राहुल पांडेय-
काठमांडू में कुछ पत्रकारों से अभी बात हुई। हालात अभी भी बेहद अशांत हैं, सेना सत्ता न तो संभालना चाहती है, और न ही बहुत दिन तक वह सड़कों पर रहना चाहती है। वहां की सेना पाकिस्तान या बांग्लादेश की सेना की तरह नहीं है, कि जब कोई नहीं आगे आता तो सैन्य अफसर आएंगे- ऐसा पत्रकारों का कहना है।
मुझे जेन Z को भी लेकर शक था कि क्या वाकई यह आंदोलन जेन Z का है? काठमांडू से इस बाबत जो पता चला, वो यह कि सोशल मीडिया ने महज जेन Z के लिए एक ट्रिगर का काम किया, लेकिन बमुश्किल एक ही दिन में यह आंदोलन या यह विद्रोह उनके हाथ से निकल चुका था।
मसलन, कांतिपुर मीडिया हाउस में जो आग लगाई गई, जिन पत्रकारों को निशाना बनाया गया, उसमें इस जेनरेशन का कोई रोल नहीं है। भारतीय मीडिया संस्थानों से भीषण नाराजगी है, और इस नाराजगी में घी डालने का काम किया इनकी उड़ाई सुशीला कार्की वाली अफवाह ने।
सुशीला कार्की को जेन Z हो, या इस विद्रोह में शामिल अन्य संगठन- कोई पसंद नहीं करता है। अंदाजा यह भी है कि आंदोलन के दौरान तो भारतीय मीडिया वाले नहीं पिटे, लेकिन अब इतनी ज्यादा नाराजगी है कि कभी भी इनको कायदे से पीटा जा सकता है।
इसकी वजह नेपालियों के इस आरोप में है कि वे नेपाल, इस आंदोलन और वहां के समाज के बारे में कतई कुछ नहीं जानते, और ऑपरेशन सिंदूर की तरह सिर्फ अफवाहबाजी करते हैं। अन्य संगठन कौन से शामिल रहे, इस सवाल के जवाब में पता चला कि इसमें हिंदू संगठन तो शामिल थे, लेकिन उनका रोल उतना नहीं रहा, और कहीं इन्होंने बढ़ने की कोशिश की तो इन्हें भीड़ ने पीछे धकेल दिया।
राजा के रोल के बारे में यह पता चला कि उसके लोगों का प्रभाव भी इस आंदोलन में कुछ खास नहीं रहा, हालांकि मुझे इस जानकारी पर अभी शक है। वहां से भागे नेताओं में से कई ने तो यूपी के सिद्धार्थनगर में शरण ले रखी है। अभी तक इतनी ही जानकारी मिल पाई है, काठमांडू में कनेक्शन बहुत ड्रॉप हो रहा है, तीन दिन से लगातार ट्राई करते करते किसी तरह से आज बात हो पाई।
(फोटो में कांतिपुर मीडिया हाउस में लगी आग है, जो जेन Z ने नहीं लगाई है)



VP dubey
September 12, 2025 at 9:43 pm
Yha godi media k office me kab lagegi