ऐसे आरोपों के दौर में मीडिया की न बचाव-मुद्रा अच्छी, न हमलवार : ओम थानवी

नेताओं की गाली पड़ते ही मीडिया गोलबंद अर्थात एक हो जाता है। मनमोहन सिंह ने मीडिया पर कपट का आरोप लगाया था, मोदी ने बाजारू कहा, केजरीवाल ने सुपारीदार, वीके सिंह और अन्य अनेक नेता भी भद्दी उपमाएं इस्तेमाल कर चुके हैं। भद्दे प्रयोगों का निश्चय ही प्रतिकार होना चाहिए।

ऐसे हमलों की घड़ी में एक होना या जवाबी हमला करना एक बात है; मगर क्या ऐसे मौकों का इस्तेमाल आत्मनिरीक्षण के लिए नहीं किया जाना चाहिए? हो सकता है, हमारे पेशे का कोई हिस्सा सचमुच बेईमान, षड्यंत्रकारी, सांप्रदायिक या ब्लैकमेलर निकले? एकाध के धतकरम को तो आप बगैर जाँच, सुबह और शाम, खुद भांप सकते हैं!

मैंने पहले भी ध्यान दिलाया था कि जब शेयर बाजार के अस्वाभाविक उछाल के लिए चंडीगढ़ प्रेस क्लब में मनमोहन सिंह ने मीडिया को बुरा-भला कहा, तब मीडिया में कड़ी प्रतिक्रिया हुई थी। संपादकों की सर्वोच्च संस्था एडीटर्स गिल्ड (जिसमें टीवी चैनलों के संपादकों को शामिल करने की शुरुआत का श्रेय मेरे कार्यकाल को जाता है!) में भी यह मामला उठा। मामन मैथ्यू गिल्ड के अध्यक्ष थे, मैं महासचिव। हमने प्रधानमंत्री की निंदा नहीं की, महान संपादक (अब दिवंगत) अजीत भट्टाचार्जी की सदारत में एक जाँच-समिति गठित कर दी। समिति ने रिपोर्ट दी कि मनमोहन सिंह के आरोप सही हैं, मीडिया (सम्पूर्ण नहीं) का आचरण आचार संहिता के विपरीत था।

आरोपों के दौर में मीडिया की न बचाव-मुद्रा अच्छी होती ही न हमलवार। अगर संगीन आरोप बिरादरी पर लगते हैं तो संजीदगी और ईमानदारी से उच्चस्तरीय जाँच करानी चाहिए, बेईमान चैनलों-अखबारों के लाइसेंस रद्द करने की सिफारिश होनी चाहिए। जाँच कौन करे? अदालतों की प्रक्रिया पेचीदा है और खर्चे बड़े हैं। मीडिया की अपनी संस्थाएं जाँच कर सकती हैं, पर सजा की कार्रवाई नहीं कर सकतीं।

मजा यह है कि मनमोहन सिंह भी हमें कोस जाते हैं और मोदी भी, पर केंद्र में आज तक प्रेस परिषद के अलावा कोई संस्था नहीं जिसमें मीडिया वाले हों और जो मीडिया पर लगे आरोपों की जाँच करती हो। परिषद का गठन सरकारी मरजी और शैली का होता है। फिर परिषद कई दफा भले अपने फैसलों में मीडिया को दोषी ठहराती है, लेकिन वह किसी का कुछ बिगाड़ नहीं सकती क्योंकि उसके पास कोई अधिकार ही नहीं हैं – अध्यक्षों के बड़बोलेपन के सिवा।

कोई स्वायत्त अधिकरण बनना चाहिए न्यायमूर्तियों और मीडियामूर्तियों का, जिसके पास पत्रकारों के अलावा नेताओं, मालिकों, विज्ञापनदाताओं आदि के खिलाफ भी गहन जांच और समुचित त्वरित कार्रवाई के अधिकार हों।

जनसत्ता के संपादक ओम थानवी के एफबी वॉल से

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

Comments on “ऐसे आरोपों के दौर में मीडिया की न बचाव-मुद्रा अच्छी, न हमलवार : ओम थानवी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *