए बगैर अप्रामाणिक कंटेंट का प्रकाशन-प्रसारण करता ही क्यों है?

अनिल भास्कर-

आजकल मुख्यधारा की मीडिया में एक अजीब प्रैक्टिस दिख रही है। सोशल मीडिया से कंटेंट उठाकर अपने प्लेटफॉर्म पर इस डिस्क्लेमर के साथ परोसना कि उनका संस्थान उक्त कंटेंट की प्रामाणिकता या सत्यता की पुष्टि नहीं करता। आखिर ऐसे अपुष्ट या अप्रामाणिक कंटेंट का प्रकाशन-प्रसारण ही क्यों? आज जब सोशल मीडिया पर सूचनाओं की मूसलाधार बारिश ने विश्वसनीयता के संकट का कोहरा घना कर दिया है, मुख्यधारा की मीडिया का यह प्राथमिक दायित्व होना चाहिए कि वह कंटेंट की प्रामाणिकता पर जाँचने की मशीनरी को और चुस्त-दुरुस्त करे। सत्यापन को लेकर दृढ रहे। मगर हो उल्टा रहा है। वह खुद अविश्वसनीयता का कोहरा बढ़ाने में व्यस्त हो गया है।

सोशल मीडिया के नेटवर्क विस्तार से पहले तक मुख्यधारा की मीडिया ऐसे किसी भी कंटेंट का प्रकाशन अथवा प्रसारण न करने के लिए संकल्पित रहता था। किसी भी तथ्य को परोसने से पहले उसकी प्रामाणिकता की जांच संस्थान अपने स्तर से सुनिश्चित करता था। वरिष्ठ अपने मातहतों को स्पष्ट निर्देश देते थे कि चाहे खबर छूट जाए मगर कोई गलत या अपुष्ट तथ्य का प्रकाशन-प्रसारण न हो। कही-सुनी के लिए कोई जगह नहीं थी। यहां तक कि किसी व्यक्ति या संस्था से जुड़ी किसी खबर का प्रकाशन करते समय उस व्यक्ति या संस्था का पक्ष भी शामिल करने की अनिवार्यता का पालन होता था। यह आचार संहिता मीडिया की साख और विश्वसनीयता दोनों को सुदृढ़ करती थी। आज यदि मीडिया की साख और विश्वसनीयता लगातार छीज रही है तो उसके पीछे की वजहों में सोशल मीडिया पर तैर रही सामग्रियों को कॉपी पेस्ट करने की गैरजिम्मेदाराना जल्दबाजी भी प्रमुखता से शामिल है। अब इस आत्मघाती कार्यव्यवहार के लिए बाजार का कौन सा दवाब जिम्मेदार है, भगवान ही जाने।

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