अजीत भारती-
क्या यह नितिन गडकरी के बेटे की कंपनी है? जी हाँ। इसे निखिल गडकरी चलाते हैं। इथेनॉल बनाती है। पाँच साल में 22-गुणा बढ़ी है। दूसरे बेटे सारंग, मानस एग्रो चलाते हैं, वो अनलिस्टेड है, इथेनॉल बनाती है। मानस का रेवेन्यू 2021 में ₹5990 करोड़ था, जो 2024 में ₹9591 करोड़ हो गया।

नितिन गडकरी का इथेनॉल ब्लेंडिंग से कोई संबंध नहीं होना चाहिए क्योंकि वह हरदीपसूरी मंत्रालय है। टार्गेट भी 2030 का था 20% ब्लेंडिंग का, फिर गडकरी यह कह कर क्यों नाचते रहते हैं कि 2025 में ही पूरा हो गया?
नरेंद्र मोदी जी, क्या यह ‘खाने दूँगा’ के अंतर्गत नहीं आता? क्या यह स्पष्ट रूप से ‘कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट’ नहीं है? किसी की कंपनी आगे बढ़े, कोई समस्या नहीं, परंतु जबरन हर गाड़ी में, बिना शोध के, अपनी कंपनियों के लाभ के लिए, करोड़ों लोगों की पॉकेटमारी कैसे हो रही है? इस पर वृहद जाँच होनी चाहिए।
शीतल पी सिंह-
एथेनाल से आपकी कार मोटरसाइकिल स्कूटर की माइलेज कम हो रही है और आपकी मेनटेनेंस का ख़र्च बढ़ रहा है। लेकिन यह कहीं जाकर जमा हो रहा है, काफ़ी कुछ तो हो चुका है!
लेकिन चूंकि हिंदू ख़तरे में है इसलिए इस सूचना पर ध्यान नहीं देना है।
सायन एग्रो इंडस्ट्रीज गडकरी के बेटे निखिल के स्वामित्व में है। कंपनी ने जून 2024 में सिर्फ 18 करोड़ रुपये का राजस्व पोस्ट किया था।


अब जून 2025 में इसने 510 करोड़ रुपये का राजस्व पोस्ट किया है, जो 28 गुना बढ़ा है। 2024 में एकाएक इसने एथेनाल के व्यापार में हाथ डाला और…
- राजस्व वृद्धि: जून 2024 में 18 करोड़ रुपये से जून 2025 में 510 करोड़ रुपये हो गया, जो लगभग 28 गुना वृद्धि दर्शाता है।
- स्वामित्व: कंपनी गडकरी के बेटे निखिल के स्वामित्व में है।
तो गडकरी साहब के बेटे ने शाह साहब के बेटे का रिकार्ड तोड़ दिया! बड़े लोगों के बच्चे बड़े प्रतिभाशाली होते हैं भई! -अशोक कुमार पांडेय

रूबी अरुण-
एक खबर बहुत चर्चा में है. NitinGadkari के बेटे निखिल गडकरी की. कि उनकी महज 17 करोड़ के लागत की कंपनी CIAN Agro की कमाई सिर्फ जून 2024 से 2025 के दरम्यान ही 510 करोड़ की हुई है. यह इथेनॉल उत्पादन और उसके इस्तेमाल से जुड़ी है.
कंपनी के 2025 के आंकड़ों में नेट प्रॉफिट 41 करोड़ और रेवेन्यू 1054 करोड़ है. यह वही इथेनॉल है जिसके बारे में गडकरी जी ने कहा था कि अब देश में इथेनॉल मिले पेट्रोल से गाड़ियां चलेंगी.
और यह वही इथेनॉल है जो शराब में मिलाई जाती है. सोवियत वायु सेना के जवानों के बारे में पुरानी कहानियाँ हैं जो अपने विमानों के इथेनॉल ईंधन को चुराकर शराब पीते थे.
इथेनॉल एक प्रमुख रासायनिक यौगिक है, जो एक मिश्रण के रूप में पेट्रोल में भी मिलाया जा सकता है, अल्कोहलिक पेय उत्पादों में भी, औषधियों के रूप में भी और कॉस्मेटिकस में भी.


तो अब #Chronology समझिए…
सन 2022 में नितिन गडकरी ने अपनी कंपनी पूर्ति समूह से दो अलग अलग कंपनियां बनाई –मानस एग्रो और सीआईएएन एग्रो इंडस्ट्रीज.
फिर इन कंपनियों को पूर्ति समूह से अलग करके इन दोनों की कमान अपने बेटों सारंग और निखिल को सौंप दीं. इन कंपनियों का प्रमुख उत्पाद इथेनॉल है. फिर मानस एग्रो इंडस्ट्रीज ने रम और व्हिस्की के ब्रांड बाजार में पेश कर दिए.
कंपनी कप्तान और होल स्टोन नाम से शराब का उत्पादन कर रही है. शुरु में कंपनी का एक शेयर डेढ़ साल पहले मात्र 40 रुपये का था. महा डेढ़ साल में वो 40 रुपए का एक शेयर 668 रुपये का हो गया.
क्योंकि नितिन गडकरी ने पेट्रोल में 20% एथनॉल का इस्तेमाल अनिवार्य कर दिया. तर्क ये दिया कि इससे किसानो को फायदा मिलेगा और पेट्रोल खपत कम होने से हमें मुसलमान देशों से कम तेल खरीदना पड़ेगा..
मतलब कि प्रचंड राष्ट्रवाद की चादर भी ओढ़ ली. देश की जनता को क्या मिला? इथेनॉल के इस्तेमाल से गाड़ियों के इंजन खराब होने लगे. गाड़ियों की माइलेज कम हो गई. इथेनॉल के इस्तेमाल से खराब हुई गाड़ियों पर इंश्योरेंस कंपनी वालों ने हाथ खड़े कर दिए की हम इसका बीमा नहीं देंगे….
मतलब कि देश की जनता को राष्ट्रवाद के नाम पर बेवकूफ बना कर गडकरी ने अपनी और अपनी अगली नस्लों की भी जेब भर ली… इसमें गडकरी की गलती नहीं है, हम और हमारी नस्लें, हैं हीं इसी लायक.…
अभिषेक सिंह-
कमाल का मॉडल है काश देश के हर युवा उद्यमी के पास ये मॉडल होता तो कितना रोजगार सृजन होता कितनी जीडीपी ग्रोथ होती लेकिन देश का दुर्भाग्य कि नितिन गडकरी जी ने ये मॉडल सिर्फ अपने पुत्र को दिया । निखिल गडकरी की कंपनी Cian Agro का जून 2024 में रेवेन्यू 17 करोड़ रुपए था और जून 2025 में 510 करोड़ रुपए हो गया है यही कुछ 3000% की ग्रोथ हुई है इसी बीच गडकरी जी ने एथनॉल से हमारी आपकी टंकी फुल कर दी है वैसे तो भाजपा की ईमानदारी की कसम मुझे इसमें कुछ गलत नहीं लग रहा है पर पिताजी के तौर पर नितिन जी अमित भाई से बेहतर पिता हैं ।

अगर किसी को Exponential Growth समझने में मदद चाहिए, तो गडकरीपुत्र हाजिर हैं पूरी मदद लेकर। देशभर के वाहनमालिक इस ग्रोथ की कहानी लिखने में गिलहरी से लेकर वानर तक वाला योगदान कर रहे हैं। निश्चित स्वेच्छा से नहीं।
-सुभाष सिंह सुमन
अनुमा आचार्य-
गडकरी परिवार और एथेनॉल का कारोबार: एक खोजी नज़र
सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी बार-बार देश में एथेनॉल ब्लेंडिंग का महत्त्व गिनाते रहे हैं. उनका तर्क है कि पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने से आयात बिल घटेगा और किसानों को गन्ने की अतिरिक्त खपत से आय बढ़ेगी. लेकिन कहानी का दूसरा पहलू यह है कि गडकरी परिवार खुद इसी कारोबार से जुड़ा हुआ है.
कंपनियाँ और आंकड़े:
गडकरी के बड़े बेटे निखिल गडकरी CIAN Agro Industries & Infrastructure Ltd. के मैनेजिंग डायरेक्टर हैं. इस कंपनी का FY2018-19 में टर्नओवर लगभग ₹133 करोड़ था और निखिल का वार्षिक वेतन करीब ₹96 लाख. वहीं FY2024-25 तक यही कंपनी ₹263.9 करोड़ तक पहुँच गई। यानी बीते छह-सात सालों में कंपनी की आय लगभग दोगुनी हो गई है.

दूसरी तरफ़, छोटे बेटे सारंग गडकरी Manas Agro Industries & Infrastructure Ltd. (MAIIL) चलाते हैं. इसी कंपनी के पास 120 KLPD क्षमता वाला एथेनॉल डिस्टिलरी प्लांट है, जो पेट्रोल कंपनियों को सप्लाई करता है. कंपनी की वेबसाइट से लेकर पर्यावरणीय मंजूरी दस्तावेज़ तक साफ़ लिखते हैं कि “Ethanol is the flagship product.”
नीति और कारोबार का संगम:
दिलचस्प बात यह है कि वही एथेनॉल ब्लेंडिंग नीति, जिसे केंद्र सरकार ने तेज़ी से लागू किया, सीधे तौर पर गडकरी परिवार की कंपनियों के कारोबार को भी मज़बूत करती दिख रही है. सवाल उठते हैं कि नीति और निजी कारोबार का यह मेल क्या महज़ संयोग है या योजनाबद्ध लाभ !
इंजन की उम्र पर असर:
तकनीकी विशेषज्ञ मानते हैं कि एथेनॉल मिलावट से कार्बन उत्सर्जन घटता है, पर एक साइड-इफ़ेक्ट भी है, कि 10% से 20% तक की ब्लेंडिंग पर पुराने इंजन जल्दी घिसने लगते हैं. एथेनॉल में पानी खींचने की प्रवृत्ति ज़्यादा होती है, जिससे ईंधन टैंक और पाइपलाइन में जंग बढ़ सकती है. छोटे शहरों में जहाँ अभी भी पुरानी गाड़ियाँ चल रही हैं, वहाँ उपभोक्ता को लंबे समय में खर्च का बोझ झेलना पड़ सकता है.
कुल मिलाकर, आंकड़े साफ़ बताते हैं कि गडकरी परिवार का कारोबार अब “एथेनॉल इकोनॉमी” का बड़ा खिलाड़ी है. यह सवाल स्वाभाविक है कि जब नीति-निर्माण और कारोबार दोनों एक ही परिवार के हाथ में हों, तो जनता की जेब और इंजिन की घटती उम्र की असल कीमत कौन चुका रहा है?


