प्रशांत टंडन-
एनडीटीवी के ऑफिस बदलने के बारे में कई भावुक पोस्ट देख रहा हूं. ऐसा लगता है अपना काम नहीं बल्कि एनडीटीवी में नौकरी करना ही उपलब्धि थी. कई न्यूज़ चैनलों और अखबारों में काम किया। अधिकांश बड़े बैनर थे। किसी की बिल्डिंग, ब्रांड या मैनेजमेंट को लेकर भावुक नहीं हुआ, कभी भी। रात गई, बात गई। दो ही बाते सत्य हैं। मौजूदा समय और काम और मेरा सोशल कॉन्ट्रेक्ट। इन्ही दो लिये काम करता हूं।
अमृता राय-
20 साल बाद NDTV को याद करते हुए समय एक बार फिर चमक उठा। टाइगर मछली के बहाने से मिली दो Tigresses!!
आज वो वक्त है जब अर्चना कॉम्पलेक्स की दीवारें यादों के क़िस्से समेटे बूढ़ी हो रही हैं और चैनल अपना पता बदल रहा है। हम पुरानी दीवारों और दरवाज़ों के बीच यादों की साँसें जोड़ते हुए मिले। डॉक्टर रॉय का अपनापन और मिसेज़ रॉय का सलीका सीखते हुए चैनल ने जो बॉन्डिंग दी कि हम उसके नाम को आज भी जीते जा रहे हैं। चैनल कब का छूट गया लेकिन पहचान ज़िंदा है और अनंत समय तक रहेगा
सधन्यवाद मनीषा और मनीष कलानी। जिनकी जुनून से भरी किताब के विमोचन पर हम मिले। जिस किताब ने मछली टाइग्रेस की पूरी पीढ़ी का शोध प्रस्तुत कर दिया है। यह एक नया प्रयास है जिसमें किसी ने सिर्फ़ टाइगर की फ़ोटो ही नहीं ली बल्कि उसके जीवन और जीन को भी पहचान दिलायी है।

रणथंभोर की सबसे चर्चित और सबसे लंबे समय तक राज करनेवाली ( अब तक) मछली टाइग्रेस के जीवन और प्रजाति की यह अनोखी किताब मनीष के जुनून से साकार हुई और हमें पढ़ने को मिली। जब भी कोई मछली टाइगर को जानेगा इस किताब का ज़िक्र ज़रूर करेगा।
सुशील मोहपात्रा-
अलविदा अर्चना कॉम्प्लेक्स। 1 सितंबर 2008 की बात है। एनडीटीवी से मेरे पास कॉल आया और इंटरव्यू के लिए बुलाया। तब मैं दूरदर्शन में काम करता था। DD की ऑफिस एशियन विलेज में हुआ करता था। एनडीटीवी से सिर्फ तीन किलोमीटर की दूरी पर । इसे पहले मैं कभी अर्चना कॉम्प्लेक्स के अंदर नहीं आया था जरूरत ही नहीं पड़ी थी। जब इंटरव्यू के लिए अर्चना कॉम्प्लेक्स पहुंचा तो रिसेप्शन पर लाल रंग में एनडीटीवी लिखा हुआ था। एंट्री करने के बाद सीढ़ियां चढ़कर दूसरे फ्लोर में पहुंचा। जब सीढ़ियां चढ़ रहा था तो मेरा नजर एक टेम्पलेट पर पड़ी जिस में लिखा हुआ था The world of this week। ये प्रोग्राम मेरे दिल की करीब था। जब गांव में था तब मेरे घर में टीवी नहीं हुआ करता था लेकिन इस प्रोग्राम को देखने के लिए मैं दूसरों के घर चला जाता था। सीढियां चढ़ने के बाद दूसरे फ्लोर पर पहुंचा। सेकंड फ्लोर एक लाल रंग की सोफा पड़ी थी। उसी पर बैठ गया फिर इंटरव्यू शुरू हुई और इंटरव्यू के बाद वापस DD न्यूज के लिए निकल पड़ा। रास्ते में ही था तो एनडीटीवी से कॉल आई कि मेरा सिलेक्शन हो गया है और जीतना जल्दी ज्वाइन कर सकता हूं। फिर 15 सितंबर को एनडीटीवी में ज्वाइन किया। रोज लाल रंग में लिखा एनडीटीवी और सीढ़ियों से मुलाकात होती थी। पता नहीं पिछले 15 सालों में कितने हजार बार सीढ़ियां चढ़े और उतरे होंगे। अर्चना कॉम्प्लेक्स दूसरा घर बन गया था। रोज 10-12 घंटे इस कॉम्प्लेक्स में गुजरती थी। हजारों घंटे इस इस कॉम्प्लेक्स में गुजारे। नए नए लोगों से मुलाकात हुई
।कई लोग आए कई साथी छोड़कर चले गए। कितने बार केक कटे। एनडीटीवी में काम करते हुए कभी लगा नहीं कि अर्चना कॉम्प्लेक्स छोड़ना है।किसी दूसरे चैनल में जाना है। क्योंकि ऐसा लगा अपने परिवार को छोड़कर कहां जाना है।? लगातार छह साल तक salary नहीं बढ़ी लेकिन फिर कर्मचारी लगे रहे, काम करते रहें। सबको एनडीटीवी और अर्चना कॉम्प्लेक्स से प्यार था। एनडीटीवी के कल्चर को समझना सब के लिए आसान नहीं है। आज अर्चना कॉम्प्लेक्स छूट रहा है। एनडीटीवी अर्चना कॉम्प्लेक्स को छोड़कर जा रही है। शरीर को छोड़कर आत्मा जा रही है। 30 साल से ज्यादा समय तक एनडीटीवी अर्चना कोक्लेक्स में ऑपरेट हुआ। अब नोएडा से होगा। अलविदा अर्चना कॉम्प्लेक्स। हम जरूर जा रहे हैं लेकिन तुम्हारी यादें साथ लेकर जा रहे हैं। नई जगह पर तुम नहीं होंगे लेकिन तुम्हारी यादें होंगे।



नीलेश सिंह
July 28, 2024 at 5:46 pm
कोई चैनल देखना नहीं बस पब्लिसिटी स्टंट ही कर रहे हैं अब