नवीन कुमार-
यह किताब लंबे समय से पढ़े जाने की प्रतीक्षा में थी। अगर सेहत और नफे-नुकसान का फौरी मामला न हो तो आप अक्सर अपने गहरे दोस्तों को टेकेन फॉर ग्रांटेड लेते हैं। मैं इस मामले में ख़ुशक़िस्मत हूं कि इस गुस्ताखी पर तमाम अभिनव गालियों का सर्वथा नूतन इस्तेमाल करने के बावजूद वो नाराज़ नहीं होते। खैर, बात किताब पर।

Shivendra Kumar Singh जब यह किताब लिख रहे थे तो लग नहीं रहा था कि कभी पूरी भी होगी। क्योंकि मैं लगभग निश्चिंत था कि जो रायता उन्होंने बिखेर दिया है वो सिमटने से रहा। फिर एक दिन उन्होंने विजयी भाव से एलान किया कि किताब आ गई है तो लगा बस कवर पेज आया होगा। लेकिन सचमुच में पूरी किताब आ गई थी। जबतक किताब के साथ तस्वीर खिंचवाने और लगाने की रस्म निभा पाता तबतक इतने बड़े-बड़े दिग्गजों की लाइन लग चुकी थी कि नेपथ्य में बैठकर दृश्य का आनंद लेना ज्यादा सुखप्रद लगा।
फिर लगने लगा अब पढ़कर ही लिखा जाए। किताब न पढ़ पाने का एक अपराधबोध आहिस्ता-आहिस्ता दिल के मोहल्ले में घरौंदा बनाता चला गया। एक वीभत्स आलस्य को झटकते हुए कल रात “ओपनर्स” को पढ़ने बैठा तो सुबह की चाय पीकर ही सोने गया। मैं कह सकता हूं कि यह किताब नहीं जादू है। यात्रा का जादू। आप इस यात्रा में सहयात्री होते चले जाते हैं। शिवेंद्र पुराने खेल पत्रकार हैं। थोड़ा युवा महसूस करने की गलतफहमी के लिए यहां यह लिखना सुकूनदेह रहेगा कि मुझसे कुछ बड़े भी होंगे। और यह तजुर्बा किताब के हर पन्ने पर नज़र आता है। वो जबरदस्ती के जार्गन में नहीं फंसते। एक नट की तरह झूलती हुई रस्सी पर चलते हुए आपका पूरा ध्यान अपनी नजरों पर रखते हैं। हिलती हुई रस्सी बार-बार डराती है कि कलाकार अब गिरा कि तब गिरा। लेकिन जब वो किनारे पर पहुंचकर लौटने के लिए अपने डग भरता है तो खेल एक विस्मय में बदल जाता है, श्रद्धा में बदल जाता है, ठंडी आह में बदल जाता है। “ओपनर्स” की पहली “गेंद” से लेकर “पारी समाप्ति” तक आप बार-बार इस विस्मय से गुजरेंगे।
शिवेंद्र ने 22गजी मैदान के आरोहण कहानी लिखी है। लेकिन सचिन तेंदुलकर की भूमिका के बाद ही यह कविता में तब्दील हो जाती है। शिवेंद्र ने बार-बार गढ़े हुए बिंबों, प्रतीकों और शिल्प को तोड़ा है। नई चीजें ऐसे ही गढ़ी जाती हैं। दोस्तों के लेखन का मुरीद होना कई बार जलन पैदा करता है। लेकिन यह जलन आपको ख़ाक नहीं करती। गुरूर की आभा से भर देती है। यकीन मानिए, इस किताब को पढ़ते हुए आपको मेरी अदा-ए-रश्क से मोहब्बत हो जाएगी। 753 दावतें उधार होने की कोफ्त के बावजूद यह लिखना जरूरी है कि खेल पत्रकार सिर्फ खेल के क्राफ्ट को साधते हैं, शिवेंद्र ने खेल की संवेदना और साहित्य को साधा है। यह जितना दुर्लभ है उससे कहीं ज्यादा दिलचस्प।
बधाई शिवेंद्र सिंह।
जियो कॉमरेड। कॉमरेड नवीन, निखिल दुबे और हम… तीनों परम दोस्त, परम बैठकीबाज। हम तीनों की दोस्ती अब क़रीब बीस साल पुरानी हो चुकी है। तीनों का कॉमन प्वाइंट इलाहाबाद है। हम पैदाइशी इलाहाबादी हैं और ये दोनों पढ़ने के लिए इलाहाबाद आए थे। परम दोस्त होने के बाद भी तीनों की लाइन–लेंथ बिल्कुल अलग है। एक लेग स्पिनर, दूसरा ऑफ स्पिनर और तीसरा चाइना मैन। लेकिन क़ाबिलियत और समझदारी के मामले में मैं तीसरे नंबर पर हूँ। पहली पायदान के लिए मुक़ाबला निखिल और नवीन में है। निखिल के बताए नोट्स से मैंने एमए किया और नवीन की लिखी स्क्रिप्ट को देश के कई पत्रकारिता संस्थानों में आदर्श टीवी स्क्रिप्ट की श्रेणी में रखकर पढ़ाता हूँ। आज कॉमरेड ने किताब की तारीफ की है तो लग रहा है कि गोल्ड मेडल मुझे मिल गया है। -शिवेंद्र कुमार सिंह


