इसलिए कोसता हूं एनडीटीवी को

किसी ने मुझसे पूछा था कि मैं एंटरटेनमेंट चैनलों, खासकर एनडीटीवी को इतना कोसता क्यों हूं, पत्रकार (तथाकथित) होने के बावजूद मीडिया को गाली क्यों देता हूं….तो आज इस सवाल का जवाब खोजा।

एनडीटीवी जैसे एंटरटेनमेंट चैनल को गाली देता हूं, क्योंकि यह खुद को सबसे भरोसेमंद होने का स्वयंभू तमगा दे चुका है, यह ‘होलियर दैन दाउ’ बनता है औऱ इसके एंकर व माइकवीर/वीरांगनाएं खुद को स्वयंभू बुद्धिजीवी, कर्तव्यनिष्ठ आदि-इत्यादि भी मानते हैं। ज़ी की कलंक कथा तो इसके संपादक के जेल जाने से खुलकर सामने आ चुकी है, इंडिया टीवी और इंडिया न्यूज़ को डीडी-2 कहा जाता है, सबसे तेज़ चैनल भी क्रिकेट का आल्टरनेटिव चैनल है, तो इन सब पर कहना ही बेकार है। यदि सबसे भरोसेमंद चैनल को मैं कोसूं, तो बाकी को ‘बाइ डिफॉल्ट’ ही गाली पड़ जानी चाहिए। 

अब ज़रा याद कीजिए, क्या किसी भी चैनल ने कजरू के दिल्ली लौटने के बाद उससे मुसलमानों वाले मसले पर सवाल पूछा…किसी ने भी उससे AAP की घमासान पर प्रश्न किए…क्या वामी-कौमी बुद्धिजीवियों की पंचायत लगाकर ‘जनता के स्वयंभू पत्रकार’ ने इस पर उसको कठघरे में खड़ा किया?? नहीं…एक बड़ा नहीं….

इसे छोड़िए। क्या बंगाल में नन के साथ बलात्कार मुद्दे पर जो बाद की बातें निकलकर आयीं, उसे इस कंगाल मीडिया ने दिखाया….क्या उन घटनाओं का फॉलोअप हुआ….अचानक ही जो माहौल बना दिया गया कि मुसलमानों के बाद (??) अब ईसाई भारत देश में ख़तरे में हैं, क्या उनकी व्यर्थता साबित होने के बाद उनके फॉलोअप दिखाए गए, माफी मांगी गयी? आखिर क्यों, मंदिरों में होने वाली चोरी या तोड़फोड़ तो महज चोरी की घटनाएं होती हैं, अपराध होते हैं, जबकि मस्जिदों और चर्चों में होनेवाली घटनाएं सांप्रदायिक हो जाती हैं…क्यों? यह तथाकथित मीडिया इस तरह की खास मानसिकता से क्यों ख़बरों को पेश करता है…..क्यों?

बाक़ी, प्रश्न या सवालों की चर्चा तो मैं इसलिए नहीं करूंगा कि वह तो बुनियादी सवाल हैं, कि यह मीडिया क्या दिखा रहा है और ख़बर की कौन सी परिभाषा गढ़ रहा है?

मैं इसीलिए इन एंटरटेनमेंट चैनलों को लगातार कोसता रहूंगा और जिन पर मेरा प्रभाव है, या जो मेरी बात मानते हैं…..उनको भी कहूंगा कि वे भी इनको कोसते रहें….

व्यालोक पाठक के फेसबुक वॉल से



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