इटावा के वरिष्ठ पत्रकार अरशद जमाल, जो पिछले 21 वर्षों से एनडीटीवी चैनल के जिला संवाददाता हैं और उत्तर प्रदेश सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं, ने 2021 में सैफई मेडिकल यूनिवर्सिटी में हुए पेसमेकर घोटाले का खुलासा किया था। इस घोटाले में आरोपी डॉक्टर समीर सर्राफ पर मरीजों को एमआरआई पेसमेकर बताकर नॉन-एमआरआई पेसमेकर लगाने और उनकी जान जोखिम में डालने के गंभीर आरोप लगे थे।
इस खुलासे के बाद दो वर्षों की कड़ी जांच-पड़ताल के दौरान डॉक्टर समीर सर्राफ को 2023 में जेल भेजा गया और छह महीने बाद उन्हें बर्खास्त भी कर दिया गया। बताया जाता है कि इस खुलासे के बाद पूरे देश में पेसमेकर लगाने की प्रक्रिया में अधिक सतर्कता बरती जाने लगी और 90% तक भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने में सफलता मिली।
पत्रकार अरशद जमाल का कहना है कि उन्होंने हमेशा अपनी पत्रकारिता को ईमानदारी के साथ जनता के सामने प्रस्तुत किया है, लेकिन उनके इस महत्वपूर्ण खुलासे को अपेक्षित प्रसिद्धि नहीं मिली। उन्होंने यह भी कहा कि यदि यही खुलासा कोई राष्ट्रीय स्तर का बड़ा पत्रकार करता तो संभवतः उसे व्यापक सराहना मिलती।
अरशद जमाल ने यह भी बताया कि इस पूरे मामले में शासन ने उनसे शपथपत्र मांगा था, जिसे उन्होंने 75 इनक्लोजर के साथ प्रस्तुत कर दिया है। यदि आवश्यक हो, तो वे शासन को भेजी गई शिकायत की प्रति भी साझा कर सकते हैं।
फिलहाल, उनकी शिकायत शासन स्तर पर लंबित है।
अब दो सवाल हैं। क्या शासन दागियों को बचा रहा है?
दूसरा सवाल- क्या स्वतंत्र और ईमानदार पत्रकारों को उनका हक और पहचान मिल पा रही है? अगर यही घोटाला दिल्ली के किसी पत्रकार ने खोला होता और लगातार फॉलोअप करता तो उसे तुरंत रामनाथ गोयंका अवार्ड मिलता, राष्ट्रीय स्तर पर उसकी तारीफ़ होती लेकिन इटावा का पत्रकार होने के कारण अरशद जमाल की मेहनत को पर्याप्त तवज्जो और सम्मान नहीं मिला!
इस प्रकरण में सीओ सैफ़ई द्वारा की गई जाँच की रिपोर्ट देखें। इसमे कई गंभीर आरोप लगे हैं। इस रिपोर्ट के बाद सीओ नागेंद्र चौबे को सैफई क्षेत्राधिकारी के पद से हटाकर दूसरे क्षेत्र का सीओ बना दिया गया था।








