भारत एक्सप्रेस न्यूज चैनल से तीन विकेट गिरने की खबर है। इनपुट एडिटर मुकुंद साही चैनल से गए. उनकी जगह अगली व्यवस्था होने तक मनीष कुमार ठाकुर इनपुट का काम देखेंगे. देखें ये इंटरनल लेटर-

खबर ये भी है कि चैनल से प्रयागराज के पत्रकार मुमताज और बनारस के पत्रकार स्नेह रंजन भी कार्यमुक्त हुए हैं।
जाते जाते मुकुंद साही ने भारत एक्सप्रेस के कर्मियों को एक संदेश लिखा, मुकुंद साही द्वारा आखिरी मैसेज ह्वाट्सऐप ग्रुप में क्या लिखा गया, पढ़िए-
दोस्तों
जिंदगी चलते रहने का नाम है, हर मोड़ पर पड़ाव है, विराम नहीं…
अपने 25 साल के इस सफर में कई पड़ाव पर ठहरा और वहां से अगले सफर पर निकला, एक बार फिर अगले सफर पर निकल जाने का वक्त आ गया.
बीते एक साल में भारत एक्सप्रेस चैनल में पत्रकारिता के कई ऐसे पाठ पढ़ने को मिले जिससे अब तक अनभिज्ञ था, कुछ चेहरों की हकीकत से पहले से वाकिफ था कुछ चेहरों की हकीकत वक्त के साथ सामने आती चली गई.
लेकिन हां संतुष्टि इस बात की ज़रूर रहेगी कि हर चुनौतियों को बेहतर ढंग से निभाने की कोशिश की और निभाया भी, चैनल 2 साल से चल रहा है, इसमें मेरा भी योगदान 1 साल का रहा, इस एक साल में मैने चैनल के लिए कॉनक्लेव से लेकर सभी रिपोर्टर और ब्यूरो के साथ समन्वय बनाकर काम करने की कोशिश की, हां कई बार कुछ साथियों के साथ चैनल के हित में थोड़ी तकरार जरूर हुई लेकिन कभी मैंने उसे दिल पर नहीं लिया, हर किसी के साथ हर वक्त खड़ा रहा.
जिन लोगों से भी मेरा रिश्ता बना उसे मैंने दिल से निभाया और रिश्ता तो निभाने के लिए ही तो होता है न, सो मैंने निभाया.
मतलबी रिश्ते निभाने वाले लोग शायद ये नहीं जानते कि वो जिंदगी में चाहे जो मुकाम हासिल कर लें आखिर में अकेले रह जाना उनकी नियति है, जिसे कोई नहीं बदल सकता
पत्रकारिता से अधिक चेहरे पहचानने का मौका देने के लिए भारत एक्सप्रेस के शीर्ष मैनेजमेंट का शुक्रिया अदा करना चाहता हूं.
यहां रहते हुए मेरी मुलाकात कुछ ऐसे लोगों से भी हुई जिनका फलसफा है जितना लूटना है लूट लो, और लूटे भी क्यों नहीं कुछ बड़े हाथ उसके सिर पर हैं, जिसका प्रमाण मैं शीर्ष मैनेजमेंट को दे दिया था, फिर क्या था मेरी मौजूदगी शायद उसके कुकर्मों की कथा में बाधक होता लिहाजा साजिश का ताना बाना बुना गया, एक मासूम को मोहरा बनाया गया और मेरे शिकार पर निकल पड़े, और फिर वही हुआ जो होता आया है, झूठ के सामने सच हार गया, पाक रिश्तों में दरार पड़ गई, दसवीं फेल लोगों के सामने योग्यता हार गई, ईमानदारी का दम दलाली ने घोंट दिया और उस इबारत पर आखिरी मुहर लग गई.
फितरत देखिए कि अपने झूठ को सच साबित करने के लिए लोगों ने अपने औलाद तक की कसम खा ली थी, ताकि मेरा शिकार कर सकें, लेकिन उनका सच उन्हीं की जुबानी मुझ तक पहुंच गई और सबूत के तौर पर मेरे पास सुरक्षित है.
अधर्म और झूठ के रास्ते पर चलने वालों का मुकम्मल हिसाब करने के लिए मुझे गीता के उपदेशों का भी अनुशरण करना पड़ेगा वो भी करूंगा.
मैं जानता हूं कि इससे मेरा खोया हुआ मयार वापस नहीं आएगा, वो भरोसा फिर से वो अपनापन फिर से हासिल नहीं कर पाऊंगा, जो खो दिया, लेकिन उन मतलबपरस्त मक्कार चेहरों की हकीकत बेपर्दा करनी भी तो जरूरी है.
दोस्तों मैं बताना चाहता हूं कि
मेरे लहजे में जी हुजूर न था
इसके सिवा मेरा कोई कुसूर न था
कुछ लोग तो ऐसे भी मिले जिन्हें ज्यादा इज्जत क्या दे दी, खुद को जिल्ले इलाही समझ बैठे, उन्हें शायद नहीं मालूम है कि कोई भी ताज वो तख्त किसी की किस्मत में हमेशा नहीं होती, और जिस दिन तख्त से उतरे जाओगे उस दिन ये रिश्ता ही काम आएगा, साजिश की लौ से जलाई गई रोशनी के पीछे जो अंधेरा है वो भले दिखती नहीं है पर दुखती जरूर है.
एक दिन झूठ की पट्टी जरूर हटेगी और सच खुद आगे आकर अपनी गवाही देगा, फिर मक्कार चेहरे खुल कर और धुल कर सामने आयेंगे, तब तक शायद बहुत देर हो चुकी होगी
मेरी बातें थोड़ी कड़वी जरूर लगी होगी कुछ लोगों को जिन्हें गुमान है कि वो नहीं तो चैनल नहीं चल पाएगा, उनके लिए मेरी नसीहत इन शब्दों में है कि-
ईश्वर व्यक्ति को गरीबी दे दे पर गलतफहमी न दे!
शुक्रिया उपेन्द्र सर, शुक्रिया राधेश्याम सर, शुक्रिया प्रवीण तिवारी जी और जिन लोगों ने मुझे जितना समझा, हर किसी का शुक्रिया.
शुक्रिया दो पल ही सही साथ देने के लिए, शुक्रिया गलती से ही सही मुझे समझने के लिए, शुक्रिया उन लोगों का जिन्होंने सामने से नहीं बल्कि पीछे से वार किया, शुक्रिया उनका भी जिन्होंने खुद से अलग करने में पल भर भी नहीं लगाया! उन सभी लोगों के लिए ये शब्द लाज़िम है कि–
दिल आज बहुत तकलीफ में है
लेकिन तकलीफ देने वाले तो दिल में हैं
चाहे वो अपने हो या पराए
और हां उपेंद्र जी को भाई मानता था, हूं और रहूंगा, चाहे इस चैनल में था तब भी यहां से जा रहा हूं तब भी.
इस चैनल से जिनके लिए मोहब्बत और जिनके लिए नफरत लेकर जा रहा हूं उसे शिद्दत से निभाऊंगा ये मेरा वायदा है, नफरत इसलिए की वो किसी भी संस्थान के लिए कोढ़ हैं वो जितनी जल्द खत्म हो जाएं बेहतर है.
और चलते चलते अगर किसी का दिल मुझसे आहत हुआ हो तो क्षमा चाहता हूं, किसी मोड़ पर फिर मिलेंगे, मैं जिस लायक भी हूं अगर मेरी जरूरत महसूस हो तो मुझे याद कीजिएगा, खड़ा मिलूंगा.
बहुत व्यथित मन से किसी संस्थान से नहीं बल्कि अपने घर से विदा ले रहा हूं, लेकिन मेरी कलम और मेरा हुनर मेरा संदेश आप तक पहुंचाता रहेगा, जल्द किसी बड़ी जिम्मेदारी और बड़ी भूमिका के साथ नजर आऊंगा.
(इस एक साल के सफर के दौरान पढ़े गए चेहरों, और खुद की जिंदगी में जीए गए हर लम्हों को शब्दों की शक्ल में संकलित कर आपलोगों के सामने पेश करूंगा)
अलविदा
आपका
मुकुंद शाही


