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जहरखुरानी गिरोह जैसा हो गया है नवभारत टाइम्स अखबार!

पुष्प रंजन-

क्या प्रिंट मीडिया की कोई ज़िम्मेदारी है? प्रेस कौंसिल भी भांग के कुएँ में ग़र्क़ है?

यह वही अखबार है, जिसके संपादक राजेंद्र माथुर हुआ करते थे. दंगा-फसाद, संवेदनशील घटनाओं के समय हेडलाइंस से लेकर हर खबर पर एहतियात बरती जाती थी, कि उसका नकारात्मक प्रभाव पाठकों पर न पड़े. अदालत जाने की स्थिति न हो जाये. अब यही अखबार बेलगाम सोशल मीडिया की तरह उसी तेवर वाली खबरें चला रहा है.

पहले दंगे की रिपोर्टिंग के समय हम “विशेष समुदाय” से अधिक नहीं लिखते थे. सबकुछ सांकेतिक। इशारे से अधिक नहीं, ताकि ज़हर फैले नहीं, और पाठक उस संकेत को समझ जाये.

मोटी तनख्वाह पर काम करने वाले आज के सम्पादक इतना तो समझते हैं, ज़हर बस चुटकी भर डाली जाती है, किलो और बोरियाँ भरकर नहीं. हेडलाइंस और कुछ सेंटेंस में थोड़ा सा ज़हर मिलाना है, बाक़ी पब्लिक बैठी है, उसका रायता फ़ैलाने के वास्ते.

पहले प्रेस कौंसिल की हिदायतें भी समय-समय पर आ जाया करती थी. अब तो जैसे खुला खेल फर्रुखाबादी हो गया है. कोई भी सनसनीखेज़ हेडिंग लगाकर खबर चला दो.

चिरकुट सम्पादक और सड़क छाप अखबार यदि ऐसा करे, तो उनकी अज्ञानता हम इग्नोर कर देते हैं, लेकिन जहाँ प्रोफेशनली ट्रेंड लोग बैठें हों. वो भी नवभारत टाइम्स जैसा अखबार, जिसकी साख बनाने में बरसों लग गए. बड़ा अफ़सोस होता है, यह देखकर!

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