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“वन्स अपॉन ए टाइम इन यूपी”—शेर-ए-अवध की हत्या और श्रीप्रकाश शुक्ला की कसम!

पंकज शुक्ला-

बात अभी कुछ साल पहले की ही है। उत्तर प्रदेश के आईएएस अभिषेक सिंह की बड़े परदे पर लॉन्चिंग लायक एक विषय मुझसे पूछा गया। तब मैंने एक स्क्रिप्ट लिखी, “वन्स अपॉन ए टाइम इन यूपी”। ये अस्थायी शीर्षक था फ़िल्म का। लेकिन ये कहानी थी, एक दबंग नेता ब्रह्मदत्त द्विवेदी की हत्या का बदला लेने की कसम खाने वाले श्रीप्रकाश शुक्ला की जिसमें अभिषेक को श्रीप्रकाश का किरदार करना था।

फ़िल्म का जो पोस्टर मैंने सोचा था, वह था हनुमानजी की एक विशालकाय मूर्ति की तरफ मुंह किए खड़ा एक बलिष्ठ युवक जो सिर्फ लंगोट पहने हैं। कांधे पर धवल जनेऊ है। सिर्फ लंगोट पहने खड़े इस युवक के हाथ में एक कट्टा है। कट्टा यानी देसी पिस्तौल जिससे एक बार में बस एक फायर हो सकता है।

श्रीप्रकाश शुक्ला को रेलवे ठेकेदारी का बड़ा बदमाश दिखाकर उसके एनकाउंटर तक की कहानी कहती एक फ़िल्म ‘सहर’ जब वरिष्ठ पत्रकार घनश्याम पंकज के बेटे कबीर कौशिक ने बनाई तब उसमें श्रीप्रकाश शुक्ला को विलेन दिखाया गया था। मेरी कहानी का श्रीप्रकाश ब्लैक एंड व्हाइट न होकर ग्रे था। एक ऐसा ब्राह्मण दबंग जो रईसों से लूटी दौलत से गरीब परिवारों की बेटियों की शादियां करवाता था।

फ़िल्म ‘सहर’ के क्रेडिट्स में कबीर कौशिक ने मुझे भी धन्यवाद ज्ञापित किया और इसी दौरान मेरा सीनियर आईपीएस अफसर अरुण कुमार (जिनसे प्रेरित होकर ये फ़िल्म बनी) से घनिष्ठ परिचय भी हुआ। ‘सहर’ के स्पेशल प्रिव्यू शो में उनकी पत्नी मेरी ठीक बगल वाली कुर्सी पर बैठी थीं और फ़िल्म का क्लाइमेक्स देखकर देर तक असहज भी रहीं।

ख़ैर, बात हो रही थी उत्तर प्रदेश में बीजेपी के उस ब्राह्मण नेता की, जिसके मुख्यमंत्री बनने की राह उसकी मौत ने काट दी थी। कानपुर, लखनऊ, कन्नौज, फर्रूख़ाबाद परिक्षेत्र में उसे शेर ए अवध के नाम से पुकारा जाता था। कविताएं लिखने वाले इस व्यक्ति को न सिर्फ कानून की गहरी समझ थी बल्कि वह छोटे से छोटे कार्यकर्ता के दुख सुख में सबसे पहले शामिल दिखाई देता।

ब्राह्मणों का उत्तर प्रदेश की राजनीति में ऐतिहासिक महत्व रहा है। लेकिन, सच ये भी है कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के बाद दूसरा कोई ब्राह्मण नेता किसी भी पार्टी का फिर मुख्यमंत्री नहीं बन पाया। नारायण दत्त तिवारी का आख़िरी कार्यकाल दिसंबर 1989 तक रहा। उत्तर प्रदेश के सवर्ण वोटरों में ब्राह्मण मतदाताओं की तादाद 10 प्रतिशत से अधिक रही है। ब्रह्मदत्त द्विवेदी इसी ब्राह्मण राजनीति के दमकते चेहरे रहे।

नई पीढ़ी को भले याद न हो लेकिन बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती को इस वोट बैंक की अहमियत काफी पहले समझ आ गई थी। इस वोट बैंक के ठेकेदार बनकर कई नेताओं ने बीएसपी सरकार में मलाई भी काटी। लेकिन, जिस पहले ब्राह्मण नेता ने 1995 में हुए चर्चित गेस्टहाउस कांड में उनकी जान बचाई, उसे मायावती चाहकर भी अपना टर्म पूरा होने के बाद बीजेपी और बीएसपी की साझा सरकार में मुख्यमंत्री नहीं बनवा पाईं।

उस समय रणनीतिक समीकरण ये बना था कि बीजेपी और बीएसपी गठबंधन की सरकार बनने पर पहले ढाई साल मायावती को और बाद के ढाई साल बीजेपी के किसी नेता को मुख्यमंत्री बनना था। लेकिन, मायावती पहली अवधि में ही बीजेपी का मुख्यमंत्री बनाना चाहती थीं और ब्रह्मदत्त द्विवेदी उनकी पहली पसंद थे।

द्विवेदी सिर्फ बीजेपी के अंदर ही नहीं, अन्य दलों के नेताओं के बीच भी प्रिय थे। मायावती की तरफ से उनका सम्मान इस बात का प्रमाण था कि वे राजनीतिक विरोधियों के बीच भी भरोसे का चेहरा बन सकते थे। उनकी पत्नी प्रभा द्विवेदी को हालांकि बाद में बीजेपी ने विधायक बनाया और बाद में वह मंत्री भी बनीं।

ब्रह्मदत्त द्विवेदी 10 फरवरी 1997 की रात फर्रुखाबाद में एक तिलक समारोह के बाद, अपनी कार में बैठ रहे थे। तभी उन पर गोलीबारी हुई। इस हमले में उनका गनर भी मारा गया और ड्राइवर भी घायल हुआ। अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर मुरली मनोहर जोशी और लाल कृष्ण आडवाणी तक सब, तब उनके घर आए थे। अटल बिहारी वाजपेयी तो तेरहवीं के बाद फिर उनके सारे सगे संबंधियों से मिलने उनके घर पहुंचे।

उस समय सूबे में राष्ट्रपति शासन था और हत्या की जांच CBI को सौंप दी गई थी और इसके बाद चार्जशीट पेश की गई थी। ब्रह्मदत्त द्विवेदी की हत्या किसने की? किसके इशारे पर की? श्रीप्रकाश शुक्ला ने उनकी पत्नी के सामने गंगा में खड़े होकर किसे मारने की कसम खाई? और, इस पूरे हत्याकांड के पीछे की असली कहानी क्या है, इसी पर लिखी गई थी फ़िल्म, “वंस अपॉन ए टाइम इन यूपी।”

ब्रह्मदत्त द्विवेदी की कहानी सिर्फ एक हत्या की कहानी नहीं है। यह उत्तर प्रदेश की सियासत के उस जाल का प्रतिबिंब है जिसमें जाति, सत्ता और राजनीति गहरे उलझे हुए हैं। एक ब्राह्मण नेता, जिसका आने वाले दिनों में मुख्यमंत्री बनना तय माना जा रहा था, उसे सत्ता के इसी खेल में न सिर्फ़ अड़चन का सामना करना पड़ा, बल्कि उसकी जान भी चली गई।

फोटो : एआई से निर्मित।

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