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सियासत

देश में हिंदू-मुस्लिम फसाद ने जितना नुकसान किया है, संभवतः सो कॉल्ड वामपंथी इंटेलेक्चुअल्स ने उससे थोड़ा ही कम नुकसान किया होगा!

प्रियंका दुबे-

मैं यह लिखना नहीं चाहती थी लेकिन किसी को तो बोलना पड़ेगा. इतनी हिपोक्रेसी अच्छी नहीं लगती Himanshu जी. बहुत सारे लोगों के अकाउंट्स हैं. चश्मदीदों के बयान हैं. कलमा पढ़वाने की कितनी ही बातें पीड़ितों ने बताई हैं. क्या आपके लिए एक हिंदुस्तानी नागरिक की चोट और उसके ज़ख्मों का कोई मतलब नहीं. ख़ुद को जरा दो कदम पीछे होकर Re-evaluate कीजिए. क्या आपके लिए सब कुछ भाजपा ही है? आप जो कर रहे हैं उसके ज़ख़्म को नकारना कहते हैं. पीड़ितों का अपमान कहते हैं. कल से यह वीडियो वायरल हो रहा है. आपने इसे साझा करते वक्त यह सोचा कि क्या यह वीडियो वहाँ मौजूद डेढ़ हज़ार लोगों और सभी छब्बीस मृतकों और उनके परिवारों का प्रतिनिधित्व करता है?

डेढ़ हज़ार में से बहुत संभव है कि कुछ लोग ठीक से बच कर निकल आए होंगे. तो मौजूदा जानकारी में यह थ्रेड जुड़ती है कि कुछ लोग सुरक्षित भी बचे. भाजपा के प्रति, जो हुई आपकी भावनाएं हैं उसके कारण आप भारतीय नागरिकों की चोटों का मज़ाक़ उड़ा रहे हैं. इसके रिएक्शन में दूसरी ओर भी fundamentalism बढ़ेगा. क्या जब तक एक भी सिटीजन के साथ ऐसा हुआ हो (या फिर ना होने के सबूत हमारे पास हों) तब तक हमें चुप नहीं रहना चाहिए? establishment की मुख़ालफ़त करने के लिए संवेदना घर पर छोड़ कर आने की ज़रूरत नहीं है. यह पोस्ट आपकी टोन बहुत शर्मिंदा करता है.

जिस वीडियो का जिक्र किया गया है नीचे लिंक पर देखें…

https://www.facebook.com/share/1AKc6udogP


मैं बहुत थक चुकी हूँ और अब इस मुद्दे पर बिल्कुल नहीं लिखना चाहती, लेकिन यह आख़िरी पोस्ट होगी, क्योंकि यह लिखना ज़रूरी है : अभी एक मिनट पहले मैंने अपनी वॉल पर एक हिमांशु कुमार जी का वीडियो शेयर किया है जिसे वायरल होता हुआ मैं कल से देख रही हूँ. कई लोग तो इस वीडियो को ऐसे शेयर कर रहे हैं जैसे बस विक्टिम्स को डिसक्रैडिट करने के इंतज़ार में थे. वहाँ डेढ़ हज़ार लोग थे. नई-नई जानकारियाँ लगातार आना स्वाभाविक है. छब्बीस की मौत हुई तो ज़ाहिर है कि डेढ़ हज़ार में से कई सुरक्षित भी बच आए होंगे.

उन बच आए लोगों की बात से मृतकों के बयानों को कैंसिल नहीं किया जाना चाहिए बल्कि समग्र तस्वीर में एक और थ्रेड जुड़ता है. अपनी वाल से मैं लगातार इस देश के मुसलमान नागरिकों के साथ खड़ी रही हूं- सिर्फ़ आज नहीं, हमेशा से. लेकिन उनके साथ खड़े होने के लिए मुझे पीड़ितों का मज़ाक़ बनाने की ज़रूरत नहीं है.

मेरा मानना है कि इस देश में हिंदू-मुस्लिम फसाद ने जितना नुकसान किया है, संभवतः सो कॉल्ड वामपंथी इंटेलेक्चुअल्स ने उससे थोड़ा ही कम नुकसान किया होगा. रौ में बहते हुए इनको होश ही नहीं रहता कि थोड़ा सा ख़ुद को देख लें, परख लें. थोड़ी मनुष्यता रखें. और अगर आपकी मनुष्यता इतनी बँट चुकी है तो आपको ख़ुद से बैठ कर सवाल पूछने चाहिए. इतनी बेशर्मी हावी हो चुकी है कि आप लोगों को कुछ होश ही नहीं है कि आपकी ऐसी पोस्ट्स का कितना दिल तोड़ने वाला असर हो सकता है!

पूरे देश में मुसलमान जा जा कर solidarity दिखा रहे हैं – कैंडल मार्च हो रही हैं, हिन्दू शोक व्यक्त कर रहे हैं …नास्तिक भी दुख व्यक्त कर रहे हैं. लेकिन इन तथाकथित लेफ्ट लीनिंग बुद्धिजीवियों का दिल कभी नहीं पसीजेगा.

जनता सब देखती है. इनको कोई तमीज़ नहीं. मूलभूत पढ़ाई लिखाई की ज़रूरत है कि किसी नई सूचना को एक पुराने इशू में कैसे जोड़ा जाता है. आप कब किस टोनालिटी में लिख रहे हैं…आपको कोई होश नहीं है. इसलिए राजनीति के साथ-साथ वैचारिक ज़मीन पर भी आपका स्थान कम होता जा रहा है. ईमानदारी लाइए अपने भीतर. सरकार की खिलाफत के लिए पीड़ितों के गरिमा हनन की कोई ज़रूरत नहीं है. बिना पीड़ितों को डिमीन किए भी आप अपनी बात रख सकते है. इन सबको मेधा पाटकर जैसे लोगों के साथ काम करके सीखना चाहिए कि public behaviour और public conduct क्या चीज़ होती है. आपके ऐसे लापरवाह व्यवहार से fundamentalism बढ़ सकता है.


आलोचना सुनने और लोकतांत्रिक तरीकों से बातचीत की कसमें उठाने वाले तथाकथित लिबरल असल में इतने तानाशाह जैसे हैं कि ख़ुद पर एक सवाल भी बर्दाश्त नहीं कर सकते. मैंने आदरणीय हिमांशु कुमार जी से सवाल पूछा तो एक दशक से मेरी लिस्ट में बने हुए सर ने मुझे अनफ्रेंड कर दिया. और एक पोस्ट लिख कर ऐलान किया कि वो निष्पक्ष नहीं हैं. चलें, इस बात की तस्सली है कि वे पीड़ित का चुनाव धर्म से करते हैं. और उन्होंने अपना पक्ष चुन लिया है. यह ईमानदारी मुझे अच्छी लगी.

जनता सब देख रही है. इतना घमंड और इतना घना saviour काम्प्लेक्स और पूरे सवाल को जनता से हटाकर अपनी ओर मोड़ने का यह तरीका सब देखें. लोग यहाँ घोषित कर रहे हैं कि वो पीड़ितों के पक्ष में और पीड़ित कौन है, यह वो तय कर चुके हैं। इस बात को सार्वजनिक रूप से लिख रहे हैं. हम यहाँ तक एकदम से तो नहीं पहुँचे होंगे.

खैर, मेरे तमाम आलोचक मेरी फ्रेंड लिस्ट में सदियों से मौजूद हैं. मैंने आजतक किसी को अनफ्रेंड नहीं किया. इस मामले में मेरी tolerance की मुझे जानने वाले सब दाद देते हैं और सलाह देते नहीं थकते कि ब्लॉक करो इत्यादि. मैं कभी नहीं करती. जिन लोगों का मेरे काम के मुक़ाबले दस प्रतिशत भी काम नहीं है, वो भी भर-भर के मेरे “न्यूट्रल” होने को कोसते हैं. मैंने कभी रियेक्ट नहीं किया और न कभी किसी को ब्लॉक किया. उल्टा जन्मदिन पर बधाई ज़रूर दे दी होगी.

लिबरल होने के नाम पर polarization कर हीरो बनने में और वास्तव में लिबरल होने में ज़मीन आसमान का फ़र्क़ है. कलेजा चाहिए होता है सुनने का, चुप रहने का और जहाँ संभव हो वहाँ संवाद करने का…ईमानदार होने का. मेरे पास कोई प्रॉपर्टी नहीं है और न ही कोई ईएमआई है. मैंने लिखने के लिए नौकरियाँ की और छोड़ी भी हैं. अपने पैसे लगा-लगाकर किताब पूरी की है. और उन लोगों को जो आपकी तरह संघ या वाम के पे रोल पर नहीं हैं, उन्हें ज़रूरत नहीं कि किसी विचारधारा के लेंस से घटनाओं को देखें. आपका बस चलता तो अदालत में भी कह देते कि मैं निष्पक्ष नहीं हूँ. समझदार लोग हर चीज़ को केस by केस बेसिस पर देखते हैं और हर जगह हर गलत चीज़ का विरोध करते हैं. आप कितने सहृदय हैं, यह भी सब लोग देखें.

मरने पर तो हम जिस पड़ोसी को नहीं जानते, उसके यहाँ भी चले जाते हैं. लेकिन जो सामान्य लोकाचार होता है, वह भी आप लोगों में नहीं है. इसलिए आप लोग अपने मोहल्ले में किसी कार्यक्रम में सौ-दो सौ लोग नहीं जुटा पाते. आप के जैसे लोग हों तो संघियों को किसी और की क्या ज़रूरत.

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