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इंटरव्यू

पांच मिनट में शास्त्रीय संगीत की अवधारणा पेश करने वाले खयाल गायक पं. सत्यशील देशपांडेय से विशेष बातचीत

खयाल गायक पं. सत्यशील देशपांडेय से मुहम्मद जाकिर हुसैन की खास बातचीत : जिसकी सांगीतिक आत्मा तड़पती है तो उसको शास्त्रीय संगीत तक आना पड़ता है… आम जनता को खुश करने के लिए नहीं है शास्त्रीय संगीत… 

खयाल गायक पं. सत्यशील देशपांडेय से मुहम्मद जाकिर हुसैन की खास बातचीत : जिसकी सांगीतिक आत्मा तड़पती है तो उसको शास्त्रीय संगीत तक आना पड़ता है… आम जनता को खुश करने के लिए नहीं है शास्त्रीय संगीत… 

जाने-माने खयाल गायक पं. सत्यशील देशपांडेय 6-7 जनवरी 2017 को भिलाई-दुर्ग आए थे। महान गायक पं. कुमार गंधर्व के शिष्य होने के नाते उनकी अलग पहचान है। शास्त्रीय संगीत पर आधारित पृष्ठभूमि वाली कुछेक हिंदी-मराठी फिल्मों में भी उन्होंने अपनी आवाज दी है। यहां दुर्ग के शासकीय डॉ. वामन वासुदेव पाटणकर कन्या स्नातकोत्तर कॉलेज में शास्त्रीय संगीत पर आधारित एक संगोष्ठी में हिस्सा लेने आए पं. देशपांडेय से मेरी लंबी बातचीत हुई। पं. देशपांडेय को प्रख्यात पेंटर सैयद हैदर रजा के नाम पर स्थापित रजा सम्मान सहित कई प्रतिष्ठित सम्मान मिल चुके हैं। संयोग से बातचीत के दौरान इसी कॉलेज में प्रोफेसर और रजा अवार्ड प्राप्त प्रख्यात चित्रकार योगेंद्र त्रिपाठी भी मौजूद थे। बातचीत के दौरान पं. देशपांडेय ने शास्त्रीय संगीत के शिक्षण-प्रशिक्षण से लेकर रियालिटी शो और फिल्मों तक ढेर सारे सवालों के जवाब बड़े धीरज के साथ दिया। धाराप्रवाह बातचीत के दौरान उन्होंने शास्त्रीय संगीत और उसके व्याकरण पर भी बहुत कुछ कहा। इसलिए इंटरव्यू बनाने के  दौरान मैनें अपने शहर के वरिष्ठ संगीतज्ञ प्रख्यात वायलिन वादक पं. कीर्ति माधव व्यास से भी कुछ जरूरी सलाह ली। जिससे कि तथ्यात्मक गलती न जाए। इसके बाद तैयार हुआ यह पूरा इंटरव्यू-

-शास्त्रीय संगीत की शिक्षण पद्धति कैसी होनी चाहिए, खास कर बच्चों के लिए?

-आज बच्चों को शास्त्रीय संगीत के नाम पर व्याकरण ज्यादा बताया जाता है। ऐसे में हमारे बच्चे शास्त्रीय संगीत को सरलता से कैसे आत्मसात कर पाएंगे? मैं बच्चों को बताऊं कि भूप में मध्यम और निषाद वज्र्य है और तीन ताल की मात्राएं 16 हैं तो बच्चे बोर हो जाएंगे। अगर मैं राग भूप के तराने से ही शुरूआत करूं तो बेहतर होगा। दरअसल आज लोगों के पास आधे-पौन घंटे की बंदिश सुनने का भी धीरज नहीं है। इसलिए मैंने फाइव मिनिट्स क्लासिकल म्यूजिक (एफएमसीएम) का कांसेप्ट दिया है।

-तराना ही क्यों..?

-मेरा मानना है कि आपकी मातृभाषा अलग-अलग हो तो भी आप तराना गा सकते हैं। मैनें पांच मिनट में शास्त्रीय संगीत (एफएमसीएम) की जो अवधारणा दी उसमें एक-एक राग का एक-एक तराना स्कूली बच्चों को बताया जाता है। महाराष्ट्र के स्कूलों में यह प्रयोग चल रहा है। इसके लिए करीब 20 तराने मैंने गाए हैं और 30 अन्य कलाकारों से गवाए हैं। मैंने स्पिक मैके के प्रोग्राम में एक लोकप्रिय गीत ‘कजरारे-कजरारे’ लिया और उसे 8 मात्रा के एक चक्र के बजाए 8-8 मात्रा के दो चक्र (16 मात्रा) में गा कर बताया। इससे बच्चे भी खुश हो गए और उनकी हमारे संगीत की विविधता भी समझ में आ गई। बात सिर्फ ‘कजरारे-कजरारे’ की नहीं है, आप आज का कोई भी लोकप्रिय गाना लेकर आइए मैं उसे एक ताल या तीन ताल में बनाके बच्चों को बताउंगा तो उसमें बच्चे एन्ज्वाय करेंगे और संगीत को भी समझेंगे।

-बच्चों का शिक्षण तो ठीक है लेकिन आम जनमानस तक शास्त्रीय संगीत को पहुंचाने का कलाकार का दायित्व कितना है?

-देखिए, हमारे शास्त्रीय संगीत में असीमित संभावनाएं हैं और वो किसी भी सच्चे कलाकार को हमेशा प्रेरित करती है। इससे कलाकार तो आनंदित होता ही है लेकिन ज्यादा से ज्यादा श्रोताओं तक पहुंचने का काम प्रतिभाशाली कलाकार कर नहीं पाते हैं। क्योंकि वो तो अपने परफार्मेंस और रियाज में व्यस्त रहते हैं। इसलिए सबसे बड़ी जवाबदारी अकादमिक क्षेत्र के लोगों की है। स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी में जो लोग संगीत के शिक्षण से जुड़े हैं और आज की पीढ़ी के सीधे संपर्क में हैं, यह उनका दायित्व है कि हमारे शास्त्रीय संगीत के प्रति युवा पीढ़ी में समझ पैदा करे और ज्यादा से ज्यादा लोगों को संगीत से जोड़ें।

-आजादी से पहले और बाद के दौर में शास्त्रीय संगीत और कलाकारों को लेकर क्या बदलाव देखते हैं?

-आजादी से पहले संपर्क माध्यम उतने नहीं थे। ऐसे में समाज से शास्त्रीय संगीतकारों की अपेक्षाएं सिर्फ यही थी कि उसकी साधना में कोई बाधा न आए। तब कलाकार को लोकप्रिय होने की जरुरत नहीं थी। तब कलाकारों-पहलवानों को राजा-महाराजा का संरक्षण मिलता था। इसलिए जनता को खुश करने की तब नौबत नहीं आई थी। लेकिन स्वातंंत्र्य के बाद जब राजा-महाराजा का दौर खत्म हुआ तो भरण-पोषण के लिए कलाकारों का पाला जनता जनार्दन से पड़ा। ऐसे में कलाकारों ने नई तरकीबें ढूंढ निकाली। जैसे अतिगद्रुत तराने गाना या झाला बजाना।

-तो क्या शास्त्रीय संगीत आम जनता के लिए नहीं है?

-मेरा मानना है कि हमारे शास्त्रीय संगीत का स्वभाव आपस की गुफ्तगू जैसा है। मसलन एक कमरे में 10-20 लोग बैठे हैं और कलाकार गा या बजा रहा है तो वहां राग की बारीकियां उभर कर आएगी। अब वही कलाकार हजारों लोगों के बीच परफार्म करे तो पता नहीं कितने लोग इन बारीकियों को पकड़ पाएंगे। हमारा संगीत जनता को खुश करने के लिए नहीं है बल्कि यह बहुत हद तक स्वांत: सुखाय जैसा है। मैनें अपने जीवन में अपने गुरु पं. कुमार गंधर्व के अलावा पं. रविशंकर और पं. भीमसेन जोशी जैसे कलाकारों को सुना है तो उनका सर्वोत्तम मुझे घरेलू महफिलों में ही मिला है।

-तो शास्त्रीय संगीत फिर जनता विमुख हुआ ना?

-देखिए, आम जनता को तो द्रुत गति का संगीत ज्यादा आकर्षित करेगा। हमारा शास्त्रीय संगीत एक अलग तबीयत का है वो बहुत ही नाजुक है और मौन की तरफ ले जाता है। आबादी बढ़ी है तो जनता को आकर्षित करने की तरकीबें भी निकाली गई हैं। जरूरी नहीं कि उससे सच्चा कलाकार भी खुश हो। मान लो मेरी महफिल हो रही है तो उसमें मैं एक हजार लोगों को खुश करूं, उससे बेहतर होगा कि मैं समझ रखने वाले 5 लोगों के लिए अपना संगीत पेश करुं। मैं ग्रेट ब्रिटेन कई बार गया हूं। वहां शेक्सपियर को पढऩे वाले लोग वहां की आबादी के हिसाब से 1-2 प्रतिशत ही होंगे। हमारी शास्त्रीय कलाएं हमेशा सीमित लोगों तक रही हैं और इसमें वो लोग खुश थे। जनता अभिमुख कला का होना ये तो आजादी के बाद आया है और ये कोई उत्कृष्टता की कसौटी नहीं है।

-सुगम संगीत का अपना श्रोता वर्ग है और वो शास्त्रीय संगीत की अपेक्षा कहीं ज्यादा बड़ा है?

-वह तो होगा ही। सुगम संगीत और शास्त्रीय संगीत में फर्क ये है कि सुगम संगीत पूर्व निश्चित है। जैसे ‘आधा है चंद्रमा रात आधी’ गाना किसी सिचुएशन से बना है। अब ये गाना आपको 2017 में भी अच्छा लगता है तो मैं इर्ष्या करुंगा कि क्या खुश आदमी है ये कि इसको उसी गाने से तृप्ति मिल जाती है। लेकिन जिसकी सांगीतिक आत्मा तड़पती है तो उसको शास्त्रीय संगीत तक आना पड़ता है। हमारे शास्त्रीय संगीत में दो वैश्विक रिदम छह मात्रा का दादरा और 8 मात्रा का कहरवा है। इसके दुगुने मात्रा के ताल हमारे ख्याल संगीत में बनें। ताल का पहला आधा और दूसरा आधा ये कंसेप्ट दुनिया के किसी भी संगीत में नहीं है मैं इस संगीत को श्रेष्ठ बताने का दावा नहीं कर रहा हूं,इसकी खासियत बता रहा हूं।

-शास्त्रीय संगीत में खास कर गायन में किन तत्वों का समावेश होता है और श्रोता वर्ग इनसे किस हद तक प्रभावित होता है?

-शास्त्रीय संगीत में एक कलाकार का स्वभाव, उसके संस्कार, उसकी तालीम और उसकी तत्काल स्वस्फूर्तता जैसे तत्वों से प्रस्तुति का रूप बनता है। इसलिए हमारे संगीत की ये परंपरा रही है कि उसी गायक के उसी राग को ताल में गाए जाने वाले उसी बंदिश को सुनने के लिए वही श्रोता इस उम्मीद पर बार-बार जाते हैं कि अब कुछ नया होगा। यह बात आप दूसरे संगीत में नहीं पा सकते। हमारे संगीत का वैभव और इसकी ऊंचाई है कि हर स्तर पर किसी भी उम्र में लोग बंदिशों का आनंद ले सकते हैं। शास्त्रीय संगीत में नवनिर्माण की खासियत है और जिसको इसका चस्का पड़ जाए तो यही आनंद उसके लिए बहुत है। इसके बाद दस हजार लोगों को संगीत अच्छा लगता है कि नहीं इससे उसे क्या वास्ता…?

-आपके गुरू पं. कुमार गंधर्व इस बारे में क्या सोचते थे? उनकी शिक्षण पद्धति कैसी थी?

-पं. कुमार गंधर्व को करोड़ों लोगों ने सुना पर उन्होंने कभी जनता के लिए समझौता नहीं किया। कोई उनकी कोई नकल करे या उनका कोई घराना बने ये उनकी इच्छा कभी नहीं थी। वो कहते थे कि मेरा सौंदर्य विचार, मेरा सांगीतिक विचार है। जब वो सिखाने बैठते थे तो हम लोगों को कोई विशिष्ट राग के साथ उससे जुड़ी परंपरा और अन्य पहलू भी समझाते थे। उसके बाद कहते थे-मैनें आपको बता दिया, अब आप अपना रास्ता ढंूढो और इसलिए ही मैं उनके श्रेष्ठ गुरू मानता हूं। उनकी जगह कोई और होता तो रटवा लेता। लेकिन उनका भी शिक्षण ऐसा ही हुआ था। हमारे पंडित जी के गुरूजी पं. बीआर देवधर जी ने भी ऐसे ही गायकी का हर रंग बताने के बाद कहा था कि-अब आप अपना गाना बनाओ। गुरूजी पं. कुमार गंधर्व का कहना था कि जब आप गाने बैठते हैं तो अष्टांग का प्रदर्शन नहीं लगना चाहिए। वे मानते थे कि गाना अष्टांग के लिए नहीं बना है कि हमें आलाप, बोल आलाप और बोलतान सब कुछ मालूम है और हम सभी का प्रदर्शन कर दें। ऐसा जरूरी नहीं बल्कि जो बंदिश आप गा रहे हैं उसमें जो अनुकूल व प्रभावशाली है, वही प्रदर्शित करें। उनका मानना था कि गायिकी किसी भी अंग की अति न करो।

-ऐसे में आप पश्चिमी संगीत को किस पैमाने पर रखते हैं?

-पश्चिमी संगीत दरअसल पूर्व निश्चित होता है। महान संगीतकार जुबिन मेहता की सिंफ नी सुनिए,वहां आप हमेशा आउटसाइडर रहेंगे। वहां सवा सौ लोगों की टीम है। जिसमें 15 वायलिन, 10 फ्ल्यूट,16 ड्रम और 20 सैक्सोफोन सहित तमाम वाद्य हंै और इन सबके मिलने से बहुत ही सुंदर सिम्फ नी बनती है लेकिन यह सब तो पूर्व निश्चित है। वो लोग स्कोर बोर्ड में लिखा हुआ पढ़ कर स्कोर बजाते हैं। मैं उनके संगीत को छोटा नहीं बता रहा हूं लेकिन वहां तत्काल में अपना कुछ देने के लिए कलाकार के पास गुंजाइश नहीं होती। इसके विपरीत हमारे यहां तो सामने कुछ भी लिखा हुआ नहीं होता। यहां तो कलाकार का मूड, उसकी तालीम,उसके संस्कार और उसकी तात्कालिक समझ ये सब मिल कर हमेशा एक नई सर्जना रचते हैं। हमारे संगीत में जो क्षमताएं हैं,वो चिरंतन है। इसलिए इसको ज्यादा लोकप्रिय होने की तमन्ना कभी नहीं रही।

-आपने महज तीन चुनिंदा फिल्मों में पाश्र्वगायन किया। इसकी क्या वजह थी?

-क्योंकि इन तीनों फि ल्मों में शास्त्रीय संगीत की पृष्ठभूमि पर आधारित ही प्रसंग था। फि र वो लोग मुझे जानते भी थे। इसलिए उन्होंने मुझे चुना तो मुझे हट के कुछ नहीं करना पड़ा। शशि कपूर की ‘विजेता’ फि ल्म में रेखा ”भीनी-भीनी भोर आई” गीत में अपने उस्ताद से संगीत सीख रही है। वहीं फिल्म ‘लेकिन’ में हेमा मालिनी के मुजरे के दौरान ”झूठे नैना बोले सांची बतिया” गीत में उस्ताद जी भी साथ दे रहे हैं। ये ‘झूठे नैना’ वाली बंदिश मेरी ही तैयार की हुई थी। इन दोनों गीतों में मैनें आशा भोंसले के साथ पाश्र्वगायन किया। वहीं 1996-97 में आई मराठी फि ल्म ‘हे गीत जीवनाची’ भी शास्त्रीय संगीत की पृष्ठभूमि पर बनी थी। जिसमें मैनें लता मंगेशकर के साथ पाश्र्वगायन किया। इसके बावजूद फिल्मों में गाना मेरे लिए कोई बहुत ”ग्रेट” चीज नहीं है।

-शास्त्रीय संगीत के बहुत से कलाकार फि ल्मों से दूर रहना पसंद करते हैं, इसकी क्या वजह है?

-पहली बात तो अब ऐसी फि ल्में नहीं बनती जिसमें हमारे शास्त्रीय संगीत के लिए ठीक-ठाक भी गुंजाइश हो। फि र जिसे एक मुक्त इंप्रोवाइजेशन का चस्का लग जाए यानि कि आप एक रटा हुआ फार्मूला पेश नहीं कर रहे हैं और अपने संगीत को हर बार अलग-अलग ढंग से पेश कर रहे हैं तो आपको फिल्मों के ऐसे पूर्व निश्चित 3-4 मिनट के गाने में रूचि नहीं रहेगी। किशोरी अमोणकर को भी तो ऐसे मौके आए थे पर उनका मन नहीं लगा। मुझे भी नहीं लगता कि मैं किसी प्रोड्यूसर के पास जाउं या उनको बुलाऊं या उनसे संबंध रखूं, जिससे वो मुझे भी प्लेबैक दें। प्लेबैक से मुझे कोई फ र्क नहीं पड़ता। मैं अपनी बात नहीं कहता। हर शास्त्रीय संगीत के कलाकार को फिल्मों का आकर्षण होता ही नहीं है।

-लेकिन फिल्मी गायन को लेकर आप जैसे कलाकारों में इतनी तल्खियां क्यों है ?

-हमारे यहां फिल्मों में आज कल जो चेहरे दिखते हैं उन पर तो भले आदमियों की आवाज सूट नहीं होगी। मैं नाम नहीं लूंगा लेकिन फि ल्मी संगीत में जो आज के दौर में हैं, ऐसे लोगों की जीवन शैली में ही संगीत नहीं है। आज विडम्बनाएं बहुत सी हैं। मेरे मित्र सुरेश वाडेकर कितना सुरीले गाने वाले हैं लेकिन आज उनको कोई काम नहीं है। ये अलग बात है कि सुरेश वाडेकर अपना विद्यालय चलाते हैं और संगीत शिक्षण में व्यस्त हैं। उनका आनंद इसी में है।

-टेलीविजन चैनलों पर संगीत के रियालिटी शो को आप किस नजरिए से देखते हैं?

-मेरी समझ में नहीं आता कि इन रियालिटी शो में बैठे ज्यादातर निर्णायकों को ऐसा क्यों लगता है कि गाना यानि किसी की हू ब हू नकल करना है। होना तो ये चाहिए कि अगर रफी साहब या लता जी का गाना है तो उसे आप प्रतियोगी के तौर पर कैसे गाते हैं। अब जो जज बैठे होते हैं वे भी कहते हैं कि लता जी की तरह उसने अच्छा गाया। ये तो नकल की बात हुई ना, आपकी अपनी बात कहां आई इसमें? ऐसा इसलिए है कि ये जो जज बनाए गए हैं, वे इन प्रतियोगियों से उम्र में ज्यादा और थोड़े बेहतर हैं। इसके अलावा क्या है इनके पास? जरूरी नहीं कि ये उन प्रतियोगी बच्चों से ज्यादा टैलेंटेड हों।

-लेकिन टेलीविजन चैनल भी तो श्रोताओं तक पहुंचने का माध्यम है?

-बिल्कुल है और मैं इन चैनलों की भूमिका से इनकार नहीं कर रहा हूं। मैं दरअसल रियालिटी शो की रियालिटी पर बात कर रहा था। वैसे मैं बताऊं अढ़ाई महीना पहले ठीक दीवाली के दिन जब लोग पटाखों और रोशनाई में वक्त बिताना चाहते हैं, तब ‘जी मराठी’ ने मेरे डेढ़ घंटे के दो सेशन टेलीकास्ट किए। इसके बाद मुझे हजारों लोगों की प्रतिक्रियाएं आई। सोशल मीडिया में बधाई मिली। तो मैं मानता हूं कि सैटेलाइट चैनल भी श्रोताओं तक पहुंचने का बड़ा माध्यम है।

-अपने अब तक के संगीत जीवन को किस तरह परिभाषित करना चाहेंगे? कुल जमा हासिल और आगे की चाहत?

-महान संगीतकार पं. विष्णु दिगम्बर पलुस्कर जी ने अपना गायन प्रदर्शन छोड़ कर शास्त्रीय संगीत के प्रचार कार्य के लिए खुद को समर्पित कर दिया था। लेकिन हमारी पीढ़ी के लोग ऐसा नहीं कर पाए। हम लोगों ने अपने तरीके से शास्त्रीय संगीत को पल्लवित करने में योगदान दिया। मैं संगीत पर कुछ लिख पाया हूं। खुद को अभिव्यक्त करने मैनें संगीत को माध्यम बनाया। मैं कुछ प्रमुख रागों की रचना कर पाया हूं, जिसे मेरे समकालीन और नई पीढ़ी के लोग गाते हैं। ये अच्छी बात है कि वे लोग मेरी नकल नहीं करते हंै। मेरा मानना है कि हमारी बंदिशों में वो गुण होना चाहिए कि आप उसे अपने तरीके से गा सकें। उम्र के इस पड़ाव में भी मैं वही राग फिर से गाऊं और उसमें मुझे कुछ नया दिखता है, तो मैं गाता रहूंगा और जिस दिन मुझे नई बात नहीं दिखेगी तो नहीं तो गाना बंद कर दूंगा।

एनएफआई की फैलोशिप प्राप्त पत्रकार मुहम्मद जाकिर हुसैन हरिभूमि भिलाई में सेवारत हैं। उनसे 09425558442 पर संपर्क किया जा सकता है.

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