अच्छी कविता और संकोच के सागर में समाया इन मित्रों का कविता पाठ

kavitapath sarokarnama

राजेश्वर वशिष्ठ की कविताएं तो हम पहले ही से पढ़ते रहे हैं और उन पर मुग्ध होते रहे हैं। खास कर्ण प्रसंग पर लिखी उन की कविताएं, प्रेम कविताएं, कोलकाता पर लिखी उन की कविताएं पुलकित करती हैं। बाकी कविताएं भी उन की मन को बहुत बांधती हैं। तो अभी जब वह कोलकाता से उड़ कर लखनऊ आ गए दो-चार दिन के लिए अपने काम-काज के सिलसिले में तो हम उन की कविताएं उन से सुन भी लिए। कविता सुनना और सुनाना दोनों ही सौभाग्य और संयोग से ही हो पाता है। विजय पुष्पम पाठक ने यह संयोग और सौभाग्य एचएल परिसर स्थित अपने घर पर परोसा। राजेश्वर वशिष्ठ की कविताएं और उन का पाठ तो आज की शाम का हासिल था ही, दिव्या शुक्ला, प्रज्ञा पांडेय और विजय पुष्पम पाठक की कविताएं भी आज की शाम को सुरमई बनाने में पूरे सुर के साथ उपस्थित थीं। इन मित्रों की अच्छी कविता और संकोच के सागर में समाया इन मित्रों का कविता पाठ मन को अभिभूत कर गया। हम जैसे सामान्य श्रोता तो इन मित्रों की कविता और कविता पाठ के सुख में भीगे और डूबे ही, निवेदिता जी, शबाना जी, पाठक जी और अंजनी पांडेय जी भी इस सुख सागर के साक्षी बने। मन करे तो आप मित्र भी यहां इन मित्रों की एक-एक कविता पढ़ कर उस सुख से परिचित हो लें।

अपनी खोज में / राजेश्वर वशिष्ठ

rajeshwar vashishtha

आसान नहीं था इतनी भीड़ में
अपने आप को खोजना
पर मैं निकल ही पड़ा

पहचान के लिए कितनी कम चीज़ें थी मेरे पास

बचपन की कुछ स्मृतियाँ थीं
तुलसी के बड़े से झाड़ के नीचे से
नानी के गोपाल जी को चुराकर
जेब में ठूँसता एक बच्चा

चिड़िया के घौंसले से
उसके बच्चों को निकाल कर
आटे का घोल पिलाता एक शैतान
जिस पर माँ चिल्लाती थी –
अब चिड़िया नहीं सहेजेगी इन बच्चों को
मर गए तो पाप चढ़ेगा तेरे सिर पर

मैथमैटिक्स की क्लास में
अक्सर मिले सिफर को
हैरानी से देखता एक विद्यार्थी
जिसे बहुत बाद में पता चला कि वह तो
आर्यभट्ट का वंशज है

एक पगला नौजवान
जिसे देखते ही हर लड़की से प्यार हो जाता था
जिसकी डायरी में लिखी थीं वे सब कविताएं
जो वह उन्हें कभी सुना ही नहीं पाया

एक ज़िद्दी अधैर्यवान पुरुष
जिसके लिए पत्नी और बच्चे
किसी फिल्म के किरदार थे
जिन्हें करनी थी एक्टिंग
उसे डायरेक्टर मान कर

एक बेहद कमज़ोर पिता
जो हार कर रोने बैठ जाता था
स्मृतियों का पिटारा खोले
किसी अँधेरे कोने में
जिस में सिर्फ और सिर्फ
होती थीं उसकी बेटियाँ

साँझ तक भटकने के बाद
इस महानगर में
मुझे मिला एक आदमी
कुछ वैसा ही संदिग्ध
चमड़े का थैला और कैमरा लटकाए
खुद से बतियाता हुआ आत्म-मुग्ध

गंगा में पाँव लटकाए हुए
वह देख रहा था आसमान में उड़ते
चिड़ियों के झुंड को
हावड़ा ब्रिज पर उतरती साँझ को
और डूबते हुए सूरज को

उसे पहचानते हुए मुझे लगा
आज ज़िंदगी का एक साल और कम हो गया
आसान नहीं था यूँ अपने आप को खोजना।

लाल सुर्ख आंधी / दिव्या शुक्ला

divya shukla
एक अरसे बाद आज फिर आई
न जाने क्यूँ सुर्ख लाल आंधी
एकबारगी तो आत्मा काँप उठी
जब जब ये लाल आंधी आती है
कुछ न कुछ छीन ले जाती हैं
पहली बार जब मेरे होशोहवास में आई थी
याद है उस रात को सुर्ख आंधी ने कैसे
इन हाथों को हल्दी से पीला रंग
एक झोंके में ही अपने ही घर में पराया कर दिया था
रोप दिया नन्हे बिरवे को दूसरी माटी में
जब भी जड़े अपनी पकड़ बनाने लगती
हवा का हल्का झोका उसे हिला जाता
प्रयत्न किये पर पराई की पराई ही रह गई
कभी जम ही नहीं पाई नई माटी में
आज भी सोचती हूँ अपना घर कौन सा है
बौखल बदहवास सी सब को खुश करती फिरती रही
याद ही न रहा मै कौन हूँ मेरी भी कहीं कोई खुशी है
गोल रोटियां गोलमटोल बच्चे और उन्ही के संग
गोल गोल घूमती मेरी पूरी दुनिया यहीं तक सीमाएं खींची रही
कभी कभी मन में रिसाव होता पीडाएं बह उठती सूखी आँखों से
पर सीमाओं को पार करने का साहस कभी न हुआ –न जाने क्यूँ
फिसलन ही फिसलन थी अपनी आत्मा के टपकते रक्त की फिसलन
जब जब बढे पाँव तब तब उसी फिसलन से सरक कर
मेरी जिंदा लाश को पटक आते लक्ष्मणरेखा के भीतर ही —
बड़ी लाचारी से पलट कर देखती तो पाती
दो कुटिल आँखों में कौंधती व्यंग्यात्मक बिजली
चीर देती कलेजा वह तिर्यक विजई मुस्कान –
लाल आंधी की प्रतीक्षा सी तैरने लगी थी अब मन में –
और इस बार सीमाएं तो उसने तहसनहस कर डाली परन्तु
कैद का दायरा बढ़ा दिया बड़े दायरे में खींची लक्ष्मणरेखा
टुकड़ों में मिली स्वंत्रतता उफ़ साथ में हाडमांस से जुड़े कर्तव्य
अब इस बार क्यूँ आई आज क्या ले जायेगी क्या दे जायेगी
न जाने क्या क्या उमड़ता घुमड़ता रहा रीते मन में –
कोई भय नहीं आज खोने का /ना ही कोई लालसा कुछ पाने की
यही सोचते हुए न जाने कब मै द्वार खोल कर बाहर आ गई
शरीर के इर्दगिर्द ओढ़नी को लपेट कर निर्भीक खड़ी रही
आकाश की ओर शून्य में घूरती हुई — मुस्कान तैर रही थी मुख पर
और मै धीरे धीरे बढ़ रही थी दूर चमकती हुई एक लौ की ओर
बिना यह सोचे क्या होगा दिए की लौ झुलसा भी सकती है
परंतु बढती जा रही थी बरसों से बंधी वर्जनाओं की डोर झटकती
सारी सीमाओं तोड़ती हुई लक्ष्मणरेखाओं को पैर से मिटाते हुए —
न जाने कितने अरसे बाद पूरी साँस समां रही थी सीने में वरना अब तक तो
बस घुटन ही घुटन थी –और फिर आहिस्ता आहिस्ता मंद स्मित
एक अट्टहास में बदलता गया गूंजने लगी दिशाएँ
बरसों से देह में लिपटी मृत रिश्तों की चिराइंध
बदलने लगी मलय की शीतल सुगंध में –
लक्ष्मणरेखा अब भी है परंतु स्वयं की बनाई हुई
अब इसे मेरी अनुमति के बिना नहीं पार सकता को

 

अंधेरे की वह नदी / प्रज्ञा पांडेय

pragya pandey

बंद दरवाज़े खोलकर बाहर जब निकलतीं हैं स्त्रियां
उन्हें मालूम होता है कि जोखिम बहुत हैं
पराजय ही है जय कम है उनके हिस्से में
मगर सारे भय बटोरकर सीने में वे जुटातीं हैं साहस
चल पड़तीं हैं पहाड़ों की ओर
क्योंकि वे जानतीं हैं कि समतल उन्होंने ही किया है मैदानों को
और तब वहीँ से फूटे हैं रास्ते  ।
वे जानतीं हैं कि रास्ते झरनों की तरह नहीं हैं
न ही चरागाहों की तरह। वे नियति पर नहीं करतीं हैं भरोसा
उन्हें मालूम है कि रोटी गोल बन जाती है और
महकती है भूख भर
दाल में नमक भर जब वे जी रहीं होतीं हैं।
उनके जीने की बात पर
कभी कभी चाँद चलता है साथ
थोड़ा सा सूरज भी मुठ्ठी भर तारे होते हैं तो
कभी कुछ नहीं
लेकिन उन्हें पार करनी है अँधेरे की वह नदी
जिसे पार करने के बाद रोटी गोल बने या न बने , दाल में नमक
ठीक हो ज्यादा या दहेज़ कम हो , नाक कट रही हो या बच जाए यह सब
उनके जीने के लिए शर्त नहीं होती
वे दुर्गम में दिखायी देतीं हैं लहलहाती नदी की तरह
उलझनों को रास्तों की तरह

जोरो -जुल्मत का हर हिसाब / विजय पुष्पम पाठक

vijay pushpam pathak

हर हिसाब वो कहते हैं, सुनो! अब
आन्दोलन ये बंद कर दो
मैं कहती हूँ ,कि तुम कह दो,
कि अब कोई भी हव्वा की बेटी
सरे -राह ना छेड़ी जाए .
वो कहते हैं कि तुम घर से निकलना
बंद ही कर दो .
मैं कहती हूँ कि मैं बिना परवाज़
उड़ती हूँ .
वो कहते हैं कि साँसों की तपिश मेरी
उन्हें भरमाती है .
मैं कहती हूँ ,बताओ क्या अब
सांस भी ना लूं .
वो कहते हैं तुम्हारे कपडे भड़काऊ
मैं कहती हूँ क्या जो घूंघट में हैं
बेख़ौफ़ हैं क्या ?
मैं कहती हूँ मुझे क्यों कैद करते हो !
वो कहते हैं की तुम कफ़स में
महफूज़ तो कुछ हो .
ये दुनिया है तुम्हारी
जो भी चाहो तुम मुझे कह दो ,
मगर अब मैं भी बोलूंगी ,
अरे अपनी उड़ानों से
पहले पर मैं तोलूंगी .
तुम्हे मैं आम लगती हूँ
मगर अब ख़ास हूँ मैं भी
कि मेरे लब भी अब खामोश ना होंगे .
कुछ सवाल हैं तुमसे
जिनके जवाब मांगूंगी
तुम्हारे जोरो -जुल्मत का
हर हिसाब मांगूंगी

 

लेखक दयानंद पांडेय वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है। यह लेख उनके ब्‍लॉग सरोकारनामा से साभार लिया गया है।



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