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पत्रकारिता बनाम विज्ञापन दलाली : नवभारत अखबार में ब्यूरो चीफ की वैकेंसी!

क दौर था जब पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता था, लेकिन आज मीडिया संस्थान पत्रकारों को रिपोर्टिंग के बजाय विज्ञापन दलाली में धकेल रहे हैं। हाल ही में नवभारत अख़बार ने अंबिकापुर जिले के लिए ब्यूरो चीफ की वैकेंसी निकाली, जिसमें “निश्चित मानदेय” के साथ “इंसेंटिव” का भी जिक्र किया गया है। सवाल यह उठता है कि यह इंसेंटिव आखिर है क्या?

दरअसल, यह पत्रकारिता के नाम पर विज्ञापन जुटाने का टारगेट सिस्टम है, जिसमें पत्रकारों से खबरों के साथ-साथ विज्ञापन लाने की उम्मीद की जाती है। यानी पत्रकार सिर्फ खबर नहीं देगा, बल्कि वह एक मार्केटिंग एजेंट भी होगा।

पत्रकारिता से ज्यादा विज्ञापन की चिंता

आज मीडिया संस्थानों की प्राथमिकता खबरों की विश्वसनीयता नहीं, बल्कि विज्ञापनों की संख्या बन चुकी है। पत्रकारों को या तो बेहद कम वेतन दिया जाता है या फिर वेतन का एक हिस्सा विज्ञापन पर आधारित इंसेंटिव के रूप में तय किया जाता है। नवभारत जैसे मीडिया हाउसों में निकली वैकेंसी इस गिरती साख का उदाहरण है।

मीडिया संस्थानों में अब खबरों की जगह “पेड न्यूज” और “ब्रांडेड कंटेंट” को तरजीह दी जा रही है। संपादकों और मालिकों का दबाव इतना बढ़ गया है कि यदि कोई पत्रकार विज्ञापन लाने में विफल रहता है तो उसका वेतन काट लिया जाता है या फिर उसे नौकरी से ही निकाल दिया जाता है।

स्थानीय पत्रकारिता की दुर्दशा

छोटे शहरों और कस्बों में हालात और भी खराब हैं। कई मीडिया संस्थान स्ट्रिंगर सिस्टम पर चलते हैं, जहां पत्रकारों को कोई स्थायी वेतन नहीं दिया जाता बल्कि विज्ञापन लाने की क्षमता ही उनकी आमदनी का आधार बन जाती है।

नवभारत का यह विज्ञापन इसी सिस्टम की सच्चाई उजागर करता है। इसमें ब्यूरो चीफ को “निश्चित मानदेय” देने की बात कही गई है, लेकिन इसमें यह साफ नहीं किया गया कि यह रकम कितनी होगी और विज्ञापन पर आधारित इंसेंटिव का स्ट्रक्चर क्या होगा?

पत्रकार बनाम मार्केटिंग एजेंट

आज के मीडिया हाउस पत्रकारों को रिपोर्टर के बजाय “विज्ञापन एजेंट” बना रहे हैं। न्यूज़ रूम से ज्यादा महत्व अब एड सेल्स डिपार्टमेंट को मिलने लगा है। पत्रकारों पर कंपनियों के टारगेट पूरे करने का दबाव है, जिससे वे कई बार ऐसे कंटेंट को बढ़ावा देने पर मजबूर होते हैं जो किसी ब्रांड, नेता या व्यापारी के पक्ष में होता है।

नवभारत का विज्ञापन इस गिरावट का जीता-जागता उदाहरण है। पत्रकारों से यह अपेक्षा रखना कि वे रिपोर्टिंग के साथ-साथ विज्ञापन भी लाएं, पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों पर सीधा हमला है।

पत्रकारों का शोषण और मीडिया हाउसों की मनमानी

  1. “निश्चित मानदेय” की धोखाधड़ी:

नवभारत ने निश्चित मानदेय का वादा किया, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया कि यह कितना होगा। कई बार यह रकम इतनी कम होती है कि इससे जीवनयापन संभव नहीं।

  1. “इंसेंटिव” का असली मतलब:

इंसेंटिव यानी विज्ञापन लाओ, तभी कमाई होगी। यदि कोई पत्रकार विज्ञापन नहीं ला पाता तो उसकी आर्थिक स्थिति दयनीय हो जाती है।

  1. स्थायी नौकरी नहीं:

अधिकतर मीडिया संस्थान पत्रकारों को ठेके पर रखते हैं, जिससे वे किसी भी कानूनी दायरे में नहीं आते।

समाधान क्या है?

  1. पत्रकारों के लिए न्यूनतम वेतन गारंटी:

सरकार को चाहिए कि पत्रकारों के लिए न्यूनतम वेतन कानून लागू करे और इसे सख्ती से लागू करवाए।

  1. विज्ञापन और रिपोर्टिंग को अलग किया जाए:

मीडिया संस्थानों को यह स्पष्ट करना होगा कि पत्रकार खबरों की रिपोर्टिंग करेंगे, न कि विज्ञापन बेचेंगे।

  1. पत्रकार सुरक्षा कानून:

पत्रकारों को ठेके पर रखने की जगह स्थायी रोजगार दिया जाए, जिससे वे स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता कर सकें।

  1. मीडिया संस्थानों की जवाबदेही तय हो:

प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया और अन्य संस्थाओं को पत्रकारों के शोषण के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए।

इस मामले को लेकर भड़ास की तरफ से दिए गए नंबर पर बात की गई। रुपेंद्र तिवारी नामक शख्स ने फोन उठाया। निश्चित मानदेय और इंसेंटिव को लेकर उन्होंने बताया कि अनुभव के आधार पर सैलरी तय होगी और ब्यूरो चीफ के पद पर जिसकी नियुक्ति होगी वह जो विज्ञापन लाएगा उसमें से उसे भी हिस्सा दिया जाएगा। नवभारत की अपनी एक विज्ञापन एजेंसी है जिसमें ब्यूरो को शामिल किया जाएगा।

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