नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सांसद निशिकांत दुबे ने वरिष्ठ पत्रकार अभिसार शर्मा का आयकर रिटर्न (ITR) सार्वजनिक करने के बाद एक और ट्वीट किया है। दुबे का दावा है कि कुछ पत्रकारों की आय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा की आलोचना करने से करोड़ों में पहुँच गई है। उनके इस कदम ने राजनीतिक और मीडिया जगत में तीखी प्रतिक्रिया पैदा कर दी है।
दुबे, जो झारखंड के गोड्डा से सांसद हैं, ने 29 अगस्त को एक अन्य पत्रकार का आईटीआर ट्वीट करते हुए लिखा—
“बड़े ईमानदार पत्रकार हैं, वैसे भाई कांग्रेसी है, बैंक का एक खाता संभालना मुश्किल है, साहब का एक्सिस बैंक, कोटक महिंद्रा, स्टैंडर्ड चार्टर्ड, दूसरा खाता कोटक महिंद्रा और स्टेट बैंक में खाता है, नौकरी छोड़ो पांचों उंगली घी में।”
पत्रकारों की प्रतिक्रियाएं-
वरिष्ठ पत्रकार नरेंद्र नाथ मिश्रा ने लिखा— “जब कोई सत्तारूढ़ सांसद अपने पद का दुरुपयोग करते हुए सामान्य नागरिक को सार्वजनिक मंच पर परेशान करने लगे और समाज का एक हिस्सा इसे प्रोत्साहित करे, तो यह बेहद चिंताजनक है। इतिहास भूलने वाले उसे दोहराने को अभिशप्त होते हैं।”
पत्रकार अरविंद गुणसेकर ने सवाल उठाया— “क्या यही भाजपा सरकार चुनावी बॉन्ड मामले में सुप्रीम कोर्ट में यह तर्क नहीं दे रही थी कि आईटीआर सार्वजनिक करना निजता का उल्लंघन है? आईटीआर सार्वजनिक करना आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 138 का स्पष्ट उल्लंघन है।”
पत्रकार नितिन सेठी ने लिखा— “सत्तारूढ़ पार्टी का सांसद सरकारी रिकॉर्ड से पत्रकार की निजी जानकारी अवैध रूप से निकालता है, ताकि उसके खिलाफ माहौल बनाया जा सके। वही सरकार डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट पास कर चुकी है, जिसके जरिए पत्रकारों और कार्यकर्ताओं को जवाबदेह ठहराना मुश्किल बना दिया गया है।”
पत्रकार सर्वप्रिया सांगवान ने सीधे सवाल किया— “क्या लोगों का डेटा सरकार के पास सुरक्षित है? जवाब स्पष्ट है।”
कानूनी प्रावधान
- भारत में किसी का आयकर रिटर्न (आईटीआर) लीक करना गंभीर अपराध है।
- आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 138 और 280: बिना अनुमति आईटीआर साझा करने पर 6 महीने जेल और जुर्माना।
- आईटी एक्ट, धारा 72 और 72A: डिजिटल लीक पर 3 साल की कैद और 5 लाख तक जुर्माना।
- डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट: 250 करोड़ तक जुर्माने का प्रावधान।
- ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट: 3 साल तक कैद का प्रावधान।
बड़ा सवाल
सांसद के रूप में निशिकांत दुबे का यह कदम कई कानूनी प्रावधानों के उल्लंघन के दायरे में आता है। संवैधानिक पद की शपथ लेने वाले व्यक्ति द्वारा किसी नागरिक की निजी जानकारी को सार्वजनिक करना न केवल निजता के अधिकार पर हमला है, बल्कि आलोचकों को डराने का प्रयास भी माना जा रहा है।
अब सवाल यह है कि क्या संसद या संबंधित विभाग इस पर कोई कार्रवाई करेंगे? फिलहाल इतना साफ है कि इस विवाद ने मीडिया स्वतंत्रता और निजता को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
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