
मानसिक स्वास्थ्य संकट पर सुप्रीम कोर्ट का निर्देश, अश्लील व आपत्तिजनक सामग्री परोसने वाले ओटीटी प्लैटफॉर्म पर प्रतिबंध और बेडरूम से अश्लील सामग्री का सीधा प्रसारण जारी। लेकिन स्टैंडअप कॉमेडी करने वालों की सुरक्षा-सुविधा पर कुछ नहीं। देश में लोग वही पढ़ें, देखें, जानें, सुनें जो सरकार चाहती है? किसी को अश्लील फिल्में देखना या मजाक करना-सुनना पसंद है तो सरकार को क्या दिक्कत है? क्यों होनी चाहिये? सरकार ना सेंसर बोर्ड हो सकती है ना इमरजेंसी की सेंसर।
संजय कुमार सिंह
डबल इंजन वाले राजस्थान के एक स्कूल की छत गिरने और उसमें सात बच्चों की मौत की खबर तो आज ठीक से छपी है लेकिन ओटीटी प्लैटफॉर्म बंद करने की केंद्र सरकार के आदेश को खबर के रूप में कम महत्व मिला है। मुझे लगता है कि डिजटल इंडिया का प्रचार और ओटीटी प्लैटफॉर्म बंद करना परस्पर विरोधी है। वैसे भी देश की आम जनता को डिजिटल इंडिया का नुकसान ज्यादा, फायदा कम है। यही नहीं नुकसान तो तत्काल प्रभाव से शुरू हो चुका है फायदों को लिये इंतजार करना पड़ेगा जैसा माहौल है। उदाहरण के लिए, सरकार को जरूरत या पसंद है तो एक देश एक चुनाव का शोर ज्यादा है लेकिन आधार कार्ड से वोट देने की सुविधा की चर्चा भी नहीं है। आप जानते हैं कि 2014 में सत्ता में आने से पहले नरेन्द्र मोदी आधार के विरोधी थे और सत्ता में आने के बाद आधार को कितना जरूरी कर दिया है। यही हाल जीएसटी का है। दूसरी ओर, बैंकों के लेन-देन डिजिटल होने से फायदा कम नुकसान ज्यादा है। खुले पैसे या रुपये का झंझट तो कम हुआ है पर खाते से लाखों रुपये हवा हो जा रहे हैं, ज्यादातर मामले में कोई सुराग नहीं लग रहा है। सरकार इन मामलों की जांच और इसपर रोक लगाने के लिए कितना चिन्तित है वह तो पता नहीं चलता है लेकिन 2008 में जमीन खरीदकर 2012 में बेचकर 50 करोड़ रुपये से ज्यादा कमाने के मामले की जांच और उसपर कार्रवाई अब चल रही है। कहिये कि अब गंभीर हुई है या चार्जशीट दायर हुई है।
गाजियाबाद में फर्जी दूतावास 10 साल से चल रहा बताया जाता है। पकड़ा अब गया है और आज नवोदय टाइम्स में छपी खबर से पता चला है कि फर्जी राजदूत के 20 खातों का पता चला है। आरोपी और उसकी पत्नी के ये खाते भारत, दुबई, मॉरीशस और यूके में हैं। अभी तक घोटाला यह पता चला है (या खबर इतनी ही है) कि 2002 से 2004 के बीच इनके खातों में हर्षवर्धन के मित्र अहसान अली सैयद ने 20 करोड़ रुपये ट्रांसफर किये थे। फर्जी दूतावास चलाने जैसे मामले में 20 साल से ज्यादा पुराना 20 करोड़ का लेन-देन ही पकड़ा जाना या अब तक नहीं पकड़ा जाना महत्वपूर्ण है। यह सब तब जब आरोपी के पास 12 डिप्लोमैटिक पासपोर्ट बरामद हुए हैं। पता नहीं, पूरा मामला क्या है और कभी खुलेगा भी कि नहीं लेकिन जिन मामलों की जांच चल रही है वह चलती ही जा रही है। रॉबर्ट वाड्रा का मामला सबसे दिलचस्प है। दुनिया जानती है कि हर चुनाव से पहले पूछताछ होती रही है और उसके खुलासे अब हो रहे हैं। ऐसे में ओटीटी प्लैटफॉर्म पर प्रतिबंध बड़ी खबर है। लेकिन आज यह खबर हिन्दुस्तान टाइम्स में दो कॉलम की खबर है, देशबन्धु में पांच कॉलम का बॉटम है तो दि एशियन एज में सिंगल कॉलम। ठीक है कि यह कार्रवाई अश्लील और आपत्तिजनक सामग्री के खिलाफ की गई है लेकिन इसे वही देखता है जिसकी दिलचस्पी है और जो उपभोक्ता है वह इसके लिए पैसे देता है। इसलिये परसोने वालों के लिये यह व्यवसाय है और देश को हर तरह के व्यवसाय की जरूरत हैं। कुछ लोगों को पसंद नहीं है यह लोकतंत्र में मुद्दा नहीं होना चाहिये। सच्चाई यह कि अश्लील और आपत्तिजनक सामग्री परोसने वाले प्लैटफॉर्म भले प्रतिबंधित कर दिये गये हैं आबादी का अच्छा-खासा हिस्सा पूर्णतः नंगी फिल्में या बेडरूम के दृश्य पोर्न साइटों पर परोस रहा है, प्रसारितच कर रहा है। इनपर रोक ज्यादा जरूरी है क्योंकि यह अवैध और अनुचित है। समाज में हो रहा है तो दूसरों को भी प्रभावित करेगा और खींचने की मजबूरी होगी। ऐसे लोग आस-पास के और धीरे-धीरे पूरे समाज को कलुषित कर देंगे।
मुझे याद है, कुछ समय पहले तक सोशल मीडिया पर कई यूट्यूबर्स के वीडियो होते थे जो दिखाते और बताते थे कि कुछ लोग बच्चों को पोर्न फिल्म दिखाते पकड़े गये। अब वो यू ट्यूबर नहीं दिखते, ऐसे मामले नहीं दिखते पर इन प्रतिबंधित किये गये और अश्लील व आपत्तिजनक सामग्री परोसने वाले प्रतिबंधित ओटीटी प्लैटफॉर्म पर ही यह भी बताया-दिखाया गया है कि शहरों में ऐसी फिल्में बन रही हैं, कौन लोग बना रहे हैं और कौन इनके सितारे हैं। मुझे लगता है कि ओटीटी प्लैटफॉर्म बंद होने से भारतीय पोर्न उद्योग (जो अपेक्षाकृत नया है और पहले नहीं था) ज्यादा आसानी से काम कर पायेगा जिसे बंद किया जाना ज्यादा जरूरी है। जो भी हो, सरकार का निर्णय है और खबर तो खबर है लेकिन खबर में भी हर पहलू नहीं है। आज छपी खबर में बताया गया है कि ओटीटी ऐप्स पर किन कानूनों के तहत प्रतिबंध लगाया गया है। लेकिन फेसबुक पर मोहम्मद जाहिद ने लिखा है, उच्चतम न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एचएल दत्तू (तत्कालीन सीजेआई) की अध्यक्षता वाली बेंच ने इंटरनेट पोर्नोग्राफी पर प्रतिबंध लगाने से इंकार करते हुए इसे निजता के अधिकार का मामला बताया था और कहा था कि निजी तौर पर पोर्न देखना अपराध नहीं है। बशर्ते यह सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित या साझा न हो। एक जनहित याचिका पर यह आदेश आठ जुलाई 2015 को दिया गया था। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ में जस्टिस एफएमआई कलीफुल्लाने भी थे। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एचएल दत्तू ने कहा था, “हम वयस्कों को उनके घरों में निजी तौर पर पोर्न देखने से नहीं रोक सकते। यह उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजता का मामला है।” यह टिप्पणी संविधान के अनुच्छेद 21 में जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार के तहत निजता के अधिकार से जुड़ी थी।
इसके बाद 2017 में जस्टिस केएस पुट्टस्वामी बनाम भारत सरकार मामले में निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार घोषित किया गया, जिसने निजी तौर पर पोर्न देखने को अपराध न मानने की व्याख्या को और मजबूत किया। सामान्य विवेक भी यही कहता है। ऐसे में सवाल है कि सरकार ने इन ओटीटी प्लैटफॉर्म को बंद करके क्या सरकार ने उच्चतम न्यायालय के फैसले के विरुद्ध कार्य किया है? और किया ही है तो क्यों? उसकी प्राथमिकता कैसे तय होती है। मुझे लगता है कि सरकार को काम जनहित की ही चिन्ता करना है। अगर ऐसा है तो अश्लील और यौन उत्तेजक सामग्री की सूटिंग तथा उसे अपलोड करने पर रोक लगाना, सीधा प्रसारण रोकना और उस पर सख्ती ज्यादा जरूरी है। अखबारों में अक्सर खबरें होती हैं और सुनने में आता है कि किसी ने बाथरूम में गुप्त कैमरा लगाकर या अनजाने सीसीटीवी से किसी तरह किसी की अश्लील सामग्री बना ली, उसे ब्लैकमेल करने की कोशिश की और कामयाबी नहीं मिली तो किसी अश्लील साइट पर अपलोड कर दिया। यह सीधे-सीधे अपराध का मामला है और अश्लील ओटीटी प्लैटफॉर्म के मुकाबले ज्यादा गैरकानूनी है। हाल में भाजपा नेता मनोहर लाल धाकड़ का एक अश्लील वीडियो वायरल हुआ था। खबर थी कि इसके बदले उनसे 50 हजार रुपये मांगे गये थे और नहीं देने पर वीडियो वायरल हो गया।
मुझे लगता है कि संगठित और पेशवर ढंग से एक व्यवसाय के रूप में चल रहे ओटीटी प्लैटफॉर्म को बंद करना भले आसान हो पर इससे बेहतर और जरूरी कई काम हैं। अश्लील फिल्मों के ऐसे और स्वैच्छिक प्रसार (पसों के लिए) को भी रोकने और बंद करने के उपाय किये जायें। जाहिर है, यह ओटीटी प्लैटफॉर्म पर बैन लगाने के मुकाबले मुश्किल काम है। और संभवतः इसीलिए नहीं किया जा रहा है। पर इसकी बजाय ओटीटी प्लैटफॉर्म पर प्रतिबंध लगाने का कोई मतलब नहीं है। मोहम्मद जाहिद ने लिखा है, दरअसल उच्चतम न्यायालय के 2015-2017 के फैसलों के बाद देश में पोर्न बाज़ार सजने लगा था और तमाम ओटीटी ऐप ओर देशी पोर्न वेबसाइट्स की बाढ़ आ गयी। खबरों के अनुसार, सरकार ने कहा है कि ये ऐप्प मनोरंजन के नाम पर अश्लील व आपत्तिजनक वीडियो पेश कर रहे थे। सरकार ने अधिसूचना जारी करके इंटरनेट सर्विस प्रोवाइ़डर को कहा है कि इन ऐप्स को ब्लॉक कर दिया जाये। आप जानते हैं कि सरकार और सरकार समर्थकों को स्टैंडअप कॉमेडी से भी परेशानी रही है और कई कलाकारों के खिलाफ एफआईआर हो चुकी है और उनके लिए काम करना लगभग प्रतिबंधित हो गया है। कहने की जरूरत नहीं है कि ऐसे कलाकार दर्शकों के दम पर ही लोकप्रियता पाते हैं और तभी अपने शो आयोजित कर सकते हैं। ऐसे कलाकारों के खिलाफ प्रदर्शन-तोड़फोड़ की शिकायते हैं। उन्हें शो आयोजित करने की अनुमति नहीं मिलती और अगर शो हुए हैं या होते तो तोड़-फोड़, धमकाने और रोकने की कोशिशों पर कार्रवाई नहीं के बराबर हुई है। यह सुनिश्चित तो नहीं ही किया गया है कि सभी कलाकार आराम से अपने शो आयोजित कर सकें। यह कानून व्यवस्था का सामान्य मामला है और देश के कई राज्यों में सामान्य नहीं है। उसे सामान्य करने और उस पर ध्यान देने की बजाय ओटीटी पर प्रतिबंध का मामला बिल्कुल गैर जरूरी है लेकिन यह खबर आज जिस ढंग से छपी है उससे नहीं लगता है कि मीडिया के लिए इन मामलों की कोई प्रमुखता है। सरकार को तो नहीं ही लगती है।
आज छपी इस खबर से अगर ओटीटी प्लैटफॉर्म पर परोसी जा रही सामग्री को लेकर सरकार की चिन्ता का पता चलता है तो यह भी पता चलता है कि वह ऐसे कलाकारों को स्वतंत्र तौर पर काम करने, अपना पेशा चलाने और उनके प्रशंसकों को अपने पसंदीदा कलाकारों का शो देखने की स्थितियां नहीं मुहैया करा (पा) रही है। दूसरी ओर डिजटल प्लैटफॉर्म पर पेश की जाने वाली तथाकथित मनोरंजन सामग्री को देखने से रोक दिया गया है। जबकि पोर्न मामलों का प्रसारण जारी है। ऐसे समय में आज छपी दूसरी खबर के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि छात्रों की आत्महत्या व्यवस्थागत नाकामी है। इसके मद्देनजर अदालत ने मानसिक स्वास्थ्य संकट पर निर्देश जारी किये हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की एक खबर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने कोचिंग संस्थानों समेत सभी शिक्षा संस्थानों को निर्देश दिया है कि मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति सुनिश्चित करें। सुप्रीम कोर्ट के पीठ ने कहा है, “सीखने की खुशी की जगह रैंकिंग, परिणाम और निरंतर प्रदर्शन मेट्रिक्स को लेकर चिंता ने ले ली है। छात्र, विशेष रूप से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्र…. अक्सर ऐसी जाल में फंस जाते हैं, जिसमें जिज्ञासा की बजाय अनुरूपता, समझ की बजाय उत्पादन और खुशहाली की बजाय सहनशीलता को महत्व दिया जाता है।” यह समाज और सुप्रीम कोर्ट की चिन्ता है, सरकार की नहीं। हम-आप सब जानते हैं कि पढ़ाई-लिखाई के बाद बच्चों को एक रोजगार व्यवसाय की जरूरत होगी। इसके लिए सबसे आसान है, शिक्षा और पेशेवर शिक्षा। इसलिये इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा है और यह इसलिए भी है कि उपलब्ध सुविधाएं मांग के मुकाबले कम हैं।
सफलता और अच्छे प्रदर्शन की चिन्ता इसी कारण हैं और ऐसा नहीं है कि शिक्षा की व्यवस्था को बेहतर हुआ कहा जा सके। दूसरी ओर, नये उभरे दूसरे व्यवसायों में अलग संभावनाएं हैं तो वह किन्हीं कारणों से समाज के एक वर्ग को पसंद नहीं है इसलिए इसे संरक्षण तो नहीं ही मिलना है और विरोध तथा उसका नुकसान अपनी जगह है। यह मांसाहार या शराब के सेवन की ही तरह है। जो ऐसा नहीं करते हैं उनके लिए यह भले बुरा हो पर जो करते हैं उनके लिये सामान्य है और इसलिये संयत भी होता है। ऐसे में इसके विरोध का कोई मतलब नहीं है और अगर ऐसा किया जाये तो उन लोगों के बारे में नहीं सोचा जाता है जो इसे पसंद करते हैं, जिन्हें इसकी जरूरत है और इसे देखने-पाने के लिए पैसे भी हैं। सरकार को सबके लिये सोचना होगा और सबके लिये काम करना होगा। अगर वह समाज के एक वर्ग के लिए ही (और अंततः अपने लिये ही) काम करेगी तो दूसरा वर्ग नाराज, परेशान और असंतुष्ट रहेगा। मीडिया का काम है सरकार तक सारी सूचनाएं पहुंचाना पर वह भी अपना काम ढंग से नहीं कर रहा है।


