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आज के अखबार : नाम बदलने के सरकारी ‘काम’ की ‘खबर’ देने से चूक गए, नहीं बताया ऐसा पहली बार हुआ

प्रदूषण, कोहरा और एक्यूआई की खबरों के मुकाबले हेडलाइन मैनेजमेंट की खबर और सरकारी मनरेगा योजना से महात्मा गांधी का नाम हटाकर विकसित भारत जी राम जी करने तथा उसे नपुंसक बनाने के खेल को अखबारों में वो महत्व नहीं मिला जो मिल सकता था या मिलना चाहए था। संभव है यह प्रदूषण के कारण हुआ हो या वोट चोरी के आरोपों के कारण हुई बदनामी का नतीजा।

लेकिन प्रचार जारी है। वैसे तो यह बेशर्मी (भले बुद्दिमत्ता की पराकाष्ठा हो) हेडलाइन मैनेजमेंट के अच्छे प्रयासों में है। जनसत्ता की लीड का शीर्षक है, मनरेगा अब ‘जी राम जी’। नभाटा ने लिखा है, मनरेगा से महात्मा गांधी को राम-राम, केंद्र ला रहा कानून, भड़का विपक्ष। हिन्दुस्तान का मुख्य शीर्षक है, मनरेगा को बदलेगी नई सरकार। इसका फ्लैग शीर्षक है, विकसित भारत-जी राम जी बिल लाएगा।

संजय कुमार सिंह

वैसे तो आज दिल्ली के अखबारों में प्रदूषण की खबर सबसे महत्वपूर्ण होनी चाहिए थी। कल मैंने बताया था कि घने कोहरे के कारण प्रधानमंत्री का विमान देर से उड़ा था। आज देशबन्धु की खबर के अनुसार, भारत के मुख्य न्यायाधीश ने खतरनाक स्तर पर पहुंचे प्रदूषण को लेकर गहरी चिन्ता जताई है। कहा है कि प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए व्यावहारिक और प्रभावी आदेश जरूरी हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि प्रदूषण की मार सबसे ज्यादा गरीबों पर पड़ती है और यही अखबार का मुख्य शीर्षक है। अमर उजाला और नवोदय टाइम्स ने भी आज प्रदूषण की खबर को लीड बनाया है। अमर उजाला का शीर्षक है, गैस चैम्बर में बदल रही है राजधानी। कोहरे से ढंकी तस्वीर के ऊपर बड़े अक्षरों में लिखा है, 498 और अपेक्षाकृत छोटे अक्षरों में लिखा है एक्यूआई जहांगीरपुरी में इसके नीचे की लाइन और छोटे लेकिन बोल्ड फौन्ट में है – दिल्ली की औसत एक्यूआई 427 जो बहुत ज्यादा है। इसीलिए हिन्दुस्तान टाइम्स में प्रदूषण की खबर लीड की बराबरी में है और आम पाठक दोनों को समान महत्व ही देगा। दि एशियन एज में लीड के साथ टॉप पर चार कॉलम का बॉक्स है। द टेलीग्राफ की खबर के अनुसार प्रदूषण के कारण दिल्ली में कोहरे का असर विमानों के परिचालन पर पड़ा और इस कारण मोदी व (अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल खिलाड़ी और सुपर स्टार, लियोनेल) मेस्सी भी फंस गए। इंडियन एक्सप्रेस ने बताया है कि दिल्ली में बढ़े प्रदूषण के बीच मेस्सी से जुड़े आयोजन में दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता पहुंची तो स्टेडियम में मौजूद लोगों ने एक साथ एक्यूआई-एक्यूआई के नौरे लगाए। टाइम्स ऑफ इंडिया में भी कोहरे की खबर सेकेंड लीड है और शीर्षक है, कोहरे ने दिल्ली की समस्या को और बढ़ाया क्योंकि दिल्ली की हवा लगातार तीसरे दिन गंभीर (सीवियर) रही।

इसके बावजूद टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड का शीर्षक है – नरेगा, 125 दिन के काम की गारंटी की जगह (नया नाम) जी राम जी लेगा। इंडियन एक्सप्रेस की लीड का शीर्षक है, “सरकार ने नरेगा की शर्तें बदलीं : राज्य भुगतान करेंगे, खेती के लिए रुकेंगे”। एक्सप्रेस ने हाईलाइट करके बताया है कि राज्यों से योजना के 40 प्रतिशत का भुगतान करने के लिए कहा गया है। यही नहीं, अखबार ने यह भी बताया है कि एनडीए से पहले यूपीए ने भी (खेती के लिए) काम रोकने और लागत साझा करने पर विचार किया था। द हिन्दू ने लिखा है कि नए विधेयक के पास होने से मांग आधारित रोजगाार योजना का पूर्ति आधारित होना तय है। हिन्दुस्तान टाइम्स का शीर्षक वही है जो टाइम्स ऑफ इंडिया में है या सरकार का मकसद हो सकता है – यूपीए के मनरेगा की जगह लेने के लिए सरकार जी रामजी लाएगी। देशबन्धु की खबर है, मनरेगा योजना का नाम बदलने की तैयारी में सरकार। मनरेगा अब होगी जी राम जी योजना। अमर उजाला में नाम बदलने की यह ‘खबर’ पहले पन्ने पर नहीं है। नवोदय टाइम्स में यह दो कॉलम की खबर है। शीर्षक है,  मनरेगा की जगह लेगा विकसित भारत जी राम जी, 125 दिन मिलेगा काम। दि एशियन एज में सरकार के इस काम का प्रचार पहले पन्ने पर नहीं है। यहां यह खबर है, विवाद के बीच सरकार मनरेगा की जगह नया कानून पेश नहीं कर पाई। द टेलीग्राफ ने मामले को पूरी तरह स्पष्ट किया है और इसका  शीर्षक हिन्दी में इस तरह लिखा जाता – हे राम : नरेगा की नसबंदी कर दी गई। इसमें वह सब तो बताया ही गया है जो इस योजना को नपुंसक बनाने के लिए किया गया है, यह भी बताया गया है कि महात्मा गांधी के नाम पर चल रही इस योजना को गांधी से हटा कर राम जी के नाम पर कर दिया गया है।

खबर इस प्रकार है – योजना का (नया) नाम ही इसके प्रति सरकारी प्रेम (या बेशर्मी) को दिखाता है। यह इसका छोटा रूप है जो पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण है। शायद ही कभी किसी संसदीय बिल का शॉर्ट फॉर्म पूरे नाम के साथ कोष्ठक के बजाय कोलन से जोड़ा जाता है – इससे यह नाम का ही हिस्सा बन गया है। जैसे यह पक्का करने के लिए कि हर कोई इसे स्वीकृत तरीके से ही लिखे। यही नहीं, नाम के संक्षिप्त रूप में स्पेस शायद ही कहीं दिखाई देते हैं। उदाहरण के लिए, केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय की वेबसाइट अपने मुख्य जॉब प्रोग्राम के पीछे के कानून को “महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (MGNREGA)” बताती है। लेकिन इस एक्ट के प्रस्तावित विकल्प का नाम बिल डॉक्यूमेंट में है जो मंत्रालय ने सांसदों को दिया है – “विकसित भारत- गारंटी फॉर रोज़गार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण): VB-G RAM G बिल 2025” यह अंग्रेजी हिन्दी मिलाकर बनाया गया है। इस कारण कोई भी इसे VBGRAMG विधेयक के रूप में छोटा नहीं करेगा। यह तो हुआ नाम बदलने का काम और शौक तथा उसकी रिपोर्टिंग पर।

अब आते हैं प्रदूषण की विकराल समस्या पर। कहने की जरूरत नहीं है कि प्रदूषण की स्थिति खासी गंभीर है, प्रधानमंत्री विदेश में हैं और दि एशियन एज की लीड है, प्रधानमंत्री और जोर्डन के राजा ने वार्ता की, संबंध मजबूत करेगें। जाहिर है, मजबूत संबंध का लाभ तब होगा जब स्वस्थ रहेंगे। अखबार ने पहले पन्ने पर यह भी खबर दी है कि रामलीला मैदान की रैली में प्रधानमंत्री के खिलाफ नारे लगे। भाजपा ने कांग्रेस के सर्वोच्च नेता से माफी मांगने की मांग की है। आपको याद होगा कि बिहार चुनाव के समय भी किसी ने मंच से गाली दी थी, उसे गिरफ्तार भी किया गया था पर यह सब नहीं बताया गया कि वह कौन था, क्यूं गाली दी वगैरह। कहने की जरूरत नहीं है कि बिहार में तब और अब भी भाजपा की सरकार है लेकिन गाली देने वाले के खिलाफ कार्रवाई या उसकी पहचान सार्वजनिक नहीं है। इसी तरह अब नारे लगाने वाला कौन है पता नहीं है, उसके खिलाफ कार्रवाई दिल्ली पुलिस को करनी है, उसका पता नहीं है लेकिन कांग्रेस के सर्वोच्च नेता माफी मांगें जैसी भाजपाई मांग पहले पन्ने की खबर है। अगर कोई अपराध हुआ है तो कार्रवाई भी होनी चाहिए लेकिन बिना कार्रवाई सिर्फ मांग, प्रचार और हंगामा हेडलाइन मैनेजमेंट की राजनीति है। 

प्रदूषण के मामले को छोड़कर सरकार का प्रचार मीडिया का वाचडॉग से प्रचारक बन जाना है और लोकतंत्र के लिए घातक है। प्रदूषण और उसकी वजह से कोहरा बताता है कि इस सरकार ने इस दिशा में अगर कुछ किया है तो वह कितना कम है और नहीं किया है तो उसे बताना और सरकार पर दबाव बनाना मीडिया का भी काम है। ज्यादातर अखबार प्रचार कर रहे हैं और सरकार लगभग मनमानी कर रही है। तथ्य यह है कि दिल्ली शहर में घनी धुंध है और जहरीली हवा का असर दिख रहा है। कुछ इलाकों में एक्यूआई 500 के करीब तक पहुँच गया है। यह स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक है। धुंध और प्रदूषण के कारण दिखाई देना कम हो गया है। इससे भी फ्लाइट्स रद्द हुईं और यात्रियों को परेशानी हुई। माना जाता है कि मौसम की सर्दी, पराली जलाना, वाहनों और उद्योगों का धुआँ, निर्माण कार्यों से धूल और मौसम में हवा का ठहराव प्रदूषण बढ़ा रहे हैं। ऐसे में सरकार ग्रेप (ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान) के तहत चरण-चार तक की पाबंदियाँ लागू करती है। एक्यूआई ज्यादा होने पर निर्माण कार्य रोकना, पर्याप्त पाबंदियाँ लगाए जाने जैसे उपाय कर रही है। इसके अलावा पुराने वाहनों के प्रवेश पर पाबंदी लगाई गई है और डीजल जेनरेटर की सीमा तय की जा रही है। नर्सरी से कक्षा पांच तक के छात्रों की कक्षाएँ ऑनलाइन/हाइब्रिड कर दी गईं ताकि बच्चों को बाहर निकलने की ज़रूरत कम हो। वर्क-फ्रॉम-होम/हाइब्रिड व्यवस्था को भी प्रोत्साहित किया जा रहा है। आम जनता, विशेष रूप से बच्चों, बुज़ुर्गों और रोगियों को घर में रहने और बाहर निकलते समय प्रोटेक्टिव मास्क पहनने की सलाह दी जा रही है। केंद्र/राज्य सरकार द्वारा क्लाउड सीडिंग जैसे मौसम-निर्भर उपायों का परीक्षण किया गया है (हालांकि परिणाम सीमित रहे)। उच्च-स्तर की निगरानी, चालान/एफआईआर, नियमों के उल्लंघन पर सख्ती जैसे उपाय भी किए जा सकते हैं। केंद्र सरकार ने पराली जलानाा कम करने, फसल अवशेष प्रबंधन मशीनों का वितरण तथा बायोफ्यूल मिश्रण आदि उपायों के लिए नीतिगत समर्थन भी बढ़ाया है (सरकार ने बड़े पैमाने पर फंडिंग और प्रोत्साहन दिए हैं)।

कहने की जरूरत नहीं है कि ये उपाय पर्याप्त नहीं हैं और दीर्घकालक रणनीति, ट्रैकिंग के साथ ठोस नीतियों की जरूरत है और मौजूदा उपाय मौसमी घटनाओं पर ही केंद्रित हैं। कई मामलों में ग्रेप के प्रतिबंध उपाय भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे रहे हैं। इस समस्या का एक और पहलू है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने एक्यूआई की गणना के लिए अपना राष्ट्रीय पैमाना बनाया है। इसमें एक्यूआई शून्य यानी 0 से 500 तक दिखाया जाता है और 500 के ऊपर के रीडिंग को भी “गंभीर” ही माना जाता है, लेकिन सार्वजनिक रिपोर्ट में अधिकतम 500 ही दिखाया जाता है। इसका मतलब हुआ कि एक्यूआई 500 कहने का मतलब है कि यह इससे ज्यादा और बहुत ज्यादा भी हो सकता है और एक तरह से इस पठन का कोई मतलब नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन एक्यूआई की सख़्त मानक नहीं देता है। दूसरी ओर, सरकार ने संसद में कहा है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशा-निर्देश अनिवार्य मानक नहीं हैं बल्कि सुझाव हैं और भारत ने अपने राष्ट्रीय मानक (एनएएक्यूएस) देश-विशेष परिस्थितियों के अनुसार तय किये हैं। कई अंतरराष्ट्रीय मॉनिटर और ऐप अन्य मॉडलों के आधार पर एक्यूाआई दिखाते हैं। इन मॉडलों में एक्यूआई की गणना का आधार, सीमाएँ और अधिकतम मान अलग होते हैं। कुछ मॉनिटर 500 से ज़्यादा एक्यूआई भी दिखाते हैं। इसका मतलब है एक ही प्रदूषण स्तर पर भारत का एक्यूआई अंतरराष्ट्रीय स्तर के एक्यूआई  के बराबर नहीं है। इसलिए, अंतरराष्ट्रीय पैमाने पर देखें तो भारत (या दिल्ली) में स्थिति सुरक्षित स्तर से बहुत ज़्यादा प्रदूषित समझी जाएगी। फिर भी अखबारों में प्रदूषण पर चिन्ता नहीं है तो पाठकों को बताना बनता है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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